‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

समकालीन जगत के ग़ज़ल और गीत के मसीहा - डॉ.कुँअर बेचैन

 

कुँअर बेचैन की कहानी उनकी जुबानी- 

" मेरा जन्म सन् 1 जुलाई 1942 को हुआ था। मुरादाबाद के पास उमरी नाम का गाँव है वहाँ मेरा जन्म हुआ था। मेरे पिता वहाँ पटवारी थे और हमारे खानदान में पटवारी रहते चले जा रहे थे।अच्छा खानदान था...खूब संपन्न लोग थे हम।जब मैं दो महीने का था, तभी मेरे पिताजी का देहांत हो गया था | पिता के देहांत के पाँच महीने बाद मैं मेरी माँ के पास लेटा हुआ था हमारे घर में डकैती पड़ गयी। तो उन्होने मुझ पर चाकू रख दिया और मां से बोला कि कहाँ कहाँ पैसा गड़ा है, दे दो नहीं तो हम इसको मार देंगे । मेरी माँ ने कहा इसे छोड़ दो मैं बता देती हूँ । लगभग 27 कलश सोने चांदी के जेवरात से भरे हुए जमीन में  गढ़े थे जिसे वो खोद कर ले कर चले गए । इस घटना से माँ डर गयी। मेरी बड़ी बहन को लेकर माँ अपनी माँ के गाँव आ गयी और अपना गाँव छोड़ दिया। तब मैं डेढ़ वर्ष तक अपनी नानी के पास रहा।उसके बाद अपने मौसा- मौसी के पास  रहा।जब मैं दो वर्ष का था उनके साथ मुरादाबाद आ गया। मेरा पालन पोषण उन्होंने सात महीने किया।उसके बाद मेरी बड़ी बहन की शादी कर दी गई। बहन की विदाई के समय मैं दरवाजे पर  खडा था तो कोई चोर मुझे उठाकर लेकर भाग गया। बाराती चोरों से छुड़ा कर लेकर आये।उसके बाद दो वर्ष तक के लिए बहन- बहनोई के साथ मुरादाबाद चला गया|जब मैं सात वर्ष का था, तब माँ  का देहांत हो गया और जब नौ वर्ष का था, मेरी बहन का भी देहांत हो गया। मैं और जीजाजी घर में अब अकेले रह गए।

बहन के देहांत के बाद घर की सारी जिम्मेदारी मुझ पर आ गयी।हम कच्चे घर में रहते थे।घर में बिजली नहीं थी। मैं स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढ़ता था।जीजाजी खाना बनाना नहीं जानते थे।हम दोनों लोगों ने सबसे पहले खिचडी बनाना सीखा।बाजरी की रोटी तवा उल्टा करके चूल्हे पर बनाते थे।उस रोटी के टुकडे़ टुकड़े होते तो भी मैं खाता था ।वो ऐसा दिन था जिसकी रोटी की महक बहुत भारी रही।"

 बाजरे की रोटी का जिक्र माँ और बहन से जोड़ कर उन्होंने लिखा-

"हजारों खुशबुएँ दुनियाँ में है पर उससे छोटी है

किसी भूखे को जो सिकती हुई रोटी से आती है"

अपने संघर्ष की कहानी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा-

 "मैं अपने दर्द को व्यक्त करने के लिए गाने लगा।जब मैं नवीं कक्षा का छात्र था ।तब कक्षा अध्यापक ने जो खुद भी कविता लिखते थे, उन्होंने लिखने के लिए प्रोत्साहित किया और तुलसीदास पर कविता लिखने के लिए कहा। मैं लिख नहीं पाया। उन्होंने मेरा कवि रूप पहचान लिया था इसलिए उन्होंने वापस बोला कल तुलसी जयंती पर तुझे सब बच्चों के सामने कविता बोलना है।सैकड़ों  छात्रों के सामने मैंने कविता सुनाई। जिसे सुनकर बहुत वाहवाही हुई,तब से मेरी कविता की यात्रा का प्रारंभ हुआ।

अपनी तंग हाली को बताते हुए कहा "स्कूल के दिनों में मेरे पास दो जोड़ी कपड़े थे। एकबार बरसात होने से गंदे कपड़े नही धोये थे ,तो गंदे कपडे़ पहन कर ही स्कूल चला गया | मेरे टीचर ने देखा और मुझे क्लास से बाहर निकाला। उसी कक्षा में मेरा मित्र था उसने मेरी आपबीती सर को सुना कर कहा कि बहुत गलत किया आपने उसके साथ। सर ने उसी समय कक्षा छोड़ी और मेरे पास आये।मेरे पैरों में पड़कर माफ़ी मांगी। कृष्ण कुमारजी नाम था उनका। फिर वो अपने घर ले गए और मुझे खाना खिलाया।वो लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। सन् 1659 में 16 वर्ष की आयु में सुरेन्द्र मिश्र और हिंदी प्रभाग के अध्यक्ष गंगाधर राय ने मुझे कविता, ग़ज़ल और गीत लिखने के लिए बहुत  प्रोत्साहित किया। वे अपने साथ कवि सम्मेलन और मुशायरें में मुझे ले जाते थे। "

इतने दर्द भरे  जिंदगी के सफ़र में भी वो आशावादी बने रहे और ग़ज़ल- गीतों के  जरिये आशा का संचार लोगों के दिलों में करते रहे -

"जिंदगी भोर है सूरज से निकलते

एक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो थक जायेंगे

धीरे धीरे ही सही राह पे चलते रहिये"

सन् 1965 से 2002 तक हिंदी विभाग में अपनी सेवाएं देते हुए। कवि सम्मेलनों और मुशायरों में अपनी शिरकत से लोगों के दिल में घर बनाते रहे।उनके गीत और ग़ज़लों की महक सिर्फ देश में ही नहीं सात समंदर पार भी महकी। उनको अनेक देशों ने आमंत्रित किया। रूस, सिंगापुर, दुबई, हॉलैंड, फ्रांस, जर्मनी और पाकिस्तान की यात्राएँ की। जहाँ उनके गीतों और ग़ज़लों को बहुत सराहा और उनको कई सम्मानों से नवाजा। 

कुँअर बेचैन की साहित्य साधना-

 9 गीत संग्रह, 15 ग़ज़ल संग्रह ,2कविता संग्रह,1 दोहा संग्रह,हाइकु संग्रह, 2 उपन्यास,1 महाकाव्य, 1 सैद्धांतिक पुस्तक,नवगीत,

बाल गीत, यात्रा वृतांत.. कुल उनकी 150 पुस्तकें एक अलग ही दुनिया में ले जाती है। 

अनेक महाविद्यालयों और विद्यालयों के 16 पाठ्यक्रमों में आपकी कविताएँ बेहतरीन मार्ग दर्शक रही। आपके द्वारा लिखी पुस्तकों पर 20 से ज्यादा रिसर्च स्कॉलर ने विभिन्न विश्वविद्यालयों से PhD की डिग्री हासिल की।डॉ. कुँअर बेचैन को उनकी साहित्य सेवाओं के लिए देश के नामी साहित्य संस्थाओं, कई अकादमी ने उन्हें सम्मानित किया, उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार और महामहिम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और डॉ. शंकर दयाल शर्मा द्वारा उनको सम्मानित किया गया। 

आपके गीत टीवी सीरियलों के अलावा फिल्मों में भी सुनने को मिले।आकाशवाणी और टीवी सीरियलों में उनके द्वारा लिखे  गीत काफी लोकप्रिय हुए। 

 फ़िल्म 'कोख' में रवींद्र जैन के संगीत और हेमलता जी के स्वर में गाया गीत लोगों में बहुत  मशहूर हुआ।

"जितनी दूर नयन से सपना 

जितनी दूर अधर से हँसना"

निखिल कौशिक नेत्र विशेषज्ञ,कवि और फिल्म निर्माता ने उनकी फिल्म 'भविष्य दी फ्यूचर में कुँअर बेचैन के गीत को लिया। 

"नदी बोली समंदर से, मैं तेरे पास आई हूँ"

और

"बदरी बाबुल के अंगना जइयो"

जो फिल्म टशन में भी लिया था लेकिन उनके नाम का कही भी जिक्र नही किया था। 

कौशिक ने उनसे पूछा " मैं प्रायः सोचता और पूछता हूँ आपने आप से केवल मुस्कराते क्यों है ?..आपको कभी क्रोध क्यों नही आता ?.."

तब डॉ.बेचैन उनको बताते है कि वे किसी आलोचना को भी मान का अधिकारी मानते है।

बेचैन कहा करते  थे

"सिकती रोटी की महक मेरा संघर्ष था जितना दुःख सिखाता उतना कोई नही दुःख ही मेरा गुरु है।

 उन्होंने पत्नी का जिक्र करते बताया कि शादी के बाद पत्नी मेरी गुरु रही। 

ग़ज़ल की तमीज़ के बिना उन्होंने पत्नी के लिए पहली बार ग़ज़ल नुमा एक रचना लिखी थी 

 "मेरे पास तू नही तो मेरे पास तेरा ग़म है

तेरी याद संग है मेरे , क्या मेरे लिए ये कम है।"

सन् 1963-64 में रामधारी सिंह दिनकर ने एक कवि सम्मेलन में उनके गीत की प्रतिक्रिया में बेचैन की प्यार से पीठ थपथपाई।

 डॉ .अशोक चक्रधर ने कहा  " डॉ. कुँअर बेचैन ने  कितनी किताबें लिखी उनमें से कितने ग़ज़ल संकलन  हैं,उनमें कितनी अतुकांत कविताओं की किताबें हैं, कितने ही गीत,कितने उपन्यास  हैं,कहानियाँ हैं ये तो सब जानते हैं लेकिन कुँअर बेचैन का व्यक्तित्व क्या है उसे कितने लोगो ने पढ़ा हैं लेकिन उनको पढ़ना आसान नहीं ।वे समंदर से गहरे इंसान है पेड़ से ऊँचे व्यक्तित्व है"

राज कौशिक पत्रकार- "मेरा सौभाग्य कि मैं उनका स्टूडेंट की रहा।शायरी में छह सात साल में पहली भैरवी डॉ .कुँअर ने बतायी।" डॉ. बेचैन के लिए कौशिक ने लिखा-

 "न तुम हो चांद ना सूरज ना दीप या जुगनू"

फिर आस पास तुम्हारे ये रोशनी क्यूँ है"

प्रगीत कुँअर ( पुत्र) ने पिता के लिए अपने उद्गार व्यक्त किये *"डॉ कुँअर बेचैन जी को पिता के रूप में पाना अपने आप में वरदान से ज्यादा कुछ नहीं । जहाँ तक उनकी रचनाओं का सवाल है उनकी रचनाएँ इतनी मौलिक है उसे किसी भी परिवेश में आप नाप तोल सकते है और वे लोगों को प्रेरणा देती है।"

हमारे देश के गंगा जमुनी तहज़ीब के लिए बेचैन के विचार है ," मनुष्यता सबसे बड़ी चीज है। मुझे तो तमाम शायरों के साथ वसीम बरेलवी साहब का बहुत बहुत प्यार मिला।

 हिंदू मुस्लिम एकता पर उन्होने लिखा- 

"भले ही हममें तुममें कुछ रूप रंग का भेद हो

कि खुशबुओं में फर्क क्या गुलाब हम गुलाब तुम"

"कुछ तुम बदल के देखो, कुछ हम बदल के देखे

जैसे भी हो  दिलो का मौसम बदल के देखो"

साहित्य साधना में लीन डॉ.बेचैन आज की पीढी़ के साथ साथ आने वाली पीढी़ के लिए बेहतरीन उदाहरण है कि संघर्ष से शख़्सियतें सदा निखरती हैं।

नये कवियों और लेखकों को संदेश देते हुए कहा, "नये लेखकों से मैं यहीं कहना चाहता हूँ जिस भी विधा में वो लिख रहे कहानी लिखे तो कहानी की, कविता लिखे तो कविता की। कविता में कई विधाएँ हैं..गीत है, ग़ज़ल है ..अलग अलग विधाएँ है..उन विधाओं की पूरी जानकारी हासिल करें।..जल्दबाजी नहीं करे। कला का कोई शॉर्ट कट नहीं हैं।कला में तपस्या करनी पड़ती हैं।इंतजार करता पड़ता । "

"तुम भी बहार से आगे निकल गए

तुम मेरे इंतज़ार से आगे निकल गए

पीछे तुम्हारे वो तो बडी़ दूर तक गयी

कभी मेरी पुकार से आगे निकल गए"


डॉ. कुँअर का अंतिम सफ़र- डॉ. कुँअर बेचैन को कोरोना ने हमसे छीन लिया। कोरोना होने की जानकारी कुमार विश्वास के ट्वीट से हुई।15 अप्रेल 2021,9.29 पर

कुमार विश्वास ने डॉ. कुँअर बेचैन के लिए ट्वीट कर वेंटिलेटर की माँग की थी। 

कुमार  विश्वास के ट्वीट के बाद गौतम नगर के सांसद डॉ. महेश शर्मा ने  मदद लिए हाथ बढ़ाया | कैलाश अस्पताल में शिफ्ट कराने की बात की थी।

@डॉ. कुमार विश्वास, "रात को 12 बजे तक प्रयास करता रहा, सुबह से प्रत्येक परिचित डॉक्टर को कॉल कर चुका हूँ। हिंदी के वरिष्ठ गीतकार गुरु प्रवर डॉ. कुँअर बेचैन कॉस्मोस हॉस्पिटल, आनंद विहार, दिल्ली में कोविड उपचार में है। ऑक्सीजन लेवल सत्तर तक पहुँच गया, तुरंत वेंटिलेटर की आवश्यकता है। कहीं कोई बेड नही मिल रहा।"

उसके बाद उनके लिए  जीवन और मौत के बीच संघर्ष चलता रहा। तब भी वे  आशा से और खुशी से भरे हुए थे। 

29 अप्रेल 2021 को काव्य साहित्य का एक और सूरज कोरोना के चलते अस्त हो गया । गुरुवार को कुंअर बेचैन का निधन हो गया , वह लंबे समय से संक्रमण से लड़ रहे थे उस जंग में जिंदगी को हार गए। लेकिन साहित्य जगत में उनकी आज भी मौजूदगी है। 

गीतों व ग़ज़लों दोनों में उनके काफिये- रदीफ़ चुस्त दुरुस्त होते रहे ।ग़ज़लों का व्याकरण उनका इतना सटीक था कि लोग तुकांतों की खोज के लिए उनकी ग़ज़लों को आज भी पढा करते है और आगे भी पढ़ते रहेंगे। आम आदमी अक्सर मृत्यु से घबराता है । पर कवियों में ही यह साहस है कि वे न केवल मृत्यु का सामना करते हैं बल्कि मृत्यु पर लिखते भी सर्वाधिक हैं। यों तो वे मूलत : आशावादी कवि रहे हैं फिर भी देखिए मृत्यु को भी वे किस दिलेरी से स्वीकार करते हुए लिखते हैं 

"मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यों डर रखूं जिन्दगी आ , तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूं"

" चाहता हूं मैं भी काँधे पर वही काँवर रखूं ..कौन जाने कब बुलावा आए और जाना पड़े...सोचता हूं हर घड़ी तैयार अब बिस्तर रखूं"

और देखिए कि किस घड़ी में उन्हें यहां से जाना पड़ा जैसे कि वे इस घड़ी के लिए तैयार बैठे हों। 

काव्य कवियों में शोक की लहर फैल गयी। उनके निधन पर उनकी समकालीन गीतकार डॉ . मधु चतुर्वेदी ने दुख प्रकट किया है । उन्होंने कहा कि "कुंअर जी का जाना बहुत दुखद है । हिंदी गीतों की वाचिक परंपरा के हस्ताक्षर के जाने से आए अवकाश को भरा नहीं जा सकता । लंदन के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में दो भारतीय गीतकारों के सम्मान हुआ था । मेरा सौभाग्य है कि वह मैं और कुंअर जी थे । उनके साथ अनेक कार्यक्रम और यात्राएं की , जो अब यादों में हैं ।"

गीत और ग़ज़ल का सितारा आज के ही दिन एक वर्ष पूर्व पंच तत्व में  विलीन हो गया हो भले लेकिन ग़ज़ल और गीत का अध्याय उनको पढ़े बिना पूरा नही हो सकता। ऐसी शख़्सियत को नमन ...जो जमीन से उठकर साहित्य के आकाश की ऊँचाईयों का कोना कोना छान आये और समंदर सी गहराई अपने व्यक्तित्व में समेट कर अपनी कलम की पैनी धार से कागज़ के पन्नों पर उकेर दी हो मानो। ऐसे सरल मना व्यक्तित्व को हार्दिक नमन


मीनाक्षी कुमावत 'मीरा' की प्रस्तुति



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गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

वह शाम मेरी यादों में अक्स है


जब मैं जबलपुर से मुंबई पहुँची तो मुंबई की हवाओं में कला और साहित्य का नशा था। निश्चय ही वह साहित्य का मुंबई के लिए स्वर्ण युग था। एक ओर प्रगतिशील आंदोलन, इप्टा और ट्रेड यूनियन आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा था ,तो दूसरी ओर कई नामी-गिरामी लेखक फिल्मों में गीत और संवाद लिखने को विभिन्न प्रदेशों से जुट आए थे। यहाँ टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप अपने चरम पर था। जहाँ से निकलने वाली पत्रिकाएँ धर्मयुग , सारिका ,माधुरी, इलस्ट्रेटेड वीकली, पराग ,चंदामामा ,नंदन से मुंबई की एक अलग पहचान बनती थी ।पृथ्वी थियेटर ,तेजपाल थिएटर, रंगशारदा में खेले गए तुगलक हयवदन, सखाराम बाईंडर, मी नाथूराम गोडसे बोलतो जैसे नाटक शो पे शो किए जा रहे थे।  मुझे इन सब के बीच अपनी जगह बनानी थी।             मैं टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग में बिना किसी अपॉइंटमेंट के संपादक धर्मवीर भारती से मिलने गई। अपने नाम की स्लिप केबिन में भिजवा कर बाहर इंतजार करने लगी। ऑफिस का माहौल शांत था। मनमोहन सरल, शशि कपूर , रूमा भादुड़ी, सुमन सरीन सब अपने-अपने कामों में व्यस्त। लकड़ी के पार्टीशन से लगा माधुरी का ऑफिस ,सामने सारिका का। थोड़ा हटकर नंदन ,पराग बाल पत्रिकाओं का। ऑफिस में मुझे बैठे 10 मिनट भी नहीं हुए थे कि भारती जी के केबिन से बुलावा आ गया। सिगार सुलगाती हुई भव्य आकृति ।

" आईए संतोष जी ,बैठिए ।"

"जी मैं जबलपुर से अब यहीं रहने आ गई हूँ।"

"अच्छा किसी नौकरी के सिलसिले में?"

तभी चपरासी चाय और पानी लाकर रख गया ।

"चाय लीजिए, छापा है हमने आपको।"

" जी नौकरी नहीं पत्रकारिता करने आई हूँ। "मैंने झिझकते हुए कहा।

" बड़ी कठिन राह है पत्रकारिता की। बताइए मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ।"

मुझे लगा कि वह समझ रहे हैं मैं उनसे काम माँगने आई हूँ।

" जी पहले समझ तो लूँ। अभी तो पहली सीढ़ी भी नहीं चढ़ी पत्रकारिता की।"

वे मुस्कुराए फिर सूरज का सातवाँ घोड़ा पुस्तक मुझे भेंट की। मैंने इजाज़त चाही। वे उठकर केबिन के बाहर तक मुझे छोड़ने आए।

भारतीजी जितने अच्छे साहित्यकार थे उतने ही अच्छे संपादक भी थे। मैं यह बात निजी अनुभव से कह सकती हूँ कि उन्होंने देश भर में हजारों लेखकों को मांजा है, संवारा है, और पहचान दी है। उनके लिखे पोस्टकार्ड आज भी मेरी धरोहर है।

धीरे - धीरे मेरे दोस्तों की सूची में संपादक ,पत्रकार जुड़ते गए। मनमोहन सरल, सुमंत मिश्र, विमल मिश्र, आलोक श्रीवास्तव, आलोक भट्टाचार्य ,कैलाश सेंगर ,सुमन सरीन, रूमा भादुरी, शशि कपूर एक ऐसा समूह तैयार होता गया जिससे एक दिन भी न मिलना बड़ा शून्य रच देता।

अभिभूत थी मैं। मुम्बई अजनबी नहीं लग रही थी। कितने अपनों से भरी है मुम्बई।

नवभारत टाइम्स में मैं लगातार लिखने लगी। पहले छिटपुट लेख फिर विश्वनाथ जी ने मुझसे मानुषी कॉलम लिखवाना शुरू किया। डेस्कवर्क मैं करना नहीं चाहती थी, मेरा मन फ्रीलांस में ही लगता था । दूसरे हेमंत भी बहुत छोटा था और उसको मैं अधिक समय तक अकेला नहीं छोड़ सकती थी। 

फिर न जाने क्या सनक चढ़ी संतोष वर्मा नाम बदलकर शादी के बाद का सरनेम संतोष श्रीवास्तव लिखना शुरू किया। इस खबर को भारती जी ने धर्मयुग में छापा। शुभचिंतकों ने इस बात पर विरोध प्रकट किया" यह क्या किया सरनेम बदलने की क्या जरूरत थी? अपनी पहचान खुद मिटा रही हो।"

"पहचान बरकरार रहेगी, मैं संतोष वर्मा को मिटने नहीं दूंगी ।" 


भारती जी ने धर्मयुग में कॉलम लिखने का प्रस्ताव रखा। इस कॉलम में मनोरोग से पीड़ित बच्चों की केस हिस्ट्री ,चिकित्सकों से पूछ कर उसका बाल मनोरोग व्रत और निदान भी लिखना था। तब धर्मयुग साप्ताहिक था और यह कॉलम हर पखवाड़े प्रकाशित करने की उनकी योजना थी।

इस कॉलम के लिए जानकारी जुटाना बहुत भागदौड़ से संभव हुआ। मुझे मनश्चिकित्सकों से अपॉइंटमेंट लेना पड़ता था और फिर उनके संग तीन-चार घंटे बैठकर केस हिस्ट्री आदि जानने की व्यस्तता शुरू हो गई। मेहनत ज़रूर करनी पड़ी लेकिन कॉलम बहुत ज्यादा चर्चित हुआ। बच्चों का यह कॉलम दो साल तक लिखा मैंने। इस कॉलम के बाद भारती जी ने मनोरोगी औरतों के बारे में भी मुझसे अंतरंग नाम से कॉलम लिखवाया। इस कॉलम के लेखन के दौरान मैं आश्चर्यचकित कर देने वाले और मर्मान्तक अनुभवों से गुजरी। मुझे एहसास हुआ कि एक स्त्री को मनोरोगी बनाने में जितना परिवेश ज़िम्मेदार है उससे कहीं अधिक पति, पिता ,भाई, बेटा और अन्य मर्द से संबंधित रिश्ते जिम्मेवार हैं। इस पीड़ा ने भीतर तक मुझे कुरेदा और मैं नारी विषयक लेख यथा 

अत्याचार को चुनौती समझें 

क्यों सहती है औरत इतने अत्याचार पितृसत्ता को बदलना होगा 

आदि शीर्षकों से लिखने लगी जिन्हें धर्मयुग, नवभारत टाइम्स ने तो खूब छापा ही ।

नई दिल्ली के "भारत भारती" द्वारा तथा "युगवार्ता त्रि साप्ताहिक प्रसंग लेख सेवा" द्वारा देश भर के अखबारों में भी प्रकाशित किए गए ।मानुषी और अंतरंग तथा बाल अंतरंग स्तंभों ने मुझे पत्रकार के रूप में मुंबई में प्रतिष्ठित कर दिया । और इस बात का पूरा श्रेय भारती जी को जाता है। उन्हीं ने मुझसे कहा कि एक बार विश्वनाथ सचदेव से भी मिल लो। विश्वनाथ सचदेव जी से मुलाकात अविस्मरणीय थी। बहुत सरल और भव्य उनका व्यक्तित्व था। नवभारत टाइम्स में मेरी कई कहानियाँ प्रकाशित कीं और नारी विषयक लेख उन्होंने मुझसे लिखवाए। फिर एक कॉलम दिया मानुषी जिसमें मैं हर पखवाड़े लगातार लिखती रही। यह कॉलम भी दो ढाई साल चला।

मुंबई में मुझे स्थायित्व मिल चुका था और मैं लगातार फ्रीलांस पत्रकारिता करने लगी। 


भारती जी के संपादन में धर्मयुग में बहुत महत्वपूर्ण विषयों पर परिचर्चाएं आयोजित की जाती थीं। मुझे याद है एक परिचर्चा का विषय था "अब मैं बता सकती हूँ।" जो केवल महिला लेखकों के लिए था। मेरे विचार भी इस परिचर्चा में मेरी फोटो सहित प्रकाशित किए गए। मुझे लगता है इस परिचर्चा का उद्देश्य बरसों से महिलाओं की खामोशी को तोड़ना था कि वे खुलकर नहीं बता पा रही थीं कि वे किन परिस्थितियों से गुज़री हैं ।

एक और परिचर्चा आयोजित की गई "वह क्षण जिसने जीवन को नया मोड़ दिया "इस परिचर्चा में भी मैंने भाग लिया था। और स्वीकार किया था कि एडवोकेट बनते- बनते मैं साहित्यकार बन बैठी।

"पति पत्नी और वो "इस विषय पर भी धर्मयुग में परिचर्चा आयोजित की गई थी। हर कामयाब व्यक्ति के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है। फिर चाहे वह दूसरी स्त्री ही क्यों न हो ।इस विषय पर बहुत काम हुआ। लेखकों ने कई कहानियां लिखी तथा कई साझा संकलन भी निकले।

धर्मयुग को लोकप्रिय बनाने में ऐसे विषय बहुत सहायक थे।

धर्मयुग में ही यह बात उठाई गई थी कि जब सभी क्षेत्रों में रैंकिंग होती है तो साहित्य में रैंकिंग क्यों नहीं होती और यह कार्य इन दिनों बखूबी निभा रही है राजस्थान की संस्था राही रैंकिंग। हालाँकि साहित्यिक रैंकिंग का यह कार्य भारती जी के निधन के बाद 2014 से आरंभ हुआ लेकिन अब यह खूब लोकप्रिय हो रहा है।

भारती जी के संपादन काल में मेरी 8 कहानियाँ धर्मयुग में छपी।

    मेरे उपन्यास " टेम्स की सरगम" का लोकार्पण पुष्पा भारती जी के हाथों हुआ था। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि इस उपन्यास में जिस प्रेम का संतोष ने वर्णन किया है उस प्रेम से मैं भारती जी को लेकर गुजर चुकी हूँ। संतोष, कैसे लिखा तुमने यह सच्चा ,उदात्त समर्पित प्रेम। पुष्पा जी के इस पूरे वक्तव्य को समीक्षा के नाम से हंस में राजेंद्र यादव जी ने प्रकाशित किया था।

कांता भारती द्वारा लिखित रेत की मछली को पढ़कर कई लेखक भारती जी के विरोधी हो गए थे। लेकिन मैं यह कहना चाहूंगी कि उन्होंने पुष्पा भारती जी से सच्चा प्रेम किया और उसे किसी से  छुपाया नहीं। इस बात के गवाह हैं वे प्रेम पत्र जो उन्होंने पुष्पा भारती के नाम "धर्मवीर भारती के पत्र पुष्पा भारती के नाम "पुस्तक में प्रकाशित कर सरेआम किए हैं।

इस पुस्तक के प्रथम पृष्ठ में लिखा गया है कि ये पत्र एक ऐसे कालजयी रचनाकार के अंतरंग का आलोक है जिसने भारतीय साहित्य को अभिनव आकाश प्रदान किए हैं ।ये पत्र भावना की शिखरमुखी ऊर्जा से आप्लावित हैं। इन पत्रों में प्रेम की अनेकायामिता अभिव्यक्ति का पवित्र प्रतिमान निर्मित करती है। यही कारण है कि ये पत्र दैनंदिन जीवन का व्यक्तिगत लेखा-जोखा मात्र हैं। "संबोधित "के प्रति समग्र समर्पण और उसके हित चिंतक की प्रेमिल पराकाष्ठा इनकी विशेषता है।

भारती जी न जाने कितने विशेषण से उन्हें पुकारते हैं। मेरी एकमात्र अंतरंग मित्र, मेरी कला, मेरी उपलब्धि ,मेरे जीवन का नशा, मेरी दृष्टि की गहराई -के लिए ये पत्र लिखे गए हैं। इस प्रक्रिया में जीवन , साहित्य ,दर्शन व मनोविज्ञान आदि के अनेकानेक पक्ष इस प्रकार उद्घाटित होते हैं कि पाठक का मन अलौकिक ज्ञान आनंद से भर जाता है ।विलक्षण रचनाकार धर्मवीर भारती के इन पत्रों को जिस प्रीति प्रतीति के साथ पुष्पा भारती ने संजोया है वह भी उल्लेखनीय है। यह भी कहना उचित है कि भारतीय साहित्य को समझने में इन पत्रों से एक नया झरोखा खुल सकेगा। 


भारती जी की उनकी पहली पत्नी का नाम कांता था और उनसे उनके एक बेटी भी थी

लेकिन उनके संबंध अच्छे नहीं थे। भारती जी से अपने संबंधों का हवाला देते हुए कांता भारती ने एक किताब लिखी थी " रेत की मछली" जिसे उनकी आत्मकथा भी कहा जाता है।

“रेत की मछली” पढकर मैं अपने प्रिय रचनाकार को कटघरे में पाती हूं। इतनी प्रेमिल भावनाओं के भारती जी ने कांता भारती के संग क्यों ऐसा व्यवहार किया? क्यों उन्हें टॉर्चर किया ? वे चाहते तो उन्हें तलाक देकर मुक्त हो सकते थे। और कांता जी को भी मुक्त कर सकते थे। पर........ 


मैंने धर्मयुग में उनका एक संस्मरण पढ़ा था जो उन्होंने लोहिया जी पर लिखा था। इस संस्मरण में उन्होंने लिखा था कि पुष्पा जी से अपने दूसरे विवाह के सम्बन्ध में उन्होंने लगभग समस्त परिचितों और आदरणीयों से सलाह चाही थी किंतु किसी ने भी खुल कर उनका समर्थन नहीं किया था। किंतु जब उन्होंने लोहिया जी से इस विषय में

सलाह मांगी तब उनकी सहमति ने उन्हें बल दिया था और वे पुष्पा जी से विवाह के लिए तैयार हो गए थे।

कहा जाता है कि ‘कनुप्रिया’ रचने की प्रेरणा भारती जी को अपने निजी जीवन में उठे द्वन्द और उसे हल करने के प्रयासों से प्राप्त जीवन अनुभवों से मिली। मुम्बई आने से पहले वे इलाहाबाद विश्व विद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक थे और पुष्पा भारती उनकी कक्षा की सबसे सुन्दर लड़कियों में से एक थीं। पूर्व विवाहित भारती जी को उनके रूप और इस आकर्षण को मिले प्रतिदान ने द्वन्द में डाल दिया था।

पुष्पा भारती से विवाह करने के विचार पर नैतिकतावादी भारती गहरे द्वन्द से घिरे रहे पर अंततः उनका प्रेम जीता और उन्होंने अपनी छात्रा पुष्पा जी से विवाह कर लिया।

उनसे प्रथम मुलाक़ात में मुझे जो अपना उपन्यास  सूरज का सातवाँ घोड़ा भेंट किया था उसे कहानी कहने का अनुपम प्रयोग माना जाता है, जिस पर श्याम बेनेगल ने इसी नाम की फिल्म बनायी। अंधायुग उनका प्रसिद्ध नाटक है। इब्राहीम अलकाजी, राम गोपाल बजाज, अरविन्द गौड़, रतन थियम, एम के रैना, मोहन महर्षि और कई अन्य भारतीय रंगमंच निर्देशकों ने इसका मंचन किया है।

कनुप्रिया और अंधायुग उनकी कालजयी कृतियां हैं जिन्हें भारती जी के जाने के बाद उनके जन्मदिन पर मुम्बई के नाट्यकर्मी पुष्पा भारती जी के निर्देशन में हर वर्ष 25 दिसंबर को मंचित करते हैं।

कनुप्रिया की मेरी सबसे पसंदीदा पंक्तियां हैं

मेरे हर बावलेपन पर

कभी खिन्न हो कर, कभी अनबोला ठानकर, कभी हँस कर

तुम जो प्यार से अपनी बाँहों में कस कर

बेसुध कर देते हो

उस सुख को मैं छोड़ूँ क्यों?

करूँगी!

बार-बार नादानी करूँगी

तुम्हारी मुँहलगी, जिद्दी, नादान मित्र भी तो हूँ न!

1971 में बांग्ला देश में  भारत पाकिस्तान युद्ध की रोमांचक एवं लोमहर्षक दास्तान भारती जी की कलम से रिपोर्ताज के रूप में लिखी गई जो धर्मयुग में धारावाहिक रूप से प्रकाशित की गई। ऐसा माना जाता है कि युद्ध का आँखों देखा वर्णन रिपोर्ताज के रूप में विश्व साहित्य में पहली बार भारती जी ने लिखा। इस किताब का नाम है युद्ध यात्रा (बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और भारत पाक युद्ध की आंखों देखी रिपोर्ट)

युद्ध के मैदान में वीर सैनिकों तथा सैनिक अफसरों के साथ स्वयं  भारती जी उपस्थित रहे हैं। भारती जी जब बांग्लादेश से मुम्बई लौटे तो मैं उनसे मिलने उनके घर गई। इच्छुक थी उनसे आंखों देखा हाल सुनने। उनकी खूबसूरत साज सज्जा वाली बैठक में पुष्पा भारती जी के सान्निध्य में युद्ध का वर्णन सुनकर मैं विचलित हो गई थी बड़ी देर तक हम बांग्लादेश के बारे में बात करते रहे। फिर भारती जी ने मुझे बांग्लादेश की स्पेशल चाय पिलाई। बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण चाय उत्पादक देश है। आज यह दुनिया का 10 वां सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है ।

वह शाम मेरी यादों में अक्स है।

उन दिनों मैं मुम्बई के सांध्य दैनिक संझा लोकस्वामी में साहित्य संपादक थी। 4 सितंबर की सुबह अखबार के संपादक रजनी कांत वर्मा जी का फोन आया कि भारती जी का निधन हो गया है और मैं उन्हें भारती जी के विषय में संपादकीय लिखकर तुरन्त भेजूँ। वैसे तो वे लंबे समय से बीमार थे लेकिन इस तरह दुनिया से रुखसत हो जाएंगे सोचा न था। मैं काफी अपसेट हो गई। लेकिन फिर अखबार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए मैंने लिखा-

कलम के सिपाही का भौतिक संसार से परलोक गमन

हिंदी साहित्य के प्रतिभाशाली कवि, कथाकार व नाटककार डॉ० धर्मवीर भारती अब हमारे बीच नहीं रहे। वे लंबे समय से बीमार थे। उनके जाने से एक बड़ा शून्य साहित्य जगत में उत्पन्न हो गया है। लेकिन वे अपनी कविताओं अपनी रचनाओं से हमारे बीच हमेशा जिंदा रहेंगे। भारती जी की कविताओं में रागतत्व की रमणीयता के साथ बौद्धिक उत्कर्ष की आभा दर्शनीय है। कहानियों और उपन्यासों में इन्होंने सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं को उठाते हुए बड़े ही जीवन्त चरित्र प्रस्तुत किए हैं| साथ ही हमारे समाज की विद्रूपता पर व्यंग्य करने की विलक्षण क्षमता भारती जी में रही। कहानी, निबन्ध, उपन्यास, एकांकी, नाटक, आलोचना, सम्पादन व काव्य-सृजन के क्षेत्र में इन्होंने अपनी विलक्षण सृजन प्रतिभा का परिचय दिया। वस्तुतः साहित्य की जिस विधा का भी भारती जी ने स्पर्श किया, वही विधा इनका स्पर्श पाकर धन्य हो उठी। 'गुनाहों का देवता' जैसा सशक्त उपन्यास लिखकर भारती जी अमर हो गये। इस उपन्यास पर बनी फिल्म भारतीय दर्शकों में अत्यन्त लोकप्रिय हुई| 

ऐसे प्रतिभाशाली साहित्यकार का निधन साहित्य की एक बड़ी क्षति है।

4 सितंबर 1997 का वह दिन जब भारती जी हमसे विदा हुए......

                   ......….संतोष श्रीवास्तव जी की कलम से


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गुरु डॉक्टर कुँअर बेचैन


डॉक्टर कुँअर बेचैन को पूरी दुनिया एक गीतकार के रूप में जानती है, पर मुझे उन्हें एक ऐसे प्राध्यापक के रूप में देखने का अवसर मिला, जो विद्यार्थी को इस तरह से मार्गदर्शन देता है कि विद्यार्थी को प्रतीत होता है कि उसका शिक्षक प्रत्येक समय उसके साथ है। वे स्वयं कहते थे कि हमें थर्ड डिविजन वाले विद्यार्थी को फर्स्ट डिविजन वाला बनाना होता है। अपने कविकर्म में अत्यधिक व्यस्त रहने के बावजूद भी वे कक्षा में पढ़ाने का समय अवश्य निकाल लेते थे। परीक्षा में अव्वल कैसे आना है?, किस प्रश्नपत्र की तैयारी कैसे करनी है?, यदि कॉलिज में एक विद्यार्थी के एक प्रश्नपत्र में अंक 70 से अधिक आए हैं तो अन्य प्रश्नपत्रों में सभी विद्यार्थियों के अंक कैसे बढ़ाए जाएं ? प्रत्येक प्रकार की रणनीति वे समझाते थे, तभी तो उनके कॉलिज के छात्र विश्वविद्यालय की मेरिट सूचि में शीर्ष स्थानों पर अपना नाम दर्ज करवा देते थे।

वे कुम्हार का उदाहरण देते थे कि घड़े को गढ़ते समय जैसे कुम्हार भीतर से हाथ का सहारा देकर बाहर छड़ी से ठोक-ठोककर जैसे गीली मिट्टी को सुन्दर घड़े में परिवर्तित कर देता है, यही काम शिक्षक का भी है। उन्होंने मुझे लोक-साहित्य और आधुनिक साहित्य आदि कई विषय पढ़ाए, इन विषयों में उनके पढ़ाने के ढंग से ही मुझमें रुचि जागी, जो आज दिनांक तक है। एक सफल कवि को क्या आवश्यकता थी कि वह विद्यार्थियों पर इतना ध्यान दे, परीक्षा में अधिकतम अंक लाने की रणनीति बनवाए, उसी के अनुसार परीक्षा की तैयारी के लिए प्रेरित करे। यदि वे ऐसा नहीं भी करते और पूरा समय अपने कविकर्म में ही देते तो उन्हें क्या फर्क पड़ता? पर उन्होंने तो अपना कर्त्तव्य बहुत अच्छी तरह से निभाया। उस समय लैंडलाइन फोन हुआ करते थे, कुछ समझ नहीं आने पर आप गुरु जी को फोन लगा सकते थे, ये सुविधा उन्होंने हमें आज से पच्चीस वर्ष पूर्व भी दे रखी थी, जब उन्हें समय मिलता वह पूरा विषय बहुत कम और आसान शब्दों में आपको फोन पर ही सहजता और सरलता से समझा देते और आवश्यकता पड़ने पर आप उनके घर जा सकते थे, वहॉं उनकी धर्मपत्नी का व्यवहार जिन्हें हम ‘ऑंटी जी‘ कहते, अत्यंत आत्मीयतापूर्ण होता। अब एहसास होता है कि वे कितने बड़े कवि थे और हम विद्यार्थियों के लिए कितनी सहजता से उपलब्ध प्राध्यापक, जो कठिन विषयों को भी सरलता से आत्मसात करवा देते थे। लेखन के लिए भी प्रेरित करते और उचित मार्गदर्शन देते, साथ ही साथ प्रतियोगी परीक्षाओं आदि के लिए भी उचित मार्गदर्शन उपलब्ध करवाते। तभी तो उनके कई विद्यार्थियों का नाम बड़े रचनाकारों में शामिल है।

विवाह पश्चात् मैं इंदौर आ गई और यहीं की हो गई, पर गुरु जी को याद रहा मेरी एक विद्यार्थी इंदौर में भी है। एक बार ऑंटीजी के साथ इंदौर आए थे, बड़वानी जाने के लिए, तब मुझे उनके आतिथ्य करने का सुअवसर मिला था। मेरे पति का मोबाइल नंबर उनके पास था, कभी-कभार उस पर उनके आर्शीवाद रूप में शुभकामना संदेश प्राप्त होते थे। काफी समय बीत गया, उनसे मेरा संपर्क नहीं रहा, शायद मेरे जैसा विद्यार्थी जब गुरु से कोई काम पड़ता है तब ही उन्हें याद करता है, मन में उनकी कही पंक्तियॉं ‘लोगों ने मारे मुझ पर पत्थर और मैं पानी की तरह और ऊँचा और ऊँचा उठता गया‘ कठिन जीवन पथ पर प्रत्येक समय मनोबल बढ़ाती रही और मैं घर-गृहस्थी और नौकरी में ही संघर्षरत रही। तभी अचानक एक दिन नवंबर 15, 2019 को गुरु जी का फोन आया, संध्या मैं इंदौर आया हूँ, कवि सम्मेलन में, तुम मुझसे मिलने आओ। वहॉं पहुंची तो गुरु जी की शिष्या होने का मुझे जो सम्मान मिला, उसे मैं आजीवन नहीं भूल पाऊँगी। उन्होंने मुझे प्रत्येक से बहुत अपनेपन से मिलवाया। तब लगा मेरे शिक्षक कितने महान हैं और बड़े व्यक्ति हैं। मैं तो लेखन करना छोड़ ही बैठी थी, पुनः उन्होंने प्रेरित किया, संध्या लिखो, आज मैं पुनः, लेखन से उनकी वजह से ही जुड़ पाई हूँ।

गाजियाबाद पहुँचने पर उन्होंने ऑंटी जी से और चेतन आनन्द जी से मेरी बात करवाई। तब चेतन जी बोले गुरु जी तुच्छ चीजों को भी बड़ा बना देते हैं, यही अपने गुरु जी की विशेषता है। गुरु जी पारस थे, तभी तो अपने स्पर्श से तुच्छ धातुओं को भी उन्होंने सोना बना दिया। व्यक्तिगत समस्याओं के लिए भी उचित परामर्श देते, टूटते और कमजोर होते मनोबल के लिए आपकी शक्ति से आपको परिचित करवाते और आगे बढ़ने और मजबूत होने हेतु प्रेरित करते। आज वे इस संसार में नहीं है, परन्तु उनकी स्मृतियॉं सदैव हमें प्रेरणा देती रहेंगी। उनका रचना कर्म सदा उन्हें अमर रखेगा। श्रेष्ठ प्राध्यापक, यथार्थ को सुन्दर शब्दों में पिरोकर अभिव्यक्त करने वाला कवि, एक सहजता और आत्मीयता से भरा व्यक्तित्व ये सब जहॉं मिलते हैं, वह कुँअर बेचैन हैं। उनकी निम्न पंक्तियॉं सदा मेरे लिए प्रेरणा बनी रहेंगी-

'गमों की आंच पर आंसू उबालकर देखो, बनेंगे रंग किसी पर भी डालकर देखो,

तुम्हारे दिल की चुभन भी जरूर कम होगी, किसी के पांव का कांटा निकालकर देखो।'

डॉ. संध्या सिलावट की स्मृति से



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शुक्रवार, 21 अप्रैल 2023

गीत के शलाका पुरुष और ग़ज़ल के उस्ताद डॉ कुँअर बेचैन

तुम ही भरी बहार से आगे निकल गए

तुम मेरे इन्तजार से आगे निकल गए।


विद्वत्ता, विनम्रता एवं विचारशीलता का अद्भुत समन्वय थे डॉ कुँअर बेचैन जी। बहुत सारे लोग बहुत विद्वान होते हैं। विद्वत्ता का दर्प उन्हें विनम्र नहीं रहने देता और वे अहंकारी हो जाते हैं। कुछ विनम्र तो होते हैं लेकिन दुर्भाग्यवश वे विद्वान नहीं होते।विरले ही होते हैं जो विद्वान और विनम्र दोनों एक साथ हों। विद्वान एवं विनम्र होने के साथ साथ व्यक्ति विचारशील भी रहे ऐसा तो दुर्लभ से भी दुर्लभतम है। गीत के शलाका पुरुष और ग़ज़ल के उस्ताद आदरणीय डॉ कुँअर बेचैन जी इसी तीसरी अति विशिष्ट श्रेणी में आते थे। अत्यन्त विद्वान,अति विनम्र एवं सतत् विचारशील।


डॉ कुँअर बेचैन जी ऐसे चंद कवियों में से एक हैं जो कवि सम्मेलनों मे जितने सक्रिय एवं लोकप्रिय थे, प्रकाशन की दृष्टि से भी उतने ही प्रतिष्ठित थे।

इनके साहित्य पर पन्द्रह से भी अधिक पी एच डी के शोधग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं।

अनेक गीत,नवगीत, ग़ज़ल,बाल कविता संग्रह, महाकाव्य, उपन्यास आपके प्रकाशित हो चुके हैं। आपने हिन्दी छन्दों के आधार पर ग़ज़ल का व्याकरण लिखा। ये डॉ कुँअर बेचैन जी का हिन्दी एवं उर्दू के नवोदित लेखकों के लिए महत्वपूर्ण देन है।


मैंने जबसे कविता का कखगघ समझा तब से डॉ कुँअर बेचैन जी से परिचय है।कवि सम्मेलन जगत में आने के पश्चात हजारों यात्राएँ साथ में कीं। लाखों मंचों पर आपका सानिध्य प्राप्त हुआ।देश विदेश में आपके साथ जाना हुआ।कवि सम्मेलनों से इतर भी सदा मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिलता रहा।आज जब आपके न होने का दुखद समाचार मिला तो कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ।आपके परम शिष्य चेतन आनन्द जी को फोन किया तो उनकेे हिचकियों भरे रुदन ने दुखद सूचना पर मुहर लगा दी।आप तो ठीक हो रहे थे न!।दो एक दिन में आपको अस्पताल से छुट्टी मिलने वाली थी और आज अचानक!


बहुत सारे दृश्य आंखों के सामने उमड़ घुमड़ रहे हैं ।


दुबई यात्रा पर जब हम साथ गए थे तब वहां इंडियन स्कूल में कवि सम्मेलन था। कवि सम्मेलन के मंच पर जब सारे कवियों के साथ मैं और डॉ कुँअर बेचैन जी पहुंचे तब स्कूल की प्रिंसिपल साहिबा दौड़ कर हमारे पास आईं और उन्होंने सबके सामने डॉ कुँअर बेचैन जी के चरण स्पर्श किए और बोला आज हमारा अहोभाग्य है कि आप के चरण हमारे विद्यालय में पड़े। शायद आपको मालूम है या नहीं मालूम आपकी कविताएं हमारे विद्यालय के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती हैं। कई बच्चे आप की कविताएं खूब मन से गाते हैं। इतना बड़ा व्यक्तित्व डॉ कुँअर बेचैन जी का और इतने सहज कि क्या कहूं।कोई भी अच्छा काम करने पर ₹10 इनाम  देते थे। मंच पर भी इतने सरल इतने सहज। 


कभी किसी की निंदा करते हुए मैंने देखा ही नहीं डॉ कुँअर बेचैन जी को। सदा अपने से छोटों की और अपने से बड़ों की प्रशंसा ही करते थे। छोटों का मार्गदर्शन भी करते थे तो प्रोत्साहित करते हुए। उनकी गलतियां बताते थे तो वह भी ऐसे जिससे वह हतोत्साहित ना हों। 


एक घटना का स्मरण और हो रहा है ।अभी कुछ दिनों पहले मैं प्रेरणा दर्पण साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के सिलसिले में उनसे बात कर रही थी ।बातचीत के दौरान डॉक्टर साहब ने बताया कि बहुत सारी चीजें उन्होंने शुरू कीं। जैसे पुस्तकें प्रकाशित कराईं तो पुस्तकों के प्रत्येक पृष्ठ पर कवि एवं प्रकाशक का उल्लेख अवश्य किया। इसके पीछे का कारण यह है कि पुस्तके तो कई सालों तक रहती हैं। कालांतर में पुस्तकों के पृष्ठ अलग-अलग हो जाते हैं। तब बिखरे हुए पृष्ठों पर प्रकाशित सामग्री के रचयिता कौन है इस बारे में पता करना कठिन हो जाता है ।हम से पूर्व अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुईं  जिनके पृष्ठों पर कवि का नाम प्रकाशित नहीं था। इसलिए वे रचनाएं विवादास्पद रहीं। हमने बहुत विचार करने के बाद अपनी पुस्तकों के प्रत्येक पृष्ठ पर अपना नाम मुद्रित करवाया। कई लोगों ने इस बात का उपहास भी किया लेकिन बाद में इसी प्रक्रिया को उन्होंने भी अपनाया। मुझे याद आया कि जब मेरी पुस्तक  "हिरनीला मन" डॉ. कुँअर बेचैन जी के मार्गदर्शन में प्रकाशित हुई थी तब उसके प्रत्येक पृष्ठ पर मेरा एवं प्रकाशक का नाम अंकित हुआ था। यह डॉ कुँअर बेचैन जी की दूरदर्शिता एवं विचार शीलता का एक उदाहरण है। ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो डॉक्टर साहब की विचार शीलता को उद्घाटित करते हैं। 


सन 2018 को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से 6 कवि जिनमें कुँअर बेचैन जी एवं मैं भी सम्मिलित थे 15 दिन की इंग्लैंड काव्य यात्रा पर गए थे। वहां डॉक्टर साहब के इतने चाहने वाले श्रोता थे की मत पूछिए ।प्रत्येक शहर में प्रत्येक कवि सम्मेलन के बाद बहुत बड़ी संख्या में श्रोता  कुंँअर बेचैन जी को घेर कर खड़े हो जाते थे और उनके ऑटोग्राफ लेने लगते थे। डॉक्टर साहब इतने सरल इतने सहज कि आकाश की ऊंचाई पर होते हुए भी सदा हमारे साथ बड़ी विनम्रता से व्यवहार करते थे। हम उनसे मजाक भी कर लेते थे साथ में खूब कविताएं सुनते सुनाते थे ।आज वे दिन बहुत याद आ रहे हैं ।

बहुत कम लोग जानते हैं कि कुंँअर जी बहुत अच्छे चित्रकार भी थे।उनकी प्रकाशित अधिकांश पुस्तकों पर उनके द्वारा बनाए गए रेखा चित्र हैं।जब भी डॉ साहब अपनी पुस्तक किसी को भेंट करते थे तो प्रथम पृष्ठ पर शुभकामनाओं के साथ हस्ताक्षर करने से पहले बहुत सुन्दर चित्र बनाकर विशेष आशीर्वाद देते थे।


एक बात और बताना चाहूंगी। डॉ कुँअर बेचैन जी को कोई भी लेखक, रचनाकार पुस्तक भेंट करता था तो डॉक्टर साहब उस पुस्तक की राशि लेखक को अवश्य देते थे ।वह ना लेना चाहे तब भी जबरदस्ती उसकी जेब में रख देते थे ।इसके पीछे बहुत ठोस कारण था। वे कहते थे कि आजकल कोई भी प्रकाशक बिना पैसे लिए लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित नहीं करता। पुस्तक प्रकाशन में कितना परिश्रम एवं धन लगता है यह मैं भली-भांति जानता हूं। इसलिए किसी की भी पुस्तक मैं बिना मूल्य चुकाए नहीं लेता।और हाँ, मैं अपनी पुस्तक बिना मूल्य लिए देता भी नहीं हूं। मुझे याद आया जब डॉक्टर साहब ने अपना महाकाव्य "पांचाली" मुझे दिया तब अधिकार पूर्वक आदेशात्मक स्वर में मुझसे ₹500 मांगे यह कहते हुए की यह राशि मैं आपसे इसलिए ले रहा हूं जिससे आपको पुस्तकें खरीद कर पढ़ने का अभ्यास रहे।


बहुत कम लोग जानते हैं कि कुँअर जी बहुत अच्छे चित्रकार भी थे।उनकी प्रकाशित अधिकांश पुस्तकों पर उनके द्वारा बनाए गए रेखा चित्र हैं।जब भी डॉ साहब अपनी पुस्तक किसी को भेंट करते थे तो प्रथम पृष्ठ पर शुभकामनाओं के साथ हस्ताक्षर करने से पहले बहुत सुन्दर चित्र बनाकर विशेष आशीर्वाद देते थे।


पिछले पचास,पचपन वर्षों से डॉ कुँअर बेचैन जी हिन्दी कवि सम्मेलनों का इतिहास लिखने के लिए सामग्री एकत्रित कर रहे थे। प्रत्येक मंच पर वे कागज कलम लेकर मंच पर होने वाली हर गतिविधि को लिखते थे। जैसे शहर एवं स्थान का नाम, संयोजक, संचालक आयोजक एवं अध्यक्ष का नाम ,मंचासीन कवियों का नाम, किस कवि ने कौन सी कविता सुनाई उसकी प्रमुख पंक्तियां, कवि सम्मेलन में घटित होने वाली महत्वपूर्ण घटनाएं आदि आदि। पिछले 55 वर्षों से निरंतर लिखकर बहुत बड़ी संख्या में सामग्री एकत्रित कर ली थी डॉक्टर साहब ने ।अब समय था उस एकत्रित सामग्री पर मनन करके उसे ऐतिहासिक रूप देने का। लेकिन ईश्वर ने इतना अवकाश कुँअर जी को नहीं दिया। उनके लिखे इतने सारे पृष्ठ किसी न किसी फाइल में सुरक्षित होंगे। किसी न किसी डायरी में "कवि सम्मेलन का इतिहास" की रूपरेखा अंकित होगी। हमारा दायित्व है कि हम हमारी संपूर्ण सामर्थ्य के साथ डॉक्टर साहब के अधूरे कार्य को पूर्ण करें। ईश्वर हमें शक्ति दे कि हम यह कार्य कर पाएँ। 


हॉस्पिटल में एडमिट होने के तीन-चार दिन पहले मैंने डॉ कुँअर बेचैन जी को फोन किया और उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली। दूरदर्शन द्वारा मेरे व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक कार्यक्रम बनाने की योजना थी जिसमें कुछ व्यक्तियों को मेरे बारे में बोलने के लिए कहा गया था ।जब मैंने यह बात डॉक्टर साहब को बताई तो वह बोले देखो न कीर्ति जी मेरा कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि मैं आप पर बहुत कुछ बोलना चाहता हूं लेकिन आज मेरा स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा। गला बहुत खराब हो गया है। मैं अभी आपसे बातें भी बहुत मुश्किल से कर पा रहा हूं। मैंने कहा कोई बात नहीं डॉ साहब आप ठीक हो जाइए उसके बाद  वीडियो बना दीजिएगा ।मैं दूरदर्शन वालों को बता देती हूं। अगले दिन फिर डॉक्टर साहब का फोन आया और वे भारी मन से क्षमा मांगते हुए कहने लगे की मेरा बुखार अभी तक नहीं उतरा है ।मैं और आपकी चाचीजी अब अस्पताल में भर्ती होने जा रहे हैं ।वापस आ गए तो सबसे पहला काम आपका ही  करूंगा ।देखो ना आज कहने को बहुत कुछ है लेकिन कह नहीं पा रहा ।इतना विवश, इतना असहाय मैंने स्वयं को कभी भी महसूस नहीं किया ।मैंने बोला नहीं डॉक्टर साहब ऐसा मत कहिए। आप बिल्कुल ठीक हो कर आएंगे। हम साथ में बैठकर गोष्ठी करेंगे फिर आप जी भर कर बोलिएगा। बस डॉ कुँअर बेचैन जी से यही अंतिम बातचीत थी मेरी। आज अत्यन्त द्रवित ह्रदय से मैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हूं ।


डॉक्टर साहब के  दुनिया भर में अनेक शिष्य हैं। आज सारे अत्यंत दुखी हैं। जिसने भी डॉ कुँअर बेचैन जी को सुना है अथवा पढ़ा है अथवा जो उनसे मिला है वो उनके आकर्षण से बच नहीं सका है। ईश्वर से प्रार्थना है कि वे हम सबके आदरणीय और प्रिय डॉक्टर कुँअर बेचैन जी को उत्तम लोक प्रदान करें एवं अपने चरणों में स्थान दे ओम शांति शांति


आज आपकी अनेक काव्य पंक्तियां याद आ रही हैं जैसे-


जितनी दूर नयन से सपना

जितनी दूर अधर से हँसना

बिछुए जितनी दूर कुंआरे पाँव से

उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से।


नदी बोली समुन्दर से

मैं तेरे पास आई हूँ

मुझे भी गा मेरे शायर

मैं तेरी ही रुबाई हूँ।


मीठापन जो लाया था मैं गाँव से

कुछ दिन शहर रहा अब कड़वी ककड़ी है।


कल स्वयं की व्यस्तताओं से निकालूंगा समय कुछ

फिर भरूंगा कल तुम्हारी माँग में सिन्दूर

मुझको माफ करना

आज तो सचमुच बहुत देर ऑफिस को हुई है।


ज़िन्दगी का अर्थ मरना हो गया है

और जीने के लिए हैं

दिन बहुत सारे।


जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने

दादी की हँसुली अम्मा की पायल ने

उस पक्के घर की कच्ची दीवारों पर

मेरी टाई टँगने से कतराती है।


जिस दिन ठिठुर रही थी,कुहरे भरी नदी में,माँ की उदास काया,लेने चला था चादर, मैं मेजपोश लाया


सूखी मिट्टी से कोई भी मूरत न कभी बन पाएगी

जब हवा चलेगी ये मिट्टी खुद अपनी धूल उड़ाएगी

इसलिए सजल बादल बनकर बौझार के छींटे देता चल

ये दुनिया सूखी मिट्टी है तू प्यार के झींटे देता चल।


ऐसी अनेक गीत पंक्तियाँ हैं डॉ साहब की जो कवि सम्मेलन में श्रोताओं को मंत्रबिद्ध कर देती थीं।


ग़ज़लें भी एक से बढ़कर एक थीं।आपकी ग़ज़लों में भी गीत जैसी तन्मयता थी,गीत जैसा तारतम्य था।


पूरी धरा भी साथ दे तो और बात है

पर तू जरा भी साथ दे तो और बात है

चलने को एक पाँव से भी चल रहे हैं लोग

पर दूसरा भी साथ दे तो और बात है


दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना

जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना


दो चार बार हम जो कभी हँस हँसा लिए

सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए

संटी तरह मुझको मिले ज़िन्दगी के दिन

मैंने उन्हीं को जोड़ के कुछ घर बना लिए।


ज़िन्दगी यूं भी जली,यूँ भी जली मीलों तक

चाँदनी चार कदम धूप चली मीलों तक


ये सोचकर मैं उम्र की ऊँचाईयाँ चढ़ा

शायद यहाँ,शायद यहाँ,शायद यहाँ है तू

पिछले कई जन्मों से तुझे ढ़ूढ़ रहा हूँ

जाने कहाँ,जाने कहाँ,जाने कहाँ है तू


ग़मों की आँच पे आँसूं उबालकर देखो

बनेंगे रंग किसी पर भी डालकर देखो

तुम्हारे दिल की चुभन भी जरूर कम होगी

थेकिसी के पाँव से काँटा निकालकर देखो


साँचे में हमने और के ढ़लने नहीं दिया

दिल मोम का था फिर भी पिघलने नहीं दिया

चेहरे को आज तक भी तेरा इंतज़ार है

हमने गुलाल और को मलने नहीं दिया।


असंख्य पंक्तियाँ हैं, असीमित स्मृतियाँ हैं।

की।क्या लिखूं और क्या छोड़ूं।


1जुलाई 1942 को मुरादाबाद जिले के उमरी नामक गाँव में जन्में डॉ कुँअर बेचैन जी ने अपने जीवन में अनेक कष्ट सहे।इनका पूरा जीवन संघर्षों का महासमर रहा।बचपन में ही सिर से माता पिता का साया उठ गया था।बड़ी बहन और जीजाजी ने  पालन-पोषण किया। फिर बहन भी स्वर्ग सिधार गई। जीजाजी इन्हें लेकर चन्दौसी आ गए।चन्दौसी में ही आगे की शिक्षा ग्रहण की।


अनेक पुस्तकें इनकी प्रकाशित हैं। यथा

गीत संग्रह - 

पिन बहुत सारे,भीतर साँकल बाहर साँकल,उर्वर्शी हो तुम,झुलसो मत मोरपंख,एक दीप चौमुखी,नदी पसीने की,दिन दिवंगत हुए

ग़ज़ल संग्रह -

शामियाने कांच के, महावर इंतजारों का ,रस्सियाँ पानी की, पत्थर की बांसुरी, दीवारों पर दस्तक, नाव बनता हुआ कागज, आग पर कंदील, आंधियों में पेड़, आठ सुरों की की बांसुरी, आंगन की अलगनी, तो सुबह हो, कोई आवाज देता है, 

कविता संग्रह -

नदी तुम रुक क्यों गई, शब्द एक लालटेन, 

महाकाव्य- 

पांचाली 

ललित उपन्यास 

मरकत द्वीप की मणि

बाल कविताएँ,हाइकु,दोहे, लाखों पुस्तकों की भूमिकाएँ

तुम ही भरी बहार से आगे निकल गए

तुम मेरे इन्तजार से आगे निकल गए


अन्तिम प्रणाम डॉ साहब। अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि

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डॉ कीर्ति काले की स्मृति से

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रविवार, 16 अप्रैल 2023

साहित्यिक-क्रान्ति की आवश्यकता महसूस करते थे कुँअर बेचैन

 प्रदीप श्रीवास्तव–  नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते समय उपन्यासकार मारियो वार्गास लोसा ने कहा, ‘साहित्य समाज को समृद्ध, सुसंस्कृत बनाता है, चेतना का निर्माण करता है, आशाओं, आकांक्षाओं को प्रेरित करता है'। इस संदर्भ में आप भारत में क्या स्थिति पाते हैं। साहित्य की दशा–दिशा क्या है?

कुँअर बेचैन–   जी हाँ, मैं ख़ुद भी साहित्य को शब्दों की लोक-सभा में जागरूक चिंतन और संवेदनशील हृदय द्वारा दिया गया वह बयान मानता हूँ जो लोकहित में दिया गया हो। जिस बयान में लोक का यथार्थ चित्रण और उसकी विसंगतियों तथा विद्रूपताओं के दर्शन तो हों किंतु उसमें आदर्श का भी स्पर्श हो। उसमें समाज की चिंता के साथ-साथ कोई न कोई दिशा निर्देश भी हो। साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है तो वह इस अर्थ में कहा गया है कि उसमें समाज अपने चेहरे को देखकर उसमें अपने दाग़-धब्बों को भी देख सके किंतु इसके बाद दर्पण का दूसरा काम शुरू हो जाता है और वह यह कि वह उसके चेहरे को सँवारे भी। साहित्य का काम समाज का केवल यथावत चित्रण करना ही नहीं है वरन्‌ उसे सँवारना भी है। इस संबंध में मुझे मुंशी प्रेमचंद के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की याद आती है और नोबल पुरस्कार-प्राप्त मारियो वार्गास का वह कथन भी सार्थक लगता है जो आपने अपने प्रश्न में समाहित किया है।

इस संदर्भ में जहाँ तक भारत की स्थिति का प्रश्न है तो वह हम सबके सामने स्पष्ट है। वैसे इतिहास इस बात का साक्षी है कि हमारे साहित्य ने समाज को सदैव नई दिशा दी है किंतु आजकल ऐसा लगता है कि हमारे साहित्य की धार अब कुछ भोथरी हो गई है। सामने जो समाज की स्थितियाँ हैं वे पत्थर की तरह कठोर हैं। उन पर आज का साहित्य प्रहार तो कर रहा है किंतु वर्तमान व्यवस्था का पथरीलापन उसकी धार को कुंठित कर देता है।

प्रदीप श्रीवास्तव–  क्या हमारा साहित्य समाज को समृद्ध, सुसंस्कृत, चेतनामय बनाने, आशाओं, आकांक्षाओं को प्रेरित करने में सफल हो रहा है? यदि नहीं तो इसके लिए आप किन प्रयासों का होना ज़रूरी मानते हैं?

कुँअर बेचैन– आज का हमारा पूरा समाज एक नए आर्थिक युग से गुज़र रहा है जिसमें पैसे का महत्व बहुत बढ़ गया है। इधर चीज़ों के मूल्यों में बड़ा परिवर्तन होता रहा और उधर जीवन-मूल्यों में। वरन्‌ शायद यह कहना अधिक उचित होगा कि जैसे-जैसे वस्तुओं के मूल्य बढ़ते गए या ऊँचे मूल्य की वस्तुएँ सामने आने लगीं वैसे-वैसे समाज में जीवन-मूल्य गिरते चले गए। जीवन-मूल्यों का आधार नैतिक मूल्य थे, वे भी बदले। संवेदना और भावुकता का स्थान तर्क ने लिया किंतु तर्क से भी ऊँचा स्थान चालाकी और होशियारी ने ले लिया। अपनी परिस्थितियों के दवाब में नया समाज पहले के मुक़ाबले कम संवेदनशील होता चला गया। यह बात राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा साहित्यिक आदि सभी क्षेत्रों में हुई। साहित्य का प्रमुख आधार ही संवेदना है और साहित्य में जो संवेदना का तत्व है उसी के कारण पाठक या श्रोता प्रभावित होता है, उसी के कारण पाठक और श्रोता के हृदय में कोई रचना उतरती चली जाती है, किंतु यह प्रभाव भी उन्हीं पर अधिक पड़ता है जो लोग संवेदनशील होते हैं। समाज में जैसे-जैसे संवेदनशीलता का ह्रास होने लगता है वैसे ही वैसे साहित्य का प्रभाव भी कम होने लगता है। कारण चाहे कोई भी रहे हों किंतु यह सच है कि आजकल समाज में सबसे बड़ा संकट संवेदनशीलता का है।

जहाँ तक इस संबंध में किए गए साहित्यिक प्रयासों का प्रश्न है तो इसके जवाब में यह कहना चाहूँगा कि आज के साहित्यकार को ऐसे साहित्य-लेखन की आवश्यकता है जो एक ओर समाज के भावुक-वर्ग का मनोरंजन भी करता हो और दूसरी ओर मानव को संवेदनशील बना कर उसे सच्चा मानव बनाने में भी सहयोग कर रहा हो। यहाँ मैं यह कहना सबसे ज़्यादा ज़रूरी समझता हूँ कि आज के साहित्यकार को श्रेष्ठ और उद्देश्यपूर्ण बाल साहित्य लिखने की आवश्यकता है। आज के बच्चे पहले के बच्चों से कहीं ज़्यादा जागरूक और वयस्क हैं। इसलिए उनकी रुचियों को दृष्टि में रखते हुए प्रेरक बाल साहित्य को लिखने की ज़रूरत है। यही नहीं ऐसे साहित्य को जनता तक पहुँचाने के लिए विभिन्न माध्यमों का प्रयोग भी ज़रूरी है। जहाँ लेखकों का दायित्व बढ़ा है वहीं प्रकाशकों को ऐसे साहित्य को पाठक तक कम मूल्य में पहुँचाने का संकल्प लेना होगा। प्रिंट मीडिया को अपने अख़बारों में साहित्य को ज़्यादा से ज़्यादा पृष्ठ देने होंगे। ऐसी घटनाओं को सबसे महत्वपूर्ण स्थान और कॉलम में छापना होगा जो व्यक्ति में संवेदनशीलता को जगाने वाली हों तथा जो जीवन मूल्यों की सुरक्षा को रेखांकित करने वाली हों। यही नहीं उन घटनाओं को पीछे धकेलना होगा जो जीवन-मूल्यों का विघटन करने वाली हों। इस उद्देश्य को इन दिनों साहित्यिक-क्रांति का नाम देना ज़रूरी हो गया है।

प्रदीप श्रीवास्तव–  भारत सवा अरब लोगों का विशाल देश है लेकिन साहित्यकारों की पेशानी पर पाठकों, श्रोताओं की कमी की समस्या को लेकर चिंता की रेखाएँ साफ़ दिखती हैं। आप इसकी क्या वज़ह मानते हैं?

कुँअर बेचैन–  साहित्य के पाठकों और श्रोताओं की कमी के अनेक कारणों में से कुछ जो प्रमुख कारण हैं उनमें भी सबसे बड़ा कारण यह है कि आज जो साहित्य का पाठक है वह रोज़ी-रोटी के चक्कर में इतना अधिक फँसा है कि उसे चाह कर भी उस साहित्य को पढ़ने या सुनने का समय नहीं मिलता। साहित्य के पाठकों की संख्या को यदि टटोला जाए तो पता चलेगा कि साहित्य को पढ़ने वालों में मध्यम वर्ग की भागीदारी सबसे अधिक है। किंतु यही वर्ग सुबह से शाम तक रोटी को जुटाने में लगा हुआ है। उसके ज़िम्मे इतने काम हैं कि वह कुछ और सोचने लायक़ ही नहीं बचता। दूर–दराज़ से अपनी नौकरी के स्थानों तक पहुँचने में ही काफ़ी समय लग जाता है। घर आते ही वे घर के कामों में लग जाते हैं या फिर मनोरंजन के लिए टेलीविजन खोल लेते हैं। पहले जब टेलीविजन आदि जैसे मनोरंजन के साधन घरों में नहीं थे तो यह वर्ग पत्र-पत्रिकाओं तथा किताबों को पढ़ने में अपना समय लगाता था। आज टेलीविजन के आकर्षक चैनलों, मोबाइल एवं कंप्यूटर ने साहित्य के पाठकों के इस ख़ाली समय को भी अपनी तरफ़ मोड़ लिया है। निम्न वर्ग के लोग अख़बार पढ़ कर ही अपने पाठक होने का सबूत देकर अपने पाठन की इतिश्री कर लेते हैं। समाज का उच्च वर्ग अपने व्यापार-कार्य में इतना उलझा रहता है कि उसे भी यह मौक़ा नहीं मिलता कि वह साहित्य के पठन के लिए थोड़ा समय निकाल सके। पहले घरों में पढ़ने-लिखने वाली महिलाएँ साहित्यिक कृतियों को पढ़ने में अपना ख़ाली समय गुज़ारती थीं। किंतु अब अधिकतर पढ़ी-लिखी महिलाएँ काम-काजी महिलाएँ हैं। वे ऑफ़िस जाती हैं, घर के भी काम करती हैं। साफ़ है कि उनके पास भी समयाभाव है। जहाँ तक विद्यार्थियों का प्रश्न है वे भी अपने प्रोफ़ेशनल कोर्स की पढ़ाई में फँसे हैं। बड़े-बड़े कोर्स हैं उनके पढ़ने के लिए। लिहाज़ा उनके पास भी साहित्य को पढ़ने का समय नहीं है। छोटे बच्चों के पास भी इतना होम-वर्क होता है कि उन्हें उसे पूरा करने से ही फ़ुर्सत नहीं। और यदि कुछ समय उनके पास है भी तो वह वीडियो-गेम तथा टेलीविज़न के देखने में निकल जाता है।

मैंने अनेक बुज़ुर्ग लोगों को यह कहते सुना है कि वे किस प्रकार से अपने प्रिय लेखक की पुस्तक को हासिल करने के लिए मीलों चलते थे और उसे प्राप्त करते थे। अब पढ़ने की ऐसी ललक कहाँ है?

प्रदीप श्रीवस्तव– साहित्य और पाठक दोनों को एक सिक्के का दो पहलू बनाने या फिर दोनों के बीच की दूरी समाप्त करने के लिए क्या होना चाहिए?

कुँअर बेचैन– यह सच है कि साहित्य और पाठक का अन्योन्याश्रित संबंध है। या यूँ कहें कि दोनों का चोली–दामन का साथ है। किंतु इन दिनों इनमें जो दूरी बढ़ रही है, उसको घटाना बहुत ज़रूरी हो गया है। श्रेष्ठ साहित्य और समाज के बीच की दूरी जितनी ही घटेगी उतना ही अपना देश भीतरी तरह से, अर्थात् संवेदना के स्तर पर समृद्ध होगा। इस दूरी को कम करने के लिए सबसे पहले तो साहित्यकारों को ऐसे साहित्य की सर्जना करनी होगी जो भाषा की दृष्टि से सरल हो, समाज के मनोविज्ञान को पहचान कर उसकी समस्याओं को रेखांकित करने वाला हो, समाज को ऐसा लगे कि रचनाकार उसकी चिंता कर रहा है और उसकी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ रहा है। साथ ही रचनाकार को अपनी रचनाओं में रोचकता के तत्व का भी समावेश करना होगा। दूसरी ओर समाज, देश और सरकार को भी कुछ ऐसे प्रयास करने होंगे जिनके कारण समाज में साहित्यकार की प्रतिष्ठा बढ़े तथा साहित्य से उसका लगाव भी बढ़े। आज के रचनाकार को युवा-वर्ग की समस्याओं को भी अपने साहित्य का विषय बनाना होगा और उनका विश्लेषण करते हुए तर्क और संवेदना दोनों का सहारा लेकर अपने लेखन को सँवारना होगा। युवा-वर्ग एक अलग प्रकार के निराशा के दौर से गुज़र रहा है, वह डिप्रेशन में है। रचनाकार को अपनी रचनाओं के माध्यम से उसे आशावादी बनाना होगा, उसे हौसला देना होगा, उसे सकारात्मक सोच वाला बनाना होगा।

प्रदीप श्रीवस्तव–  मतलब यह है कि यदि साहित्य अधिसंख्य समाज का हो जाए या उन्हें अपने साथ जोड़ ले तो तमाम बुराइयों, अव्यवस्थाओं से मुक्ति मिल सकती है। आख़िर साहित्य समाज को समृद्ध, सुसंस्कृत चेतनापूर्ण आदि-आदि बनाता है। इस सदर्भ में बतौर साहित्यकार आप देश या समाज से क्या अपेक्षा रखते हैं?

कुँअर बेचैन– जी हाँ, मेरा विश्वास है कि यदि साहित्य अधिसंख्य समाज का हो जाए तो समाज का रूप ही दूसरा होगा। साहित्य क्योंकि अपने साथ सहिष्णुता का भाव जोड़े रहता है इसलिए समाज के अधिकांश लोग एक दूसरे के दर्द को समझने लायक़ बनेंगे, अधिक अनुशासित रहेंगे और सच्चे नागरिक बनेंगे। हाँ, इस संबंध में साहित्यकार के अपने दायित्व तो रहेंगे ही साथ ही सरकार, देश और समाज को भी अपनी ओर से प्रयास करने होंगे। इन्हें भी सोचना होगा कि साहित्य और समाज के बीच की दूरी को कैसे कम किया जाए। रूस के लोगों ने इस संबंध में ख़ूब सोचा था। उनके यहाँ शहीदों और साहित्यकारों को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया। हम सभी जानते हैं कि उन्होंने अपने देश के प्रिय कवि कीव के नाम पर कीव नाम के शहर को ही बसा दिया है। मुझे 1987 में वहाँ जाने का अवसर मिला तो मैंने देखा कि वहाँ के बाज़ारों में जो दूकानें थीं उनमें से अधिकांश दूकानें या तो किसी साहित्यकार के नाम से थीं या शहीदों के नाम से। साहित्यिक जागृति ऐसे पैदा की जाती है। क्या हमारे देश में ऐसा नहीं हो सकता?

अपने देश में हरित क्रान्ति तथा अन्य क्रांतियों की तरह चाहे कुछ दिनों के लिए ही सही साहित्य क्रांति को लाना ही होगा। हमारे देश में साधनों की कमी नहीं है, कमी है तो संकल्प-शक्ति और अपने अंदर चाह जगाने की। प्रयास तो किए ही जाने चाहिए परिणाम चाहे कुछ भी निकले। इस संदर्भ में मुझे अपनी ही चार पंक्तियाँ याद आ गई हैं और वह यह हैं– ‘किसी भी काम को करने की चाहें पहले आती हैं/अगर बच्चे को गोदी लो तो बाँहें पहले आती हैं/हर इक कोशिश का दर्जा कामयाबी से भी ऊँचा है / कि मंज़िल बाद में आती है, राहें पहले आती हैं।’

प्रदीप श्रीवास्तव– संघर्षों की एक बड़ी गाथा रहा है आपका जीवन, कुछ उसके एवं अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में बताइए।

कुँअर बेचैन– मेरी साहित्य चेतना में मेरे अपने व्यक्तिगत जीवन का बड़ा योगदान रहा है और उसी के माध्यम से आप को भी मेरे साहित्य के मर्म को पहचानने में अधिक सुविधा रहेगी। मैं उत्तर प्रदेश के ज़िला मुरादाबाद के एक छोटे से क़स्बे कांठ के पास छोटे से उमरी नामक गाँव में 1 जुलाई, 1942 को पैदा हुआ। मेरे पिताश्री नारायण दास सक्सेना का निधन तब ही हो गया जब मैं मात्र 2 महीने का था। पिता जी की मृत्यु के तुरंत बाद माँ मुझे और मेरी दो बड़ी बहनों को लेकर अपनी माँ यानी मेरी नानी के घर जो गजरौले के पास के गाँव शाहपुर में था आ गई। लगभग डेढ़ वर्ष तक मैं अपनी माँ और दोनों बहनों के साथ नानी के यहाँ ही रहा। फिर दो साल की उम्र तक अपने छोटे मौसा जी के यहाँ मुरादाबाद में रहा। मुरादाबाद में जब मेरी बड़ी बहन की विदाई हो रही थी तब ही कोई आदमी मुझे अपहृत करने के उद्देश्य से उठाकर भागा। बारातियों ने उसे घेर लिया और उसे पुलिस में दे दिया। ये सब ख़ानदानी रंजिश के कारण हो रहा था। मेरे पिताश्री की भी मृत्यु प्राकृतिक मृत्यु नहीं थी। मेरी माँ ने मुझे सुरक्षित रखने की दृष्टि से मुरादाबाद से बाहर जाने की सोची।

दुर्भाग्य से मेरी माताश्री का भी उस समय देहांत हो गया जब मैं कक्षा तीन का छात्र था और मेरी उम्र 8 वर्ष की थी। इसके बाद भी दुर्भाग्य ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मेरी बहन भी उस समय दिवंगत हो गई जब मैंने पाँचवाँ दर्जा पास किया था और मैं मात्र 10 वर्ष का था। बस तब ही से घर की चाबी-कुंजी मेरे हाथ में आ गई। मैं और बहनोई साहब मिलकर उल्टा-सीधा खाना बना लेते थे। जहाँ तक मेरी साहित्यिक यात्रा की बात है, तो वह यह है कि जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था तो हँसी-हँसी में ही मैंने तुकबंदी करनी शुरू कर दी थी। सन् 1965 में जब मैं गाज़ियाबाद प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुआ तो दिल्ली और दिल्ली के कवियों के संपर्क में आया। इन्हीं दिनों मुझे दिल्ली आकाशवाणी और बाद में दूरदर्शन पर भी बुलाया जाने लगा और इस माध्यम से भी मैं धीरे-धीरे कवि रूप में प्रतिष्ठित होने लगा। इन दिनों मेरा एक गीत बहुत चर्चित हुआ जो मैंने सन् 1961 में लिखा था जिसके बोल थे – ‘जितनी दूर नयन से सपना/जितनी दूर अधर से हँसना/बिछुए जितनी दूर कुँवारे पाँव से/उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से।’

इसी गीत के कारण मैं पूरे हिंदुस्तान में होने वाले कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा और सराहा भी जाने लगा। तब से लेकर आज तक लगभग पिछले 52 वर्षों से मैं कवि सम्मेलनों के मंच पर हूँ। मुझे यह कहते हुए भी प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि न केवल भारत वर्ष के शहरों और गाँवों में वरन्‌ विदेशों में भी मुझे कविता पाठ करने का मौक़ा मिला। सबसे पहले 1984 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम ज्ञानी जैल सिंह जी के प्रतिनिधित्व में मॉरीशस जाने का मौक़ा मिला और वहाँ के कई गाँवों और शहरों में कविता पाठ का अवसर मिला। मॉरीशस के राष्ट्रपति महामहिम शिव सागर रामगुलाम के निवास पर भी कविता पाठ का गौरव मिला। 1990 में दो बार मॉरीशस जाना हुआ तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अनिरुद्ध जगन्नाथ जी के निवास पर भी कविता पाठ का अवसर मिला। इसके बाद तो अन्य 17 देशों में भी जाने का मौक़ा मिला जिनमें रूस, सिंगापुर, इंडोनेशिया, मस्कट, कनाडा, सूरीनाम, हॉलैंड, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, लक्समबर्ग, स्विट्जरलैंड, पाकिस्तान, जापान भी शामिल हैं। इन देशों के साथ ही चार बार अमरीका के लगभग 18 शहरों में, चार बार यूके के लगभग 14 शहरों में तथा चार बार दुबई जाने का मौक़ा मिला। अब तक मेरी 34 पुस्तकें प्रकाशित हो गईं, जिनमें गीत-नवगीत संग्रह, ग़ज़ल संग्रह, अतुकांत कविताओं के संग्रह, दोहा संग्रह, हाइकु संग्रह, पांचाली नामक महाकाव्य, उपन्यास आदि हैं। मैंने लगभग 150 पुस्तकों की भूमिका भी लिखी है। इसके अतिरिक्त अनेक लघुकथाएँ भी प्रकाशित हुई हैं।

पुस्तकों के प्रकाशित होने का लाभ यह मिला कि मेरे साहित्य पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हुए। जिनकी संख्या अब 22 है। मेरठ, रुहेलखंड तथा बड़ौदा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में कविताएँ संकलित हैं। महाराष्ट्र तथा गुजरात बोर्ड के और गल्फ़ कंट्रीज़ के पाठ्यक्रमों में भी मेरी कविताएँ संकलित हैं।

मेरा यह भी सौभाग्य रहा कि मेरे गीत फ़िल्मों में भी लिए गए। ‘कोख’ नाम की फिल्म में ‘बिछुए जितनी दूर कुँवारे पांव से’ गीत लिखा गया जिसे प्रसिद्ध संगीतकार रवींद्र जैन जी के संगीत-निर्देशन में हेमलता जी ने गाया था। इसी प्रकार यू.के. के प्रसिद्ध नेत्र विशेषज्ञ और फ़िल्म प्रोड्यूसर एवं निर्देशक श्री निखिल कौशिक की फ़िल्म ‘भविष्य द फ़्यूचर’ में भी दो गीत लिए गए। यही नहीं मेरे गीतों को दूरदर्शन पर भी फ़िल्माया गया। दूरदर्शन के एक सीरियल ‘क्या फ़र्क पड़ता है’ के लिए भी थीम सॉन्ग तथा और गीत भी लिखे। इसी प्रकार टीवी की कुछ आर्ट फ़िल्मों में भी गीत लिखे।

मेरे द्वारा किए गए कविता पाठ के कई कैसेट और सीडी भी बनी हैं। ऐसी भी कई सीडी बनीं जिनमें मेरी ग़ज़लों को दूसरे गायकों ने गाया। एक ऐसी सीडी भी है, जिसमें मैंने अपनी ग़ज़लों को गायक के रूप में संगीत के साथ गाया है। संगीत दिया है ज्ञानदीप ने और फ़िल्मांकन श्री हेमंत कुमार ने किया है। अभिनय कुमाऊँ के अनेक फ़िल्म–कलाकारों का है।

प्रदीप श्रीवास्तव– कॉर्पोरेट घराने अपनी सोशल रिसपॉन्सिबिलिटी के तहत समाज के लिए काफ़ी कुछ करते रहते हैं। खेलों के संवर्धन से लेकर कला, साहित्य, संस्कृति के संवर्धन के लिए भी। उनके इन प्रयासों के बारे में क्या कहना चाहेंगे।

कुँअर बेचैन– साहित्यकारों और उनके साहित्य को प्रोत्साहित तथा प्रचारित करने में पुराने समय में राजाओं और राजघरानों का जैसा योगदान रहा है और जैसा उनमें पारस्परिक संबंध रहा उसी प्रकार का गहरा संबंध आज के समय में कॉर्पोरेट घरानों और साहित्य का रहा है। सभी जानते हैं कि वीरगाथा काल के कवि और ‘पृथ्वीराज रासो’ जैसे महाकाव्य के रचयिता चंद्रवरदाई पृथ्वीराज के राजदरबार के कवि थे। ऐसे ही आगे चलकर महाकवि बिहारीलाल राजा जयसिंह के और कवि रहीमदास अकबर के तथा कविवर भूषण एवं केशव राजा छत्रसाल के राजदरबार में रहे। इन सभी को कवि की पहचान देने में तथा उनको प्रोत्साहित करने में राजाओं का भरपूर योगदान रहा। पुराने समय से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक के अनेक शायर भी अनेक राजघरानों से संबंधित रहे। मिर्ज़ा गालिब को भी कई राजघरानों से वज़ीफ़ा मिला था। कहने का आशय यही है कि साहित्य और राजघरानों का घनिष्ठ संबंध रहा है।

वर्तमान समय में राजा-महाराजा तो हैं नही, आज ‘कार्पोरेट घरानों’ से साहित्य को भी संरक्षण मिल रहा है। अनेक कम प्रख्यात और सर्व प्रसिद्ध कॉर्पोरेट घराने किसी न किसी प्रकार से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप में साहित्य का संरक्षण कर रहे हैं। इसे और बढ़ावा मिलना चाहिए ।


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प्रदीप श्रीवास्तव से बातचीत

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साभार-सहित्यकुंज


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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

धूमिल की स्मृति धूमिल नहीं हुई

कितने कमाल का संयोग है कि यह चित्र जो आज मेरी निगाह में आया है, ठीक पचास साल पुराना है। ज़रा ज़ूम करके देखिए, पच्चीस फ़रवरी तिहत्तर। आज भी पच्चीस फ़रवरी है। इस ग्रुप फोटोग्राफ में अंतिम पंक्ति में दूसरा मैं हूँ। पहली पंक्ति में दूसरी ओर से दूसरे हैं कवि धूमिल। जितने भी साहित्यकार इसमें हैं लगभग सभी से मेरा व्यक्तिगत परिचय रहा है। सोचिए कितने संस्मरण होंगे मेरे पास। कितनी सारी स्मृतियां तो धूमिल भी हो चुकी हैं, पर धूमिल की धूमिल नहीं हुईं। कुछ यहाँ शेयर करूंगा।

—अशोक चक्रधर

ग्रुप-फोटो में उपस्थित लेखकों के नाम निम्न-लिखित हैं—

अखिल भारतीय प्रगतिशील साहित्यकार सम्मेलन बाँदा उत्तर प्रदेश 

दिनांक 22-25 फ़रवरी 1973

बैठे हुए : सर्वश्री 1. रमेश सिन्हा 2. श्याम सुंदर घोष 3. कन्हैया जी 4. मन्मथनाथ गुप्त (सदस्य संयोजन समिति) 5. डॉ. रणजीत (सचिव संयोजन समिति) 6. शिव दान सिंह चौहान (सदस्य संयोजन समिति) 7. केदारनाथ अग्रवाल (अध्यक्ष, संयोजन समिति) 8. डॉ. भगवत शरण उपाध्याय 9. अमृत राय (सदस्य संयोजन समिति) 10. त्रिलोचन (सदस्य संयोजन समिति), 11. राजीव सक्सेना (सदस्य संयोजन समिति), 12. अजित मोहन अवस्थी (सदस्य संयोजन समिति), 13. विश्वम्भर उपाध्याय (सदस्य संयोजन समिति), 14. हरिहर जी, 15. सुदामा प्रसाद पांडेय धूमिल, 16 चन्द्रभूषण तिवारी।  

खड़े हुए प्रथम पंक्ति में : सर्वश्री 1. राजन, 2. अमरकांत, 3. प्रवासी, 4. खगेन्द्र प्रसाद ठाकुर, 5. कैलाश सोनी, 6. जगदेव उपाध्याय, 7. रामगोपाल सिंह चौहान, 8. जितेंद्र रघुवंशी, 9. दिनेश सन्यासी, 10. अयोध्या, 11. सनत कुमार, 12. अंकिमचन्द्र, 13. सुभेन्दु पटेल, 14. योगेंद्र शर्मा, 15. एस. अतिबल, 16. लक्ष्मण दत्त गौतम, 17. सुरेन्द्र नाथ तिवारी, 18. कर्ण सिंह चौहान। 

द्वितीय पंक्ति में : सर्वश्री 1. रमेश रंजक, 2. अशोक चक्रधर, 3. सुधीश पचौरी, 4. राणा प्रताप सिंह, 5. ब्रजकुमार पांडे, 6. वाचस्पति उपाध्याय, 7. बिजेन्द्र, 8. असगर वजाहत, 9. मनमोहन, 10. अवधेश प्रधान, 11. उदय चित्रांशी, 12. सव्यसाची, 13. रमेश राजहंस, 14. सुरेश पांडेय, 15. श्यामबिहारी राय, 16. सुमंत कुमार, 17. आनंदप्रकाश, 18. प्रभुनारायण झींगरन, 19. रामकृष्ण पांडेय, 20 उद्भ्रांत, 21 वीरेंद्र सुमन, 22. रमेश उपाध्याय, 23. कामतानाथ, 24. चंद्रप्रकाश पांडेय, 25. अनूप अशेष, 26. अजित मुस्कान, 27. कपिल आर्य, 28. शांति निगम

अब प्रस्तुत है--

सन् 2003 में कादम्बिनी के मेरे स्थाई-स्तंभ ‘मंच-मचान’ का एक लेख 

धूमिल ने पूछा भूख क्या होती है

ये बात है 25 फ़रवरी 1973 की। बांदा में आयोजित तीन दिवसीय प्रगतिशील लेखन सम्मेलन का यह तीसरा दिन था, जिसके समापन समारोह के रूप में कविसम्मेलन होना था। बाज़ार की चर्चाओं में यह बात शामिल थी कि भारत के कोने-कोने से बड़े टॉप के कवि आए हुए हैं। शहर को रात का इंतज़ार था। 


विलक्षण बनारसी ठसक

सम्मेलन का आकर्षण थे धूमिल इसमें कोई दो राय नहीं। ठेठ ग्रामीण सज-धज में एक बिखरा-बिखरा लेकिन निखरा-निखरा सा व्यक्तित्व। शानदार कद-काठी, उस पर सर्दियों के कारण मोटा गर्म कुर्ता सिलेटी से रंग का, उस पर गर्म जाकेट और एक अदद चौखाने का भारी कम्बल, जिसका एक छोर रोमन राजाओं की तरह ज़मीन पर घिसटता हुआ चलता था। वे स्वयं चलते थे मत्तगयंद छंद वाली चाल में, झूमते हुए। चलते-चलते अपनी मोटी खादी की धोती की लांग भी ठीक करते जाते थे। उनके अगल-बगल कुछ अतिवामपंथी नौजवान चलते थे। एक निराला ही अंदाज़ था धूमिल का। 

भूख क्या होती है

निराला जी को मैंने देखा नहीं पर यों ही अनुमान लगा रहा हूं कि कुछ ऐसा ही अंदाज़ उनका भी रहा होगा। धूमिल ज़ोर-ज़ोर से बोलते थे, इसलिए नहीं कि वे जो बोल रहे हैं सबको सुनाना चाहते हैं, बल्कि उनका हाई वौल्यूम में बोलना शायद चौपाल पर बतियाने के उनके देशज अभ्यास के कारण रहा होगा। मुझे लगता था जैसे वे प्रसाद की कहानी से निकल आए कोई पात्र हैं जिनमें एक विलक्षण बनारसी ठसक है। मैं धूमिल को मुग्ध भाव से देख रहा होता था। 

संगठन गोष्ठी की बहस शिखर पर चल रही थी। हर कोई मार्क्स और एंगिल्स की टिप्पणियां उद्धृत कर रहा था। एक बिंदु ऐसा आया जब अचानक धूमिल खड़े हुए और बोले- देखिए आप लोग हैं मार्क्स के रसोइए और ये जान लीजिए कि मैं खुद मार्क्स हूं। क्या आप बता सकते हैं कि भूख क्या होती है?'

बहस रुक गई

सारी बहस कुछ पल के लिए रुक गई। 

फ़िलहाल मैं भी रुकता हूं। धूमिल की धूमिल न होने वाली और रंजक जी की कुछ और रंजक बातें अगली बार। और अगली बार ही उस रात के कविसम्मेलन का वर्णन ब्यौरेवार। अभी धूमिल की स्मृति को समर्पित है मेरी एक कविता-

यमदूत यमराज को रिपोर्ट सुना रहा था,

यमराज को गुस्सा आ रहा था-

क्या कहा, ये भी भूख से मरा,

कहते हुए शर्म नहीं आती ज़रा!

क्या बकता है?

भूख से कोई कैसे मर सकता है?


यमदूत घिघियाया- मौताधिपति! 

पड़ौसियों ने तो यही बताया।

घर में नहीं थे अन्न के दाने, 

ये लगा घास की रोटी चबाने।

महाजन को ज़रा भी दया नहीं आई,

बिना पैसे अनाज की 

बोरी नहीं खुल पाई।

इस प्रकार हे डैथाधीश! 

ये भूख से मर गया

और राम के नाम को

सत्य कर गया।

यमराज सुनकर 

पलभर को हुए उतावले,

फिर बोले- बावले!

ये भूख से नहीं, 

कुपोषण से मरा है, 

इंसान द्वारा इंसान के 

शोषण से मरा है।

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अशोक चक्रधर 

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धूमिल : अंतिम दिनों में

 पिता जी को जब सर सुंदरलाल हास्पिटल, वाराणसी के डाक्टरों ने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा कि इनके ब्रेन में ट्यूमर है, इन्हें तुरंत लखनऊ ले जाइए, तो उन्हें गांव के दो लोग राजेश्वरी प्रसाद सिंह,राम मूरत सिंह एवं चाचा कन्हैया पाण्डेय और लोकनाथ पाण्डेय साथ लेकर लखनऊ रवाना हुए। वहां उन्हें रेफर्ड स्थान पर(किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज) भर्ती करा दिया गया। तथा पूर्व परिचित गीत के मीत ठाकुर प्रसाद सिंह से अस्पताल में समुचित चिकित्सकीय सुविधा के लिए लोग उनके कार्यालय पहुंचे।उस समय फ़ोन की इतनी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। ठाकुर प्रसाद सिंह उस समय निदेशक, सूचना जनसंपर्क थे। और पिता जी से सहज स्नेह करते थे।1970 में उनकी भाषा की प्रशंसा में नामवर सिंह जी को संदर्भित करते हुए एक लेख लिखा था ,जिसे लेकर काशी में विशेष चर्चा थी । ठाकुर प्रसाद सिंह जी के प्रशासनिक सहयोग से चिकित्सा आरंभ हो गई। वहां लखनऊ शहर के लोग श्रीलाल शुक्ल, कुंवर नारायण, अमृत लाल नागर, नरेश सक्सेना, विनोद भारद्वाज, विनय श्रीकर में से कोई न कोई रोज -ब-रोज‌‌‌ हालचाल पूछने आते थे। स्थानीय समाचार पत्रों में ख़बरें छपने लगीं कि हिंदी के युवा कवि धूमिल की हालात ठीक नहीं है। स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है । पिता जी एक दिन परिवार के जो लोग वहां थे, सबको पूरी गंभीरता से, लगभग समझाते हुए कहा कि देखो, दो बातें गांठ मार लो। जो भी हमसे मिलने आ रहे हैं,उसको चाय, पानी अवश्य पिलाना। जैसे घर, गांव में होता है। दूसरी बात ध्यान रखो कि कोई कुछ पैसा रुपया दे रहा हो तो लेना मत! भर्ती कराने के कुछ दिन बाद ठाकुर प्रसाद सिंह ने कहा कि देखो यदि सुधार नहीं होता है तो इन्हें बेल्लूर भेजवाते हैं? यह बात ठाकुर प्रसाद सिंह जी बेड के पास खड़े होकर चाचा से कह रहे थे, तभी पिता जी ने प्रत्युत्तर में कहा कि हमको तो आप भेजवा देंगें लेकिन इनका क्या होगा, जो हमसे पहले से कराह रहें हैं? ठाकुर प्रसाद सिंह जी चीजों को समझ कर चुपचाप चलते बने! कुछ दिन के बाद ख़बर छपी कि उत्तर प्रदेश सरकार की देखरेख में धूमिल जी की समुचित चिकित्सा व्यवस्था चल रही है। ख़बर छपने के दूसरे दिन विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान विपक्ष के नेता शतरुद्र प्रकाश ने स्वास्थ्य मंत्री से पूछा कि सरकार जनकवि धूमिल की चिकित्सा के लिए क्या कर रही हैं? वे यहां महीनों से भर्ती हैं? इस कार्यवाही के बाद मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा उनको देखने आए। मुख्यमंत्री के साथ उनका पूरा लाव लश्कर था। साथ में ठाकुर प्रसाद सिंह जी भी आए थे। ज्यों ही बहुगुणा जी अस्पताल वार्ड में घुसे (बेड नं 02दरवाजे से लगा हुआ था), स्नेह बस ठाकुर प्रसाद सिंह जी ने सिरहाने की ओर थोड़ी तेजी से आगे बढ़ कर पूछा, कैसे हैं? मुख्यमंत्री ने कहा कि ठाकुर इनको विदेश भेजवाने की व्यवस्था करो। पिता जी के आंखों में आंसू छलक उठे। वे तुरंत बोल उठे, हाथों से अपने अगल बगल इशारा करते हुए कहा कि, अरे इनका क्या होगा? और उनकी आंखें बन्द हो गईं। मुख्यमंत्री अपने लाव लश्कर के साथ बाहर जा चुके थे। बड़े चाचा कन्हैया पाण्डेय जी औपचारिक रूप से साथ निकल गये। छोटे चाचा लोकनाथ पाण्डेय जी वहीं काठ हो गये। बहुत कारुणिक दृश्य था। थोड़ी देर बाद पिता जी की आंखें खुलीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, कन्हैया कहां हैं? तब तक चाचा जी वार्ड में प्रवेश कर बोले, बोलिए क्या बात है। चाचा ने कहा अरे मुख्यमंत्री, ठाकुर भाई को लिवाकर आए थे। आपने नहीं देखा? 

पिता जी बोल पड़े, अरे कन्हैया सब देखा।समझा भी। अब हम बच नहीं पाएंगें।यह सब नाटक है।

रह रह कर उनको ग़श्ती (कोमा) आ जाती थी।


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रत्नशंकर पाण्डेय की स्मृति से 
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धूमिल की संवेदनशीलता : एक उदाहरण

 एक बार पिता जी जब आई टी आई,करौदी, वाराणसी के परिसर में प्रवेश कर रहे थे,तभी कार्यालय से रोते हुए चपरासी बाहर निकल रहा था। उन्होंने अपनी साइकिल खड़ी की और चपरासी को बुलाया। चपरासी से पूछा, क्यों, क्या हुआ? वह फूटफूट कर रोने लगा। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। पिता जी ने उसे ढ़ाढ़स बधाया। वह चुप हुआ और बताया कि रात में बच्चे को हैजा हो गया था। इलाज़ के लिए रात भर उसे कबीर चौरा अस्पताल में भर्ती कराकर,उसी की देखरेख में आज आफिस आने में देर हो गई। प्रिंसिपल साहब अपना दुखड़ा सुनाया। उन्होंने मेरी एक न सुनी। मैं गिड़गिड़ाता रहा।वे मुझे गाली देते हुए दो तीन थप्पड़ मारे और बाहर निकल जाने के लिए कहा। ऐपसेंट भी कर दिए।अब मैं क्या करूं? घर जा रहा हूं ‌। पिता जी ने उसके बच्चे का हाल पूछा। अब उसे कुछ आराम है। चपरासी को साथ लिवाकर,वे प्रधानाचार्य के चैम्बर में गये। बात बढ़ी। उन्होंने प्रधानाचार्य से पूछा कि आपने उसे ऐपसेंट तो कर दिया लेकिन उसे मारा क्यों? बात बढ़ती गई। कुछ दिन बाद धूमिल जी को उस घटना को लेकर स्थानांतरण झेलना पड़ा। 

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रत्न शंकर पाण्डेय की स्मृति से 

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डॉ० कुँअर बेचैन - विभिन्न नज़रों में

डॉ० कुँअर बेचैन
हिन्दी जगत के स्वीकृत लोकप्रिय कवि


डॉ० कुँअर बेचैन हिन्दी जगत के स्वीकृत लोकप्रिय कवि हैं। हिन्दी ग़ज़ल और गीत में जैसे उन्हें सिन्द्धी प्राप्त है। कवि-सम्मेलनों के मंच से लेकर लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में उनके यश का आलोक फैला हुआ है। भारतवर्ष के बाहर अनेक देशों में उनके नाम और काव्य की प्रशंसा है। रचनाधर्म ही जैसे उनका जीवन है। लगभग पन्द्रह गीत और गजल संग्रहों के बाद अब उनका नया जनगीत-संग्रह 'नदी पसीने की नाम से हिन्दी प्रेमियों के हाथों में आ रहा है। मुझे विश्वास है कि हिन्दी-संसार इस संग्रह की भी पूर्ण स्वागत करेगा।

                                                        -भारत भूषण

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कुँअर आम आदमी की जुबान का कवि

डॉ० कुँअर बेचैन जन-जन के कवि हैं। भाषा और विषयवस्तु के कारण उनकी रचनाएँ लोकप्रिय होती रही हैं। आज के कवियों में बेचैन का अपना एक विशिष्ट स्थान है। उनके गीतों और गजलों में आम आदमी की जुबान को अभिव्यक्ति मिली है। उनकी अनेक विधाओं में अनेक उपलब्धियाँ हैं। प्रस्तुत गीतों में उनकी जनवादी छवियाँ देखते ही बनती है। मैं उनकी निरन्तर उन्नति की कामना करता है। 

- पद्मश्री गोपाल दास नीरज

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 कुँअर की कविता गंगा की तरह

जब तक हिमालय जैसा पर्वत नहीं, तब तक गंगा जैसी पवित्र नदी नहीं निकलती । कवि की कविता उसके व्यक्तित्व की द्रवित भावना है। डॉ० कुँअर बेचैन की कविता उनके व्यक्तित्व की पहचान है। उनका व्यक्तित्व यदि हिमालय है तो उनकी कविता गंगा नदी पसीने की' नामक संग्रह मे डॉ० वेचैन की कविता आम आदमी के दुख-दर्द, उसके संघर्ष और उसकी जिजीविषा के रूप में मुखरित हुई है। 

-उदयप्रताप सिंह 

कवि, सांसद राज्यसभा

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कुँअर का लेखन तराशे हुए हीरे की तरह


डॉ० कुँअर बेचैन का लेखन तराशे हुए हीरे की तरह अनेक पहलुओं वाला है। उसमें से कब किस रंग का

 किरणपुंज परावर्तित हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। जनगीतों का यह संग्रह कुंजर के उस सृजनकोश की मंजूषा को खोल रहा है, जिसमें जरूरी संवेदन की पूँजी संग्रहीत है, सभी के भावात्मक लाभांश के साथ। मेरा विश्वास है कि इस मधुपर्क का जन-जन याचक की मुद्रा में अँजुरी भर-भर कर पान करेगा। कोटि-कोटि शुभकामनाएँ।

-सोम ठाकुर

बेचैन एक प्रतिभाशाली गीत-कवि

पिछले पचास-साठ वर्षों में गीत ने अनेक करवटें ली हैं और प्रत्येक करवट पर अपने तेवर बदले हैं। गीत ने आम आदमी की भावुकता को गाया तो उसकी पीड़ा का भी उतनी ही गहनता के साथ लेखांकन किया। गीत ने प्रगतिशील गीत, प्रयोगवादी गीत, नवगीत, प्रगीत, अनुगीत और न जाने कितने प्रकार से स्वयं को अभिव्यक्त किया। मूलतः गीत में लोक स्पर्श के साथ जनगीत भी प्रकट हुआ, जिसमें मजदूर, किसान, शोषित तथा अन्याय पीड़ित मनुष्य की व्यथा व्यक्त हुई है। डॉ० कुँअर बेचैन एक ऐसे प्रतिभाशाली गीत कवि हैं, जिन्होंने प्रत्येक गीत विधा को जिया है और अपनी प्रखर प्रतिभा से महिमामंडित भी किया है। जनवादी गीतों में भी उनकी भाषा-शैली एक नया रंग-रूप लेकर उपस्थित हुई है। मैं समझता हूँ गीत प्रेमियों के लिए उनका प्रस्तुत संग्रह भी अनुभूति और नयी अभिव्यक्ति के साथ मानसिक संतुष्टि और उ…

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अनकही पीड़ाओं के गायक है कुँअर बेचैन

डॉ० कुँअर बेचैन हमारी पीढ़ी के ऐसे कवियों में से हैं जिन्होंने अपनी कविता को या शिल्पगत आहों से दूर रखकर उसे जनभावनाओं और लोकभाषा का प्रतीक बना दिया है। लोकप्रिय हो जाने से ही कोई कवि जनकवि नहीं हो जाता डॉ० बेचैन उन कतिपय जनकवियों ने भी मन है जिसकी रचनायें जन-जन तक पहुंची ही नहीं बेचैन के गीत मध्य वर्ग की आशा और निराशाल तक सीमित नहीं रहे हैं, उनमें ऐसे वर्ग के अंदेशे और चिन्ताएँ भी है, जो सदियों हाशिये पर रहे हैं। वह जनता के नहीं अनाओं के गायक है। अतः उन्हें महज ही सशक्त जन कहा जा सकता है।

बालस्वरूप राही

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हिन्दी जगत के स्वीकृत लोकप्रिय कवि


डॉ० कुँअर बेचैन हिन्दी जगत के स्वीकृत लोकप्रिय कवि है। हिन्दी ग़ज़ल और गीत में जैसे उन्हें सिद्धी प्राप्त है। कवि सम्मेलनों के मंच से लेकर लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में उनके यश का आलोक फैला हुआ है। भारतवर्ष के बाहर अनेक देशों में उनके नाम और काव्य की प्रशंसा है। रचनाधर्म ही जैसे उनका जीवन है। लगभग पन्द्रह गीत और गजल-संग्रहों के बाद अब उनका नया जनगीत-संग्रह 'नदी पसीने की नाम से हिन्दी प्रेमियों के हाथों में आ रहा है। मुझे विश्वास है कि हिन्दी-संसार इस संग्रह का भी पूर्ण स्वागत करेगा।

-भारत भूषण

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परिमाण और गुणवत्ता का गणिकांचन संयोग

डॉ० कुँअर बेचैन देश के अग्रिम पंक्ति के कुछ गिने-चुने कवियों में से एक हैं। हिन्दी गजल के सफल सर्जक के रूप में भी उनका नाम आदर से लिया जाता है। उनका रचना साम्राज्य हजारों पृष्ठों में फैला है। कुंअर भाई को छोड़कर कविताः मैं परिमाण और गुणवत्ता का ऐसा मणिकांचन संयोग अन्यत्र दुर्लभ है। इस नये संग्रह मैं उनके जनवादी गीतों के तेवर देखते ही बनते हैं। कोटिशः बधाइयाँ।

-किशन सरोज

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डा. कुँअर बेचैन ने गीत-नवगीत, गवाल- दोहा और अन्य काव्य-विधाओं में सक्रिय लेखन के द्वारा अपनी एक विशिष्ट पहचान निर्मित की है। अपनी पुस्तकों के माध्यम से वे अधिक पढ़े जाते हैं या काव्य-मंचों से अधिक सुने जाते हैं, यह तय कर पाना कठिन है। अपने नए गीत-संग्रह ' दिन दिवंगत हुए' के गीतों में कव्य और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से काव्य जगत् में डा. वचन के अन को कभी भुलाया नहीं व उनके कौशल का अनुभव किया जा सकता है।

 - शिशुपाल सिंह निर्धन


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रोशन रहेंगे शब्द डॉ.कुँअर बेचैन के

'ये दुनिया सूखी मिट्टी है/ तू प्यार के छींटे देता चल '


डॉ. कुंअर बेचैन, डॉ. हरीश नवल

कम शब्दों में इतनी बड़ी बात कहने वाले डॉ० कुंअर बेचैन एक बड़े साहित्यकार तो थे ही, एक बड़े इंसान भी थे। सदा मुस्कराते रहने वाले डॉ. कुंअर भीतर से कितने बेचैन थे, यह केवल वे ही जानते थे। उनके जीवन के संघर्ष उन्हें बहुत बड़ा कवि हृदय दे सके थे। उनके गीत उनके सामाजिक सरोकारों के दर्पण हैं। मेरा सौभाग्य मुझे उनका साथ लगभग पैंतीस वर्ष मिला, यद्यपि एक श्रोता के रूप में मैंने उन्हें पचास साल से अधिक सुना।

सन् 1985 की गर्मियों में अचानक मेरी मुलाक़ात बेचैन जी से मंसूरी के नीलम रेस्टोरेंट में हो गई जहाँ के परांठे बहुत प्रसिद्ध थे परांठों के साथ-साथ डॉ. बेचैन से गीत, अगीत, प्रगीत और नवगीत पर जानदार चर्चा हुई। हम दोनों ही हिंदी के प्राध्यापक थे और अन्य विषयों के अलावा काव्यशास्त्र भी पढ़ाते थे। तब नवगीत नया-नया ही था। उसके विषय में डॉ. बेचैन से कुछ नवीन व्याख्याएँ सौगात के रूप में मुझे मिलीं। रेस्टोरेंट से हम दोनों की विदाई एक बहुत अच्छे सूक्त वाक्य से हुई, जब उन्होंने कहा –“नीलम किसी किसी को सूट करता है पर आज यह हम दोनों को कर गया।

डॉ. बेचैन से संक्षिप्त मिलाप प्रायः कवि सम्मेलनों के आरंभ होने से पहले अथवा समापन के बाद मिलता था, जब वे औरों से भी घिरे होते थे। हाँ गोष्ठियों में भले ही कम मिलना होता था किंतु भरपूर होता था। विशेषकर लखनऊ  माध्यम गोष्ठियों में रहना, खाना-पीना साथ होता था। दिल्ली के हंसराज कॉलेज में उन्हें खूब बुलाया जाता था। वहाँ के आयोजक डॉ० प्रभात कुमार मुझे हिंदू कॉलेज से बेचैन जी से मिलने के लिए आमंत्रित किया करते थे। प्रभात जी से भी उनकी बहुत बनती थी। डॉ. बेचैन गुणग्राहक थे और प्रभात जी की सैन्स ऑफ ह्यूमर के प्रशंसक थे जिस कारण हम तीनों की हँसी दूर-दूर तक गुंज जाती थी एक दिन मैं और डॉ. प्रभात, डॉ० बेचैन के घर गाजियाबाद गए। ट्राफियों, सम्मान पत्रकों और भाभी और भाभी जी की गरिमा से भरा घर मेरे मन में घर कर गया। उसके बाद मैं अपनी पत्नी स्नेह सुधा के साथ दो बार गाजियाबाद गया। स्नेह सुधा चित्रकार हैं और कविता भी लिखती हैं यह बात कुंअर जी को बहुत भाती थी वे स्वयं एक बड़े चित्रकार थे जिनके रेखाचित्रों की धूम सर्वत्र है प्रियजन को अपनी पुस्तक भेंटते हुए एक अद्भुत रेखाचित्र क्षण भर में उस पर बना देते थे। मेरे पास भी उनकी कविता और चित्रकला के बहुत से संग्रहणीय साक्षी हैं।

मैंने एक बार डॉ॰ बेचैन से मेरे कॉलेज में हो रहे कवि सम्मेलन हेतु अनुरोध किया। वे बोले, "हिंदू कॉलेज में बुला रहे हो तो मुझे कवि सम्मेलन की जगह साहित्यिक संगोष्ठी में बुलाओ, कविताएँ तो मैं सुनाता ही रहता हूँ मुझसे किसी साहित्यिक विषय पर चर्चा करवाओ।" अवसर की बात है कि लगभग एक महीने बाद ही हिंदू कॉलेज में तीन दिवसीय गोष्ठी हुई जिसमें एक दिन डॉ. बेचैन के नाम हुआ वे 'साहित्य के प्रदेय' विषय पर बोले और बहुत प्रभावी बोले जिसमें विद्यार्थियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के भी उन्होंने सम्यक् उत्तर दिए विद्यार्थी बहुत ख़ुश और समापन के बाद उनसे आटोग्राफ लेने के लिए भीड़ में बदल गए। डॉ० साहब ने सभी को अपने हस्ताक्षर के साथ-साथ संदेश भी दिए। मैंने पाया कि विद्यार्थियों से भी अधिक प्रसन्न हुए और संतुष्ट कुंअर जी स्वयं थे क्योंकि उन्हें अपने मन की बातें कहने का भरपूर अवसर मिला था, ऐसा उन्होंने मुझे बताया।

हुए

ग़ज़ल के व्याकरण संबंधित भी उनकी पुस्तक और उनकी एक पत्रिका के दो अंक मेरे पास है। दुष्यंत कुमार के बाद मेरी समझ से डॉ० बेचैन ने निरंतर हिंदी ग़ज़ल को विकसित और प्रसारित किया। उनके काव्य अवदान में जहाँ नौ गीत संग्रह है वहीं ग़ज़ल के पंद्रह संग्रह हैं कविता की अन्य शैलियों में उनके दो कविता संग्रह, एक हाइकु संग्रह एक दोहा संग्रह और एक महाकाव्य भी है। उन्होंने दो उपन्यास भी लिखे जिनमें 'जी हाँ मैं ग़ज़ल हूँ मेरी पुस्तक संपदा में है। अत्यंत सरस शैली में डॉ. बेचैन ने मिर्ज़ा ग़ालिब की कथा लिखी है जिसमें गजल का मानवीकरण किया है। बेमिसाल है यह उपन्यास।

जब मैंगगनांचल' का संपादन कर रहा था, मैंने बेचैन जी से एक विशेष अंक के लिए उनकी तीन गजलें मांगी जिसपर उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि

'गगलांचल' में उनके संस्मरण छपें ताकि विदेश में भी पता चले कि मैं गद्य भी लिखता हूँ। मैंने सहर्ष दो कड़ियों में उनसे संस्मरण लिए जिनमें से जब एक प्रकाशित हुआ इसकी प्रशंसा में बहुत से पाठकों के पत्र आए, उनमें से अधिकतर नहीं जानते थे कि कुंअर जी गद्य भी लिखते हैं। इस संस्मरण का शीर्षक था 'मैं जब शायर बनाइसमें उन्होंने अपने कॉलेज की एक फैन्सी ड्रैस प्रतियोगिता का ज़िक्र किया था जिसमें वे शायर बने थे और वे अपने घर से ही एक शायर के गेटअप में पान चबाते दाढ़ी लगाए, सिगरेट का धुआँ उड़ाते, छड़ी लिए सभागार में संयोजक के पास पहुँचे और उन्होंने कुंअर जी को सम्मान देते हुए अपने साथ बिठा लिया और कहा कि मुशायरा तो रात आठ बजे से है अभी तो फैन्सी ड्रैस प्रतियोगिता चल रही है, आप प्रतियोगिता देखिए आपका नाम जान सकता हूँ। कुंअर जी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा, "जनाब मुझे कासिम अमरोहिणी कहते है सीधे अमरोहा से ही रहा हूँ, गजलें और नज्में कहता हूँ।

फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता समाप्त हुई तीन पुरस्कार दिए गए। प्रोग्राम समाप्त होने वाला था कि कुंअर जी ने संयोजक से कहा कि मैं कुछ कहना चाहता हूँ। संयोजक ने घोषणा कर दी कि आदरणीय कासिम अमरोहवी साहब इस प्रतियोगिता के बारे में अपने विचार रखना चाहते है। कुंअर जी ने माइक संभाला और प्रतियोगिता की सराहना करते हुए कहा कि आपने गौर नहीं किया कि एक शख्स और भी है जिसने फैन्सी ड्रेस में हिस्सा लिया लेकिन उसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया। यह कहकर उन्होंने अपनी दाढ़ी मूंछे हटा दी। वे पहचान लिए गए और निर्णय बदला गया। ज़ाहिर है उन्हें प्रथम घोषित किया गया।

डॉ॰ बेचैन की आदत थी जो मेरी भी थी कि गोष्ठियों में हम दोनों नोट्स लेते मैं उन्हें बोलने के बाद नष्ट कर देता था लेकिन डॉ० बेचैन उन्हें फाइल में रखते थे उन्होंने पाँच हज़ार से ज़्यादा कवि सम्मेलनों में भाग लिया था। इन नोट्स में कवि सम्मेलन का इतिहास अंकित है जिनके आधार पर उन्होंने दो हज़ार पृष्ठ खुद ही टाप कर लिए थे। संभवतः आने वाले किसी समय उनकी कवि सम्मेलन महागाथा एक ग्रंथ के रूप में प्रकट हो जाए।

बहुत सी और भी यादें उनसे जुड़ी हुई हैं। 22 दिसंबर, 2013 डॉ० बेचैन को हिंदी भवन में 'संवेदना सम्मान' प्रदान करने के लिए हिंदी भवन में एक समारोह हुआ जिसकी अध्यक्षता श्री बालस्वरूप राही की थी। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, कृष्ण मित्र, मंगल नसीम और प्रवीण शुक्ल के वक्तव्य थे और मुझे मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था। जब अन्यों के भाषण चल रहे थे, डॉ० बेचैन ने मुझे पर्ची पर लिखकर आदेशात्मक आग्रह किया कि मैं जब बोलूं तो केवल उनके काव्य कर्म का ही विश्लेषण करूँ। मैंने ऐसा ही किया था जिससे डॉ. बेचैन बहुत प्रसन्न और संतुष्ट हुए। उनका कहना था कि प्रायः वक्ता 'कुंअर बेचैन' पर बोलते हैं, 'कुंअर बेचैन' के काव्य कर्म पर नहीं।

मुझे उनका एक ऐसा संस्मरण ध्यान रहा है जिसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक आयाम उद्घाटित हुए थे दिसंबर 2008 में जापान में उर्दू, हिंदी पढ़ाने के सौ वर्ष मनाए गए थे, जिसमें जापान भारत और पाकिस्तान के कवियों का सम्मेलन भी था जिसमें कुंअर बेचैन जी को अध्यक्षता करनी थी। मुझ सहित पाँच प्रतिभागी और थे। पाकिस्तान के दल ने हम भारतीयों की अवहेलना करते हुए बड़ी निर्लज्जता से घोषित अध्यक्ष के स्थान पर पाकिस्तान के तहसीन फिराकी को अध्यक्ष पद पर बैठा दिया। मैंने विरोध में खड़े होकर कुछ कहना चाहा, तो बेचैन ने मेरा हाथ पकड़ मुझे बिठा दिया और बोले, "उन्हें मनमानी करने दो औक़ात पद से नहीं प्रतिभा से जानी जाती है। कुछ कहो मैं चुप होकर बैठ गया पाकिस्तान के दल ने कवि सम्मेलन के संचालन का दायित्व भी स्वयं हथिया लिया। सम्मेलन आरंभ हुआ पहले पाकिस्तान के कवियों ने

अपना रचना पाठ किया, फिर भारत की बारी आई। एक-एक कर सुरेश ऋतुपर्ण, हरजिन्दर चौधरी, लालित्य ललित और मैंने कविताएँ प्रस्तुत कीं। समापन कवि के रूप में कुंअर बेचैन ने एक ग़ज़ल और एक कविता प्रस्तुत की और बैठने लगे, लेकिन श्रोताओं ने जिनमें पाकिस्तान के कवि भी थे उन्हें बैठने दिया और एक-एक कर डॉ० बेचैन जी कि अनेक रचनाएँ सुनी। सभी उपस्थित जन देर तक खड़े होकर तालियाँ बजाते रहे। पाकिस्तानी दल भी तालियाँ पीट रहा था। अब अध्यक्ष जनाब हसीन फिराकी का उद्बोधन था जिसमें उन्होंने कहा कि वे बहुत शर्मिन्दा हैं कि उनके देश की कविता अभी तक इश्क, हुसन और जुल्फों में ही अटकी हुई है और भारत की कविता ग़रीबी, माँ-पिता, नदी, पेड़ पत्तियाँ और इंसानियत जैसे विषयों को अनेक अर्थ देकर समेटती है; विशेषकर कुअर बेचैन साहब की रचनाएँ। उन्होंने भी बाकायदा नोट्स बना रखे थे और कुंअर जी की कविताओं को बहुत से उदाहरण देते हुए उनका यशोगान किया।

बात यहीं नहीं रुकी पाकिस्तान ने डॉ० कुंअर बेचैन का अभिनदंन करने के लिए टोक्यो के एक पाँच - तारा होटल में अभिनंदन समारोह और भव्य डिनर आयोजित किया। कुंअर जी के कारण उनके साथ-साथ हम भारतीय साहित्यकारों का ही नहीं अपितु पूरे भारत का अभिनदंन हुआ।

कुंअर बेचैन जी का मानना था कि 'शब्द एक लालटेन' है जिसे आप अपने हाथ में लेकर अँधेरा दर करते चल सकते हो। उन्होंने जीवन भर इस लालटेन को थामे रखा और उनके शब्दों की लालटेन ऐसी है जो कभी भी बुझेगी नहीं, रोशनी देती रहेगी।

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डॉ. हरीश नवल की स्मृति से

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