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शुक्रवार, 9 जून 2023

जब गीत-ऋषि नीरज जी पूना आए

मेरी न जाने कब-कब  की (1983- 1999) लिखी  हुई कविताओं  के संग्रह का  ड्राफ्ट तैयार  करते-करते  2004 से  जनवरी  2005  आ गया , मतलब कि 2005  में वह फाइनल  हुआ !  फिर सोचा  किसी वरिष्ठ कवि के आशीष वचन  लेने चाहिए !  अचानक  मन में  आया ,  क्यों  न नीरज  जी से निवेदन किया जाए ! अगर,  इस  काव्य संग्रह के  लिए  वे आशीर्वचन लिखेगें,  तो  मेरे लिए कितना प्रेरणास्पद  होगा !  मैंने  पूना के सबर्ब  'पिम्परी'  में  कवि सम्मेलनों के आयोजक  राकेश  श्रीवास्तव  जी  से  नीरज जी का  पता  और  फोन नम्बर लिया !  किसी से मुझे पता चला  था  कि  2004 में श्रीवास्तव  साहब द्वारा  आयोजित  कवि सम्मेलन में  नीरज जी,  तबियत खराब होने की वजह से  नहीं आ पाए थे और भोपाल तक  आ कर  लौट  गए थे !  आयोजक को जनता की  बहुत सुननी पड़ी थी ! सबकी  धन राशि लौटानी पड़ी, साथ ही, पूना  के  स्थानीय  हिन्दी और  मराठी के  समाचार  पत्रों में  भी  इस 'घटना'  की  काफी आलोचना  हुई ! अतैव, मुझे लगा कि नीरज जी तक पहुँचने के लिए, उनके परिचित  ‘श्रीवास्तव  साहब’  सबसे  सही स्रोत हैं ! सो मैंने उनसे पता  व फोन नम्बर लिया  और बड़े सोच-विचार के बाद, अपनी पसंदीदा दस कविताओं की फोटो कॉपी,  अपने एक पत्र के साथ नीरज  जी को  डाक द्वारा  फरवरी  2005  में  भेज दी !  मुझे न जाने क्यों लगा कि  अगर ‘गीत-ऋषि’ नीरज जी,  गेय  कविताएँ लिखने वाले  इतने  सिद्ध-हस्त गीतकार, उन्हें  मेरी छन्द- मुक्त  कवितायेँ  पसंद  नही  आईं  और  कूडे  में  फेक दी,  तो  क्या  होगा  ?  इसलिए  मैंने  सोचा कि  अपनी कविताएँ ‘् तू चंदा मैं चाँदनी’  के गीतकार बालकवि वैरागी जी को भी  भेज  देनी चाहिए, जिससे दोनों में से किसी एक  के  आशीष  की  चार-पाँच  पंक्तियाँ  तो आ ही जाएगी  और फिर, अविलम्ब  किताब प्रकाशित  करा  ली जाएगी ! यद्यपि  बालकवि  वैरागी  भी गेय कविताएँ ही लिखते थे, लेकिन उनको भेजने की हिम्मत इसलिए जुटा पाई कि  वे अक्सर पूना  आते  रहते थे और उनके सामने  मैंने महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा के  कार्यक्रमों में  कई  बार अपनी छंद-मुक्त कविताओं का पाठ  किया  था, जिनमें से एक बार ‘रिश्ते’ और ‘सूर्य समाया नयनों में आज’, कविताएँ, उनको इतनी पसंद आई थी कि जब उस कार्यक्रम  के अन्त में उन्होंने सबको सम्बोधित  किया, तो  उन्होंने मेरी  दोनों  कविताओं  को सराहते हुए उनका उल्लेख किया, जो मेरे लिए अप्रत्याशित खुशी की बात थी ! एक अन्य कवि के ‘मुक्तक’ भी उन्हें बहुत पसंद आए थे ! इसलिए  उस छोटी सी पहचान से साहस जुटा कर, उन्हें  भी  मैंने  उन्हीं  दस कविताओं  की फोटोकॉपी  भेजने की हिमाकत  की  ! 


     मुझे पहली बार, बालकवि जी की बहुत बड़ी विशेषता  पता चली कि कि  वे  खत  प्राप्ति की सूचना  तुरंत  देते  थे, जिसका प्रमाण था, उनके सुघड़    लेख में लिखा हुआ कुछ पंक्तियों का एक पोस्टकार्ड ! उनसे  कविताओं  की    प्राप्ति की सूचना  का  पोस्टकार्ड  मिलते ही मुझे बहुत अच्छा लगा और तसल्ली  हुई !  उसके एक सप्ताह बाद, वैरागी जी ने  मेरी  कविताओं को पढकर,  सिलसिलेवार  बड़े ही कायदे, से अपने विचार, शुभकामनाओं  के साथ,  बहुत  ही  दिल से लिख भेजे ! 


  मार्च शुरू हो गया था और  और नीरज जी के आशीष और शुभकामनाओं की प्रतीक्षा करते-करते आधा मार्च बीत गया था ! इतना समय बीत जाने पर भी नीरज जी का  कोई जवाब  फरवरी तो फरवरी, मार्च  के मध्य तक भी नही  नहीं  आया, तो मुझे  अपनी  कविताएँ  अपने  काल्पनिक भय  के अनुसार  कूड़ेदान  में  फिंकी  नज़र आई !  मुझे निराशा घेरने लगी ! खैर, मैंने  निर्णय लिया कि  वैरागी जी ने इतने विस्तार से  मेरी कविताओं के लिए  आशीर्वाद लिख कर भेजा  हैं, सो  अब किताब  छपने  दे देनी चाहिए !  दो दिन बाद,  मैं पाण्डुलिपि लेकर, घर से निकल ही रही  थी कि  मोबाइल बज  उठा !  एक  अंजान  मोबाइल नंबर  देखकर, मैंने बेमन से फोन  उठाया !  मेरे पास  नीरज का  घर वाला नम्बर था, इसलिए  नीरज का मोबाइल मैं पहचानी ही      नहीं ! उधर  से आवाज़ आई__

‘मैं नीरज बोल रहा हूँ , क्या दीप्ति से  बात हो सकती  है ?’

यह सुनते ही एक क्षण के लिए  मैं सन्न  सी  रह गई !  मुँह से बोल ही नहीं  निकले !  इतने  में, फिर  नीरज  जी की गुरु गम्भीर  आवाज़  उभरी__


अरे भई, क्या  मैं दीप्ति से बात कर सकता हूँ !


तब  मैंने  तुरंत अपनी आश्चर्य  मिश्रित खुशी को सम्हालते हुए कहा__

  

जी दादा,  प्रणाम !  मैं  बोल रही  हूँ


वे फिर  उधर से वे बोले__


दीप्ति, तुम्हारी कविताएँ मिल गई हैं ! मैं दो सम्मेलनों में अलीगढ़ से  बाहर गया हुआ था !  कल ही लौटा हूँ, तो डाक देखते समय, तुम्हारी कविताएँ  हाथ लगी ! फरवरी की भेजी हुई कविताओं पर आशीष-वचन लिखने में  देर हो गई ! अब यह बताओं कि तुम्हारी पुस्तक छपने गई या अभी  रोक  रखी है ?

मैंने आधा झूठ  और  आधा सच कहा, क्योंकि उस समय मैं पाण्डुलिपि लेकर प्रकाशक से मिलने जा रही थी और नीरज दादा से  आशीष-वचनों की उम्मीद    मैं छोड चुकी थी, फिर भी मैंने कहा__

दादा  अभी रुकी हुई है ! आपके  आशीष  वचनों  की  प्रतीक्षा कर रही थी......!

बस, फिर क्या था ,  दादा ने आश्वासन दिया  कि  एक सप्ताह का समय और दो !  तुम्हारी 'रिश्ते' , 'निश्छल भाव', 'अवमूल्यन', ‘काला चाँद’ आदि  कविताएँ  बहुत  पसंद आई ! भले ही तुम छन्द-मुक्त लिखती हो, पर कविता का असली प्राण, उसकी संवेदना और भावनात्मक लय होती है, जो तुम्हारी कविताओं  में बखूबी बरक़रार है और दिल को पकडती है !


उस पल, मेरे लिए उनके मुख से सकारात्मक बात सुनना, किसी आशीर्वाद   से कम नहीं था ! लगे हाथ, मैंने उनसे यह भी पूछ लिया कि ‘क्या वे मेरी  अंग्रेज़ी कविताओं के संग्रह का भी  विमोचन  हिन्दी काव्य-संग्रह के साथ कर देंगे ?’ उन्होंने ‘ज़रूर’  कहते हुए, खुशी से हामी भर दी कि कविता तो कविता है - किसी  भी भाषा में हो, क्या फर्क पड़ता है ! कवि का हृदय      हर भाषा की कविता का सम्मान करता है और मैं उन्हें आभार देती नही थकी ! 

ठीक दस दिन बाद मेरे पास  उनका 'पाँच पेज' का आशीर्वाद  आ गया, जो बाद में, टाइपिस्ट की लापरवाही की वज़ह से, टाइप होने बाद, फ़ाइल में से उसके बच्चे ने खेल-खेल में खत के पन्नें निकालकर, कागज़ की नाव बनाने के चक्कर में मोड-तोड़ कर फाड़ डाले !  बाद में जब पता चला तो, मुझे  लगा कि मेरा तो कीमती खजाना लुट गया ! गुस्सा तो मुझे बहुत आया,  पर क्या करती  ! बच्चे की कोई गलती नहीं थी, सारी गलती उस टाइपिस्ट की थी, जो फाइल खुली छोडकर दूसरे कमरे में थोड़ी देर के लिए आराम करने चला गया था ! 

  दो दिग्गज कवियों  के इतने खूबसूरत और विस्तार से लिखे आशीष-वचनों को पाकर मैं धर्म-संकट पड़ गई कि ‘दो’ आशीर्वचन छपवाने चाहिए कि नही ? किसे छपवाऊँ और किसे छोडूँ ? कहाँ तो आशीर्वचनों के लाले पड़ते नज़र आ रहे थे और  अब जब मिले तो, छप्पर फाडकर  मिले ! सोचा, सोचा, और खूब सोचा ! अन्तत:  दोनों को ही  ससम्मान पुस्तक में संजोने का  निर्णय लिया ! दोनों ने इतने स्नेह  और दिल से लिखकर भेजा था, तो मैं किसी के भी लिखे को ‘न छपवाने का अपराध नहीं कर सकती थी !’ दोनों ही मेरे लिए सम्माननीय  और स्तुत्य कवि थे ! 

खैर,  इस  तरह  खुशी और उत्साह में भरे हुए, दिन बीतते गए  ! पुस्तक भी  मई के अन्त  तक छप कर आ गई !  तब तक मैंने उसके लोकार्पण पर कोई  सोच-विचार इसलिए नही किया था क्योंकि मैं किताब पर परिचर्चा कराना, उससे बेहतर समझती थी !

    तभी  एक बहुत आत्मीय परिचित परिवार का फोन आया ! पढ़ने की शौकीन भाभी जी को मेरी हर गतिविधि  की खबर रहती थी और उनको नीरज दादा और बालकवि जी के खतों के बारे में भी पता था ! इतना ही नहीं, उनसे उनके कवि-पति को भी सारी कहानी मालूम थी ! सो उन दोनों ने  सुझाया, बल्कि सुझाया नहीं, जिद सी करते हुए कहा__

 जब  नीरज जी और बालकवि जी ने  आपकी पुस्तक के लिए  इतना  सुन्दर  लिख कर भेजा है, तो दोनों में जो वरिष्ठ  हैं, यानी नीरज जी से आप  विमोचन क्यों नहीं करा लेती ?  परिचर्चा को छोडिए और विमोचन कराइए !


मैंने कहा - 'अरे आप लोग क्या बात कर रहे  हैं !  राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर  के प्रतिष्ठित कवि, नीरज जी  जैसी महान कवि, भला  क्यों आयेंगे  और वो भी ऐसे  छोटे से काम के लिए ?  कोई बड़ा कवि-सम्मेलन होता, जिससे उन्हें ‘काव्यं यशसे अर्थकृते...’ की उपलब्धि भी होती तो, वे निश्चित ही आते !’

मेरी विशिष्ट सलाहकार भाभी जी बोली  - 

 अच्छा  आप  फ़ोन तो  करके  देखें -  हद से हद  ‘हाँ’  या  ‘ना’  ही तो करेगें !

मुझे उन  दोंनो  की  यह  बात समझ  आ  गई और  लगा कि पूछने में क्या    हर्ज  है ! लेकिन  मेरे  मन  में दोनों  भाव रहे  कि  आ जाएँ, तो उनके  दर्शन  हो जाएगें  और  उनके  सुरीले  कंठ से कविताएँ सुनने का                सुअवसर मिलेगा सो अलग  - साथ  ही यह विचार भी मन में कौंधता  रहा  कि  न भी आए तो,  मैं  ढेर इंतज़ाम और  तैयारी  की भागदौड से बच जाऊँगी    और परिचर्चा कराऊँगी !

इस डावांडोल  मन:स्थिति में मैंने नीरज  जी का  फोन घुमाया - उधर से  उनके ‘पुत्रवत सेवक’ 'सिंग सिंग'  (अजीब सा नाम)  ने फोन उठाया  और  मेरे द्वारा          नीरज दादा के बारे में  पूछने पर , वह नीरज  जी  से बोला__


 पूना से दीप्ति  दीदी का फोन  है !

मुझे उसका किसी अपरचित के लिए दीदी सम्बोधन बहुत भाया ! आखिर इतने कद्दावर कवि का सेवक था, तो पूरा सधा हुआ क्यों न होता !

फोन में नीरज  जी  की  आवाज़ स्पष्ट  आई कि  'ला  इधर फोन  दे,  वहाँ लिए क्यों  खड़ा है’......और उसने  नीरज जी को फोन थमा दिया !

मैंने  हिचकते हुए पूछा__

दादा ! एक बात पूछनी  है ! क्या आप  मेरे काव्य संग्रह  के लोकार्पण  के  लिए पूना आने  का समय निकाल सकेगें ?

सुनते ही नीरज  दादा  ने सोचने  का भी  समय  नहीं लिया और  खुशी ज़ाहिर करते हुए बोले - 

क्यों नहीं,  क्यों नहीं....! मैं तो सोच रहा था कि इस लड़की ने लोकार्पण वगैरा  की कोई बात क्यों नहीं की ?

पहले की तरह एक बार फिर  दादा ने मुझे अचरज में डाल दिया  !  मैं जिस तरह उनके पहली बार आए फोन पर निशब्द हो गई थी, तो, इस बार, लोकार्पण पर आने की स्वीकृति पाकर निशब्द हो गई ! विश्वास नहीं हुआ कि उन्होंने एकबार भी अपनी व्यस्तता  अथवा अपनी तबियत की बाबत मना करने की कोशिश की ! जैसा कि मैंने अक्सर सुना था और अखबारों में पढ़ा था कि उनकी व्यस्तता इतनी चरम पर होती थी कि ‘आज भोपाल,  तो कल  दिल्ली में, तो कुछ दिन बाद अमेरिका में!’

इसलिए मैंने सुनिश्चित किया_  

सच दादा,  पक्का आयेंगे  ?'

वे सहजता  से बोले -  'ऐसे  ही  नहीं कहा रहा  दीप्ति - पक्का आऊँगा और  अगले ही महीने  की तारीख़  रखना  पर, मुझ से पूछ कर  ! '

इस  बार मुझे  विश्वास हो गया कि वे तो आने के लिए  पक्की तरह से  तैयार  हैं !  मैं सोचने लगी कि ये क्या हुआ  और कैसे हुआ.... मिनटों में  प्रोग्राम तय भी हो गया !

इसके बाद  खुशी  तो  उड़न छू  हो गई और  उनके  ठहरने  आदि की,  विमोचन के लिए बढ़िया हॉल, अतिथियों के बैठने की उचित व्यवस्था आदि की  तैयारी की चिन्ता  और तनाव  ने मुझे घेर लिया !  पूना के  साहित्यिक समूह  से मैंने  राय मशवरा किया,  तो उनकी खुशी का  तो  ठिकाना  ही  नहीं था !


बहरहाल, एक सप्ताह के अंदर, नीरज जी के ठहराने  की सारी व्यवस्था  एक साहित्यकार साथी  की  मदद से कोरेगांव पार्क में हो गई ! उनका अपने  लिए  नया खरीदा हुआ  और पूरी तरह से  सजा-संवरा, खूब बड़ा अपार्टमेंट नीरज  दादा की आवभगत के लिए और अधिक तैयार कर दिया गया ! वे कवि-साथी इसलिए भी खुश थे कि उस नए घर में, उनसे पहले ख्यात कवि गोपालदास ‘नीरज’ जी  के चरण-कमल पड़ेगे ! उनकी किस्मत अच्छी थी, नीरज जी की  उनसे भी अच्छी कि उनके लिए एक ऐसे शान्त, सुरम्य और खूबसूरत ‘घर’ जैसे माहौल वाली जगह  में (होटल रूम में नहीं) ठहरने की व्यवस्था हो गई थी और मेरी किस्मत भी अच्छी थी कि मुझे बिना किसी परेशानी के इतनी बढ़िया मदद मिल गई थी !

लोकार्पण के लिए मैंने पूना के इंजीनियरिंग  कॉलिज का  प्रसिद्ध फिरोदिया हॉल चुना ! इसी बीच, नीरज  जी ने  18  जुलाई  (2005) की तारीख़, पूना आने के लिए निश्चित की और मैंने इस तिथि के लिए फिरोदिया हॉल बुक करा लिया !  जुलाई के पहले सप्ताह में सभी साहित्यकारों को निमंत्रण-पत्रिका भी भेज दी गई थी ! लोकार्पण का बैनर  बन कर तैयार  हो रहा था !

    अठ्ठारह जुलाई खरामा-खरामा नज़दीक  आ रही थी ! निश्चित तारीख़ से, दो दिन पहले, नीरज दादा अलीगढ से, मुम्बई अपने  पौत्र ‘पल्लव’ के पास पहुँचे ! दादा का अपने प्यारे पौत्र के लिए ख्याल-दुलार उन्हें मुम्बई खीच ले गया ! उस समय पल्लव बम्बई की किसी  कम्पनी में कार्यरत था ! दादा  उसके साथ अठ्ठारह की  दोपहर  12.00 के लगभग  पूना पहुँच गए ! एक खास तिराहे पर, मेरी कार खडी हुई  थी और मैं मोबाइल पर पल्लव से थोड़ी-थोड़ी देर में पूछ लेती थी कि कहाँ तक  पहुँचे ! क़भी पल्लव मुझे  बता देता था कि उनकी टैक्सी मुम्बई-पूना हाइवे पर किस टर्न पर है ! दादा के लंच का समय हो गया था ! जैसे ही वे पहुँचे मैं अविलम्ब दोपहर के भोजन के लिए उन्हें एम, जी रोड ले गई ! वहाँ स्थित, ब्रिटिश काल के बने  प्रसिद्ध एवं शानदार ‘राम-कृष्ण होटल’ के वातानुकूलित डाइनिंग हॉल में दादा और पल्लव ने राहत की साँस ली ! सबसे पहले ठंडा पानी पिया ! फिर हम अपनी-अपनी पसंदीदा चीजों का ऑर्डर करके भोजन की प्रतीक्षा में, रोचक बातें करते हुए बैठे रहे ! दादा को खाना बहुत पसंद आया ! स्वीट डिश में उन्होंने वेनीला आइसक्रीम खानी पसंद की और पल्लव व मैंने भी आइसक्रीम ली, लेकिन दूसरे फ्लेवर की ! पल्लव को शाम को ही निकलना था ! मैंने उससे कहा भी कि रुक जाओ, कल चले जाना, लेकिन उसे ज़रूरी ऑफिस का कार्य था, सो वह रुक नहीं सका ! सो वह मुम्बई के लिए निकल गया और मैं दादा को  कोरेगाँव पार्क, उनके अपार्टमेंट में, हमारे साहित्यकार मराठी कवि यानी उस घर के मालिक के सुपुर्द करके (जो उस दिन नीरज दादा के लिए उस घर में पहले से विराजमान थे) घर आ गई ! माँ को देखना था, शाम के लोकार्पण की तैयारी करनी थी ! साथ ही, रात्रि-भोज की भी केटरर से खबर लेनी थी! मैंने रात्रि-भोज दो कारणों से रखा था कि पूना में वे (हिन्दी और इंगलिश की ) मेरी पहली पुस्तकें  थीं, जो प्रकाशित हुई थीं  और जिसका विमोचन मेरे परिचित परिवार के सुझाव पर जब तय हुआ था, तो वे  चाय-नाश्ते की बात कह रहे रहे थे ! पर, मैंने  सोचा  कि  हिन्दी, मराठी  और उर्दू  तीनों भाषाओं के साहित्यकार नीरज जी जैसी महान हस्ती के आगमन से बहुत खुश है और उनसे मिलने के लिए उत्साहित हैं, तो इस बहाने  तीनों भाषाओँ के साहित्यकारों का एक अच्छा सा Get-together  क्यों न हो जाए ! अतैव, नीरज जी के आगमन के इस खास मौके पर मुझे रात्रि-भोज  देना मुझे ज़रूरी लगा ! यह भी मुझे अंदाजा था कि जब दादा  की कविताएँ शुरू होंगी तो, कार्यक्रम 12 या  1.00 बजे से पहले तो समाप्त होगा नहीं ! सो मेरी यह भावना भी बलवती थी कि इतनी देर बैठे रहने वाले हमारे अदबी साथी बिना भोजन के घर न जाएँ !

शाम को  पूना के फिरोदिया  सभागृह  में  नीरज  जी की  'मुख्य अतिथि'  के रूप में उपस्थिति  में  मेरी  दो पुस्तकों  अंतर्यात्रा  और  Ocean In The Eyes  का विमोचन बहुत  ही मनोहर और  काव्यमय वातावरण में हुआ ! कार्यक्रम  के  'अध्यक्ष'  पूना -निवासी और  साहित्यकार अज्ञेय जी  के 'तारसप्तक' काव्य समूह के  प्रख्यात कवि  'हरिनारायण  व्यास'  जी थे !  दामोदर खडसे, शरदेन्दु शुक्ल  और प्रेमा स्वामी वक्ता थे ! पूना के हिन्दी, उर्दू  और मराठी  के  सभी साहित्यकार  कार्यक्रम में आए थे !  मैंने कार्यक्रम  का सञ्चालन  ऑल इंडिया रेडियों, पुणे  के हिन्दी अधिकारी 'सुनील देवधर  जी' से करवाया था !  उन्होंने  बहुत  ही सुन्दर  सञ्चालन किया !  लोकार्पण कार्यक्रम  सम्पन्न हो जाने  पर, नीरज  जी  की  कविताओं का जो दौर चला तो  काफी देर बाद  थमा  !  बाहर  पानी बरस रहा था और सभागृह  में नीरज की मधुर- मदिर कविताएँ बरस रही थीं ! 


1) अब के सावन में….


अब के सावन में ये शरारत मेरे साथ हुई,

मेरा घर छोड़ के, कुल शहर में बरसात हुई


आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुजरी?

था लुटेरों का जहाँ गाँव, वहीं रात हुई


ज़िंदगी-भर तो हुई गुफ़्तगू गैरों से मगर,

आज तक हमसे न हमारी मुलाक़ात हुई


हर गलत मोड़ पे टोका है, किसी ने मुझको,

एक आवाज़ जब से, तेरी मेरे साथ हुई


मैंने सोचा कि मेरे देश की हालत क्या है,

एक कातिल से तभी, मेरी मुलाक़ात हुई



श्रोताओं की मांग पर दादा ने अपना सिग्नेचर गीत सुनाया......


2) कारवां गुज़र गया…..


स्वप्न झरे फूल से,

मीत चुभे शूल से,

लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!



3) मेरा नाम लिया जाएगा…..


आँसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा

जहाँ प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा


मान-पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का

मैं तो आशिक़ रहा जन्म से, सुंदरता के दीवानों का

लेकिन था मालूम नहीं ये, केवल इस ग़लती के कारण

सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा



4)  तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा….



तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।

सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।


वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,

हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।


तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,

वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा ।


इस तरह एक के बाद एक  कविताओं की झड़ी लगती रही  !  नीरज जी  क्षीणकाय  तो थे ही,  सो  उन्होंने  देर  होती देख, श्रोताओं से करबद्ध निवेदन कर, कार्यकम को  12:30  बजे  विराम दिया !  मंच पर लोगों  की  बेतहाशा  भीड़ लग  गई !  सब नीरज  जी को प्रणाम और चरण स्पर्श  करते रहे और मुझे  पुष्पगुच्छ व बधाई  देते रहे !


अगले  दिन पिम्परी  के  राकेश श्रीवास्तव साहब ने,  पूना में मेरी  पुस्तकों  के लोकार्पण पर नीरज जी के आगमन का  सदुपयोग करते  हुए 

          'एक  शाम : नीरज-निदा के नाम ' 

से एक खूबसूरत रात्रि  कार्यक्रम  रखा लिया था !  इससे पहले,  दिन में  नीरज  दादा,  मेरे घर  दोपहर के खाने पर आए !  मैं  तो खाना बनाने में लगी रही  और वे बीबी (माँ)  को अपने  जीवन और  फिल्मी दौर  की ढेर बातें  सुनाते रहे ! बीच-बीच में  सुनने  के लिए  मैं भी लिविंग रूम में  पहुँच जाती थी ! एस.डी.बर्मन,  देवानन्द  साहब  और नीरज  जी की  टीम ने  काफी लम्बे  समय तक साथ काम किया !  जब दादा ने फिल्म-इंडस्ट्री में कदम रखा,  उन  दिनों  ‘प्रेम-पुजारी’  फिल्म  बन रही थी ! नीरज  जी  को एस. डी. बर्मन ने  एक सीन की सिचुएशन बता कर,  अगली सुबह  तक  गाना लिख कर,  देने के लिए कहा ! दूसरी ओर  देवानन्द साहब को बुलाकर,  नीरज जी  के  वापिस  जाने  लिए  एक हवाई टिकिट  का इंतजाम  करने के लिए कहा, 

यह सोच कर कि  नीरज जी मंच के कवि भले ही कितने मशहूर हों और

बढ़िया लिखते हों, लेकिन  फिल्मों के लिए क्या  गाने लिख  पाएगें !  नीरज  दादा  ने  रात भर गाने के  बोल बार-बार लिखे-मिटाए ! जब तसल्ली

हो गई तो गीत फाइनल किया ! अगले दिन  दस बजे, जब  बर्मन  दा  को

नीरज  जी ने __

'रंगीला रे ! तेरे रंग में.....'      (वहीदा रहमान औत देवानंद पर फिल्माया गया लोकप्रिय गीत)

सुनाया तो,  बर्मन दा उछल पड़े  और तुरंत देवानन्द साहब  को फोन किया कि  जो फ्लाइट बुक कराई थी, उसे कैंसिल  किया जाए  !  बस, तब से जो नीरज  जी, बर्मन टीम का हिस्सा बने, तो  लम्बे समय तक वहीं रहे !  इतना  ही नहीं, दादा  इस टीम से अलग  अन्य  फिल्मों के लिए भी गीत लिखते रहे ! राज कपूर साहब की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का  यह गीत ‘ऐ भाई, ज़रा देख के चलो, आगे ही नहीं, पीछे भी...’ नीरज दादा का ही लिखा हुआ है !  उनके अन्य गीतों की सूची मैं नीचे दे रही हूँ ! नीरज जी ने यह बात बेहिचक बताई  कि वे जिस फिल्म  के लिए भी वे अपने गीत देते, वह  फ्लॉप हो जाती थी, पर, उनके गाने खूब लोकप्रिय होते थे ! इसलिए फिल्म जगत के निर्माता-निर्देशक उन्हें मनहूस मानने और कहने लगे थे ! यह जानकार भी, वे कुछ और साल तक गीत लिखते रहे, लेकिन अन्तत:  फिल्मों की असफलता से दुखी होकर, फ़िल्मी दुनिया को विदा कहकर, वापिस अलीगढ चले गए !

   

    शाम को  नीरज  दादा को पूना के सबर्ब ‘पिम्परी’ जाना था !  राकेश भाई ने मुझसे कहा था कि आपको अरूर आना है ! ऐसा न हो कि  आप टाल जाएँ ! दूर सबर्ब में एक तो रात का कार्यक्रम, कब शुरू होगा  और कब समाप्त, इसका  कुछ भरोसा नहीं  था ! ! दूसरे मैं माँ को अकेला  छोडकर जाने के लिए अनिच्छुक  थी ! उससे एक दिन पहले, मेरा तीन घंटे का कार्यक्रम छह  घण्टे में यानी रात्रि के एक बजे समाप्त हुआ था !  लेकिन, नीरज दादा की कविताओं की प्रशंसक मेरी माँ बोली कि इनको  लाइव सुनने का मौका  कहाँ जल्दी से मिलेगा, इसलिए जरूर जाना चाहिए ! तब,  मैं  और मेरी पहचान  का  एक परिवार  'नीरज-निदा  शाम '  के लिए दादा के साथ ही पिम्परी गए  ! वहाँ का  'रामकृष्ण मोरे 'सभागार बहुत विशालकाय है, वह खचाखच  भरा हुआ था !  पहले हम  सब  निदा साहब से  नीरज  जी के साथ  लता मंगेशकर  जी  के  होटल में मिले ! काफी देर बातें होती  रहीं !  सात बजते ही हम सब सभागार में पहुँच गए !  उससे पहले एक छोटी सी बैठक में फोटोग्राफरों की भीड़ ने घेर लिया और नीरज जी के साथ अनेक लोगों ने फोटो खिंचवाए ! नीरज दादा बच्चों की तरह, तस्वीरे खिंचते समय, सोफे पर बैठी, मुझसे उनके पास खड़े होकर फोटो खिचवाने को कहते, तो  एक दो बार तो मैंने उनका कहा  मान लिया, पर फिर बाद में मैंने विनम्रता से, उनसे चुचाप कहा कि वे बार-बार मुझे न बुलाएं ! उस उबाऊ  फोटो-सेशन से किसी तरह मुक्ति पाकर मैं और मेरी सहेली, नीरज दादा के साथ हॉल में  पहुँचीं और हमें स्वागत टीम ने अगली पँक्ति में बैठाया ! कुछ पल बाद ही दादा मंच पर पहुँच गए, जहाँ निदा साहब पहले से ही बैठे हुए थे और नीरज जी की प्रतीक्षा कर रहे थे !

  नीरज जी और निदा साहब  मंच पर  ऐसे जमे कि लोग उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे !  उस भीड़ में नीरज दादा की  मांग बहुत अधिक़ थी ! रात के दो बज गए  जो, मेरे लिए  प्रतिकूल समय था, लेकिन  ऐसे कार्यकम  कभी-कभी ही सुनने को मिलते  हैं,  सो मैं उस  प्रतिकूलता को  झेल गई !  तदनन्तर हम सबको ससम्मान रात्रि भोज  के  लिए डायनिंग  हाल  में ले जाया गया !  नीरज  दादा  ने,  मैंने और हमारी सहेली ने  कुछ नहीं खाया !  सबके कहने पर  और साथ देने के लिए  बस  जूस ले लिया ! फिर  इतनी  दूर से  घर आते-आते  सुबह  के चार बज गए ! लेकिन दो दिन नीरज जी को और अगले दिन  साथ में निदा  साहब को सुनना हमेशा  के लिए यादगार बन गया !


नीरज  जी की कविताएं तो हम सबने बार-बार सुनी ही हैं,  लेकिन कुछ  फ़िल्मी  गीतों  को छोड़ कर, शायद सब  गीत  आप सबको याद न हों,        तो उनकी  सूची  आप  देख सकते हैं __

गीत     फिल्म     गायक

लिखे जो खत तुझे     कन्यादान     रफी


ऐ भाई ज़रा देख के चलो     मेरा नाम जोकर     मन्ना डे

       

दिल आज शायर है

मेरा मन तेरा प्यासा                        गैम्बलर     किशोर कुमार

जीवन कि बगिया महकेगी     तेर मेरे सपने     किशोर- लता

मैंने कसम  ली     तेरे मेरे  सपने        किशोर-लता

मेघा छाए आधी रात ...    शर्मीली     लता

       

ओ मेरी शर्मीली .    शर्मीली     किशोर

फूलों के रंग से दिल कि कलम से     प्रेम पुजारी     किशोर

रंगीला रे .........    प्रेम पुजारी     लता- किशोर

राधा ने माला जपी श्याम की     तेरे मेरे सपने     लता

कांरवां गुज़र गया ...    नई उम्र की नई फसल     रफी

सुबह  न आई, शाम न आई     चा  चा चा     रफी

वो हम ना थे, वो तुम न थे .    चा चा चा     रफी

आज मदहोश हुआ जाए रे      शर्मीली     किशोर-लता

खिलते  हैं गुल यहाँ      शर्मीली     किशोर

एक मुसाफिर हूँ मैं, एक मुसाफिर है   तू- गुनाह



   दीप्ति की स्मृति से


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शुक्रवार, 31 मार्च 2023

गोपालदास नीरज और असली श्रोता

मेरा किसी भी बड़े साहित्यकार के साथ कोई निजी संस्मरण तो नहीं हैं, किंतु एक सामान्य श्रोता के रूप में मैंने कई महान कवियों को मंच पर कविता पाठ करते प्रत्यक्ष रूप में सुना है, जो आज तक स्मृति पटल पर ज्यों का त्यों अंकित हैं। अपनी टूटी-फूटी भाषा में लिखने की चेष्टा कर रहा हूँ। 

ये सत्तर के दशक के अंत और अस्सी के दशक के आरंभ के समय की बात है। हम लोग तब स्कूली छात्र थे।मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड प्रक्षेत्र में छतरपुर ज़िला मुख्यालय में वर्ष में कम से कम दो बार बड़े कवि सम्मेलन निश्चित रूप से हुआ करते थे। एक शारदीय नवरात्रि में दुर्गा जी के पंडाल के समक्ष और दूसरा दशहरा और दीपावली के मध्य कार्तिक मास में जलविहार के मेले में। दोनों ही कवि सम्मेलनों में उस समय देश के मूर्धन्य कविगण जैसे काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी, ओम प्रकाश आदित्य, सुरेश चक्रधर, सरोजिनी प्रीतम, माया गोविंद, गोपालदास नीरज, शैल चतुर्वेदी, सुरेंद्र शर्मा इत्यादि भाग लिया करते थे। मुझे भी इन कवि सम्मेलनों में इन महान कवियों से उनकी रचनाएँ उनके द्वारा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हल्की गुलाबी ठंड में श्रोता शाम ७ बजे से लेकर प्रातः ५ बजे तक पंडाल के नीचे बिछी दरियों पर जमें रहते, कविताओं के लगभग तीन दौर होते। मुझे याद है, गोपालदास नीरज जी अपनी सर्वश्रेष्ठ व नवीन कविताएँ/गीत अक्सर दूसरे या तीसरे दौर में सुनाया करते थे। पहले दौर में वे फिल्मों में आ चुके गीत व प्रचलित कविताएँ सुनाते थे, जब दूसरे या तीसरे दौर में मंच पर आते तो कहते, "अब दर्शक चले गए, असली श्रोता बचे हैं।" तब वे दर्शकों की नहीं, बल्कि अपनी पसंद की वास्तविक रचनाएँ सुनाते। प्रथम दौर में वे अक्सर चुहलबाज़ी भी किया करते, मंच पर उपस्थित कवियत्री को फ़िल्मी नायिका की उपाधि दी देते और खुद नायक बन जाते। दर्शकों को यह सब देख-सुन कर बड़ा मज़ा आता था। 

उन दिनों फ़िल्मों में परिवर्तन का दौर था। फ़िल्मी गीतों में बोलों के स्थान पर पाश्चात्य वाद्ययंत्रों से निकले कानफाड़ू संगीत को प्राथमिकता दी जाने लगी थी। इस दौर में नीरज जी जैसे गीतकारों को काव्यसृजन में कठिनाई का सामना करना पड़ता था। नीरज जी ने ही मंच से एक बार बताया था, कि फ़िल्म निर्माता गीत की धुन तैयार करके, उस पर बोल लिखे जाने की बात करते हैं, और यह ठीक वैसा ही होता है, जैसे कफ़न पहले तैयार कर लिया जाए और फिर उसके नाप का मुर्दा लाने को कहा जाए। वे कहते थे कि ऐसा वे ही गीतकार कर सकते हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा को मार दिया हो, और ऐसे में जो गीत सृजित होगा वह मृत गीत ही होगा, गीत की आत्मा उसमें हो ही नहीं सकती। एक बार माया गोविंद भी उनके साथ मंच पर थीं, उन्होंने भी अपने फ़िल्मी दुनिया के साथ के संस्मरण साझा करते हुए एक बार बताया था कि उन्हें एक बार एक सिचुएशन पर गीत के बोल लिखने को कहा गया, कि फ़िल्म की नायिका सारी रात नायक की प्रतीक्षा में जागती रही है, भोर की किरण छज्जे की दरार से आकर उसकी बिंदिया पर पड़ती है, और तभी गीत शुरू होता है। उन्होंने बताया कि मैंने कुछ दिन बाद निर्माता को एक मुखड़ा सुनाया, जो कुछ इस प्रकार था,
"रात-रात भर नींद न आए,
तू ही समाया निंदिया में,
सूरज घुस गया बिंदिया में।"

कहना न होगा, निर्माता ने उन से अनुबंध समाप्त ही कर दिया। तो ऐसे थे उस समय के कवि-गीतकार जिन्होंने कभी भी लक्ष्मी उपासना के लिए सरस्वती पूजा को नहीं छोड़ा। वे अपने मूल्यों और आदर्शों पर अडिग रहे, देश की सभ्यता और संस्कृति को अक्षुण्ण रखे रहे। तभी वे रचनाएँ इतनी सच्चीं, इतनी मधुर, इतनी सार्थक होती थीं कि उन्हें सुनकर मन नहीं भरता था।

- अमित खरे की स्मृति से।

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विष्णु प्रभाकर, गोपालदास नीरज और मैं

सबका अभिवादन! 

यह सर्वविदित है कि एक साहित्यकार का परिचय हमें उनकी रचनाधर्मिता और कृतित्व के माध्यम से मिल पाता है। उनकी रचनाओं में उनके अंतर और बाह्य रूप के दर्शन होते हैं, पर इससे भी अधिक अंतरंग पहलू को हम तब जान पाते हैं जब हमें व्यक्तिगत अनुभव होते हैं। 

मैं आदरणीय गोपालदास नीरज जी से संबंधित एक ऐसा ही निजी अनुभव अपनी लेखनी की सामर्थ्यानुसार आप सबके समक्ष रख रही हूँ।

बात वर्ष २००२ या २००३ की है। मैं उस समय कनाडा, टोरोंटो में अपने छोटे भाई सुधीर के पास आई हुई थी। वहाँ के एक प्रसिद्ध लेखक श्याम त्रिपाठी जी मिलने आए। वे अहिंदी भाषी देश में हिंदी की त्रैमासिक पत्रिका 'हिंदी चेतना' निकालने का सराहनीय कार्य कर रहे थे और अभी भी कर रहे हैं। वे बच्चन जी के ऊपर एक विशेषांक निकालना चाह रहे थे। इसके लिए वे बराबर बच्चन परिवार और अमिताभ बच्चन से संपर्क करने की कोशिश करते रहे, पर बड़े दुखी होकर उन्होंने बताया कि किसी ने घास नहीं डाली। बच्चन जी पर सामग्री न मिलने के कारण पत्रिका निकालना उनके लिए संभव नहीं था, अतः बड़े हताश थे। मुझसे उन्होंने बड़ी आशा के साथ इस कार्य में सहयोग देने का अनुरोध किया। मैंने हँस कर कहा, "अमिताभ बच्चन को तो आप भूल जाइए, मैं भारत पहुँच कर उनके समकालीन लेखकों (हालाँकि अधिकतर अब संसार में नहीं हैं) से संपर्क करने का प्रयास अवश्य करूँगी, यह मेरा आपसे वादा है।" त्रिपाठी जी के चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई। 

दिल्ली पहुँच कर दो महान साहित्यकार मेरे दिमाग़ में आए, आदरणीय विष्णु प्रभाकर और आदरणीय गोपालदास नीरज। एक बाबूजी पूज्य यशपाल जी से उम्र में बड़े और एक छोटे। पहले मैंने विष्णु ताऊजी को फ़ोन मिलाया और सब बात बताई। कहने लगे, "बेटी मेरा स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं है और कोई लिखने वाला मेरे पास नहीं है, अगर तू पास होती तो तुझे लिखवा देता।" मैं समझ गई कि उनसे बच्चन जी पर संस्मरण नहीं मिल पाएगा क्योंकि उनके अस्वस्थ होने की जानकारी मुझे पहले से थी। पर चार-पाँच दिन के बाद देखती हूँ कि उनका लेख आ गया। मैंने फ़ोन किया तो कहते हैं, "बेटी तेरी बात कैसे नहीं रखता।"

इस बीच मैंने नीरज चाचाजी को अलीगढ़ फ़ोन किया और बच्चन जी पर कुछ लिखने को कहा। एकदम बोले, "अन्नदा, तू एक काम कर। मेरी एक पुस्तक डायमंड पब्लिकेशन वाले छाप रहे हैं बच्चन जी के ऊपर, 'अग्निपथ का राही'।" पुस्तक पूरी नहीं हुई है पर डमी तैयार है। तू मेरा नाम लेकर वह मँगवा ले कि मैंने परमीशन दे दी है। उसमें अनेक लेखकों के संस्मरण हैं। त्रिपाठी जी को अच्छी सामग्री मिल जाएगी उसमें से।" 

मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि पुस्तक स्वयं के हाथों में पहुँचने के पहले कोई इस तरह से किसी और को देने की  उदारता दिखा सकता है। मैंने तत्काल डायमंड प्रकाशन को फ़ोन करके डमी की दो प्रतियाँ मँगवाईं और कनाडा रवाना कर दीं। त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक की सामग्री के आधार पर पूरा विशेषांक छाप दिया। वे बहुत प्रसन्न थे कि उनका यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ अंक बन गया था। वे समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे इन दोनों दिग्गज लेखकों के प्रति कृतज्ञ भाव प्रकट करें। 

मैं अभिभूत और गर्वित थी कि दोनों मूर्धन्य साहित्यकारों ने मुझ अकिंचन की छोटी-सी याचना को इतना महत्त्व दिया। संबंधों के प्रति संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता का यह अनुपम, अनुकरणीय व अविस्मरणीय उदाहरण है। दोनों महान विभूतियों को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि!

आदरणीय नीरज चाचा जी का वह गले पर हाथ रखकर खाँसना, मधुर और मदिर कंठ का वह सुरूर जो बिना मदिरा पिए श्रोताओं पर चढ़ जाता था। शृंगार, आध्यात्म और दर्शन का अनोखा संगम उनके काव्य की प्रमुख विशेषता थी। जाते-जाते ऐसा स्थान रिक्त कर गए हैं कि उसकी पूर्ति होना तो संभव ही नहीं है, पर उनकी रचनाएँ अमर हैं और उनके स्वर की मधुर गूँज हमारे कानों में सदा गूँजती रहेंगी। 
मेरा शत शत नमन।

- अन्नदा पाटनी की स्मृति से।

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शनिवार, 25 मार्च 2023

खरगौन में कवि सम्मेलन

सबसे अलग मेरी एक आपबीती भी सुन लीजिए।

बात सन १९८२ की है। खरगौन में कवि सम्मेलन था। जिसमें बालकवि बैरागी जी, नीरज जी, हास्य कवि शैल चतुर्वेदी जी सहित कई कवि शामिल थे। नीरज जी उस दिन कुछ ज्यादा ही मूड में थे। भारी भीड़ में लोगों ने शोर मचाना शुरु कर दिया। स्थिति गंभीर होती देखकर आयोजक भाग गए। लोग स्टेज पर चढ़कर हुल्लड़ करने लगे। व्यवस्था को बिगड़ता देखकर मैं अपने फ़ोर्स सहित स्टेज पर गया और इन महानुभावों को सुरक्षित निकालने के लिए लगभग डाँटता हुआ सा उठाया और सबको अपनी गाड़ी में बैठाकर लेकर भागा। पीछे-पीछे लोगों की भीड़। मैं बड़ी मुश्किल से लोगों को समझा पाया कि इन सब को गिरफ्तार किया जाएगा। मैं इन सब को लेकर सर्किट हाउस आया जहाँ मैं उन दिनों रहता था। एक कमरे में इन्हें बंद कर मैं तुरंत घटना स्थल पर वापस गया और भीड़ को नियंत्रित किया। फिर उस दिन कार्यक्रम नहीं हो सका। उपद्रव करने वाले कुछ लोगों को भी गिरफ्तार किया गया। करीब सुबह चार बजे मैं लौटकर आया।अपनी यूनीफ़ॉर्म उतारकर मैंने आदरणीय नीरज जी से माफी माँगी और कहा कि यह नाटक करने के अलावा आपकी सुरक्षा का कोई चारा नहीं था। बालकवि बैरागी जी बोले मुझे, कुछ मामला गड़बड़ है अंदर, आपने हम लोगों को बचाया क्यों? उन दिनों बैरागी जी भी प्रसिद्धि की ऊँचाइयों पर थे। मैंने उन्हें बताया कि आपकी नर्मदा वाली कविता मुझे बहुत पसंद हैं और आदरणीय नीरज जी की कविताएँ पढ़ते रहता हूँ। कभी-कभी खुद भी कुछ कविताएँ लिख लेता हूँ। उनके अनुरोध पर मैंने उन्हें अपनी कुछ कविताएँ सुनाई। सबसे अपनी विवशता के लिए क्षमा माँगते हुए खंडवा से सबको ट्रेन से रवाना किया। रवाना होने से पहले आदरणीय वैरागी जी ने मेरी डायरी में लिखा "अच्छी कविताओं के लिए बधाई"। यह मेरे जीवन का अविस्मरणीय प्रसंग बन गया है।

आनंद पचौरी की स्मृति से।

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सुबह की आरती में गूँजती चौपाई हैं नीरज

हाँ, वो क़िस्सा भी मज़ेदार था। हुआ यूँ कि नीरज जी सब से पहले तो अमेरिका में हमारे घर ही आए (वही उनका 'base' होना था। उन के १० कार्यक्रम पहले से तय थे। वाशिंगटन डीसी हमारे घर से क़रीब ३ घंटे की ही दूरी पर है, वहाँ के श्रोता भी जाने-पहचाने हुए हैं। कई बार वहाँ कवि सम्मेलनों में जाना होता रहा है। वहाँ हमारे मित्र और गीतों के राजकुमार राकेश खंडेलवाल जी भी रहते हैं। इसलिए यह तय हुआ कि पहला कवि सम्मेलन वहीं होगा। यह भी तय हुआ कि हम सब हमारे घर से सुबह नाश्ते के बाद चल कर दोपहर तक राकेश खंडेलवाल जी के घर पहुँचेंगे, वहाँ दोपहर का भोजन होगा और फिर कुछ आराम के बाद शाम को कवि सम्मेलन। मैंने एक दिन पहले राकेश जी को अपने घर के रास्ते के निर्देश भेजने को कह दिया था। राकेश जी बेहद अच्छे आशु कवि हैं, खड़े-खड़े किसी भी विषय पर छंदबद्ध कविता लिखे देते हैं। माँ सरस्वती का उन पर वरद्हस्त है। उन्होंने हमारे घर से अपने घर तक के निर्देश (कहाँ बाएँ लेना है, कहाँ दाएँ ….) पूरी छंदबद्ध कविता के रूप में ईमेल से भेज दिए। मैंने उसे ऐसे ही मज़ाक़ के तौर पर प्रिंट कर किया लेकिन फिर कंप्यूटर से सही निर्देश भी ले लिए। जब हम घर से चलने लगे तो हड़बड़ी में कंप्यूटर वाले निर्देश घर पर रह गए और राकेश जी की कविता वाला पृष्ठ साथ आ गया। यह बात रास्ते में पता चली। उन दिनों मोबाइल फ़ोन तो हुआ नहीं करते थे। हमने सोचा कि कहीं रुककर पब्लिक फ़ोन ढूँढने की बजाय क्यों न राकेश खंडेलवाल जी की कविता का सहारा लिया जाए उन्हीं के घर पहुँचने के लिए। मैंने वह पर्चा नीरज जी को थमाया। मैं गाड़ी चला रहा था, नीरज जी ने बड़े आनंद के साथ उस कविता को लय में पढ़कर मुझे राकेश जी के घर पहुँचने के निर्देश दिए। आप विश्वास कीजिए कि उस कविता के निर्देशों का अनुसरण करते हुए हम सही सलामत बिना कहीं रुके राकेश जी के घर पहुँच गए। हाँ, इस पूरी कसरत का फ़ायदा यह हुआ कि जब हम घर पहुँचे तब मुझे राकेश जी का परिचय नीरज जी से नहीं करवाना पड़ा। नीरज जी रास्ते में ही राकेश जी के फ़ैन हो गए थे। 

दुर्भाग्य से राकेश जी की कविता तो साथ नहीं है लेकिन एक मुक्तक जो उन्होंने उसी दिन नीरज जी के लिए लिखा था और जिसे मैंने नीरज जी को मंच पर आमंत्रित करते हुए प्रयोग किया वह मुझे अभी तक याद है,

मचलती शोखियों की एक मृदु अंगड़ाई है नीरज
नदी की धार में इठला रही जुनहाई हैं नीरज
ग़ज़ल हैं गीतिका है एक मुक्तक हैं रुबाई हैं
सुबह की आरती में गूँजती चौपाई हैं नीरज 

- अनूप भार्गव की स्मृति से।

'क़िस्से साहित्यकारों के' की परिचर्चा में यह कविता आगे एक मित्र अभिनव द्वारा उपलब्ध होती हैं,

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम सभी दिशा मिश्रित हो लेंगी,
जिधर चल पड़े गाड़ी प्रियवर, उसी तरफ़ को चलने दीजे,

वैसे टर्नपाईक पर दक्षिण दिशा आपको चलना होगा,
डैलावेयर और बाल्टीमोर पार फिर करना होगा,
कैलवर्टन का एक्जिट नंबर ट्वन्टी नाईन फिर ले लेना,
तीजा सिग्नल चैरी हिल का, उस पर आकर दाएँ मुड़ना,

पार कीजिए ट्वेन्टी नाईन यूएस का पुल, आगे बढ़ लें,
तीजा सिग्नल न्यू हैम्पशायर उससे भी आगे बढ़ लेना,
उसके बाद तीसरा सिग्नल, लेक टिवोली बुलेवार्ड का,
उसी मार्ग पर आकर प्रियवर, अपने दाएँ को मुड़ लेना,

पहला मोड़ बाएँ को जो है,नाम वही विलकाक्स लेन है,
उस पर नंबर सत्रह तेरह,मेरी छोटी सी कुटिया का,
वहीं आप आ जाएँ, दुपहरी भर विश्राम करें भोजन कर,
संध्या को फ़हरानी होगी फिर भाषा की हमें पताका।

- राकेश खंडेलवाल।

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नीरज की याद

नीरज जी साहित्य की दुनिया में एक आधारशिला सदृश्य थे। उन्होंने अपने साहित्य कर्म के कारण देश और समाज को गीतों के माध्यम से एक नया युग दिया। अविस्मरणीय उनकी हर रचना है, हर गीत है।

एक छोटा-सा ही किस्सा है, हमारे अपने साथ का...

हमें अपना गीत-संग्रह प्रकाशित करना था और हम चाहते थे कि हमारे इस गीत-संग्रह के गीतों की समीक्षा कोई बहुत बड़ा गीतकार अपनी प्रस्तावना के रुप में लिखें।

हमारी फिल्म इंडस्ट्री की गीतकार माया गोविंद जी से अक्सर बात होती रहती थी, वे बात बहुत अच्छे से बात करती थी। हमने उनसे अपने एक दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन में आने का आग्रह किया जो कि जलगाँव में प्रतिवर्ष आयोजित होता था,पर उनका कहना था कि वे ट्रेन मैं सफ़र नहीं कर पाएँगी क्योंकि उस समय उनकी कमर में बहुत ज्यादा प्रॉब्लम हुआ था। उनका कहना था कि हम फ्लाइट में आ सकते हैं। लेकिन हमारे शहर में फ्लाइट एयरपोर्ट नहीं होने के कारण यह बात हुई कि मुंबई से सरगाँव हालांकि ७ घंटे का रास्ता है लेकिन उन्होंने सिरे से मना कर दिया। काफ़ी दिनों बाद हमारा गीत संग्रह जब प्रकाशित होना था, हमने उनसे समीक्षा हेतु निवेदन किया, इस बार वे तुंरत राजी हो गई। प्रस्तावना लिखने पर हमें मुंबई के कुछ लोगों ने कहा कि प्रियंका जी कभी फ़िल्म लाइन से जुड़े लोगों को अपना लिखा कुछ भी नहीं देना चाहिए ये सब कब आपका लिखा अपने नाम से दुनिया के सामने पेश कर देते हैं हमें पता ही नहीं चलता। तो हम भी लोगों की कही-सुनी बातों में आ गए कि कहीं हमारे गीतों के साथ भी तो ऐसा हो गया तो? फिर हमने अपने गीत की पूरी कॉपी नहीं भेजी ही नहीं। ये २०१३ के आसपास की बात है।

फिर एक मित्र ने कहा कि आप नीरज जी से लिखवा लिजिए। हमने कहा नेकी और पूछ पूछ! आश्चर्य हुआ कि इतने बड़े व्यक्ति हमारे गीत संग्रह के लिए समीक्षा लिखेंगे! उन्होंने कहा कोशिश करने में तो कोई समस्या नहीं है। उनका नीरज जी के पास आना-जाना लगा रहता था। एक दिन उन्होंने नीरज जी से हमारी फोन पर बात कराई। पहले तो औपचारिक बातें हुई जैसे आप कहाँ रहती हैं?, क्या करती हैं?, कौन कौन सी विधा में लिखती हैं? हमने सभी बातों का बहुत ही अच्छे से खुशी-खुशी जवाब दिए। क्योंकि हमारे लिए ये ही बहुत बड़ी बात थी कि नीरज जी से हमारी बात हो रही है। उस समय उन्होंने हमारे कुछ गीतों को भी सुना और बहुत तारीफ़ की। हाँ उस समय भी उनकी तबीयत बहुत ख़राब थी। थोड़ी-थोड़ी देर में बात करते-करते खाँस रहे थे। बीच में किसी से पानी भी लाने को कहा। हमारे गीत सुनने के बाद उन्होंने कहा भी कि गीत बहुत अच्छे हैं, हम जरूर समीक्षा लिखकर देते पर तबीयत नासाज़ लग रही है। हम आपके गीत संग्रह समीक्षा हेतु मंगवालें और ना जाने कितने समय तक हमारे पास पड़े रहें, हम नहीं लिख पाए तो ऐसी स्थिति में आप किसी और से लिखवा लें। हमारा मन मायूस हो गया। पर उनकी एक बात ने हमारे मन में अनोखी ऊर्जा का संचार किया कि
"अरे बेटा, किसी से अपने लिखे पर क्या समीक्षा लिखवानी, हमारे अपने लिखे पर क्या कोई समीक्षा कर पाएगा हमारे अपने ज़ज्बात है, हमारी अपनी भावना है, हमारी भावनाओं को कोई नहीं समझ पाता। जो हम लिखते हैं और जिस समय हम लिखते हैं उस वक्त हम किस परिस्थिति से गुज़रते हैं, वह कोई नहीं समझ पाता है। तो बेहतर यह होता है कि हमें अपने लिखे की समीक्षा अक्सर अपने द्वारा ही लिखनी चाहिए।

हमारे दिल पर उनकी बातों का बहुत-बहुत असर हुआ और हमने अपने गीत संग्रह जिसका नाम 'झील का दर्पण' है, उसमें किसी से भी समीक्षा नहीं लिखवाई। उसके बाद एक और काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ, 'सिगरेट' नाम से उस पर भी किसी की समीक्षा नहीं ली।

नीरज जी ने शायद एक-एक शब्द सच कहा था। पर अब समय ऐसा हो गया है कि हमारी लिखी किताबों पर कोई बड़ा व्यक्ति अगर समीक्षा कर देता है, तो हमारी किताबों के मायने बहुत बढ़ जाते हैं।

नीरज जी के लिए

वो हिम्मत करके पहले अपने अंदर से निकलते हैं,
बहुत कम लोग है जो घर को फूंक के घर से निकलते हैं।
जो मोती है वो धरती पे कहीं पाए नहीं जाते,
हमेशा कीमती मोती समंदर से निकलते हैं।

- डॉ० प्रियंका सोनी "प्रीत", जलगाँव की स्मृति से

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लिखना तुम्हें साँसे देगा - नीरज (एक छोटी सी मुलाकात)

नीरज जी वास्तव में बहुत सरल व्यक्ति थे। उनसे अचानक हुई एक मुलाकात याद आती है। यह छोटा सा संस्मरण नीरज जी के प्रयाण पर दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हुआ था......

लगभग ३० वर्ष पहले जब मैं मैत्रेयी कॉलेज में अँग्रेज़ी ऑनर्स पाठ्यक्रम की द्वितीय वर्ष की छात्रा थी, तब एक दिन बस में मिले थे नीरज। एक सीट पर सफे़द कुर्ते-पाजामे में कुछ उम्रदराज से व्यक्ति को शांत अकेले बैठे देखा तो हैरत सी हुई। संयोग से और कोई सीट खाली ना होने के कारण मुझे उन्हीं के साथ बैठना पड़ा। उन्होंने सहज ही पूछा, यह बस कितनी देर में चलेगी। मैंने उत्तर दिया, "बस अभी भर गई है, तो जल्दी ही चल पड़ेगी।"  कुछ और सामान्य से उनके प्रश्न, "यहाँ पढ़ती हो?, कौन से कोर्स में? कौन सा साल? आदि। बता दिया, और फिर मैंने भी पूछ लिया, "आप यहाँ कैसे?" तो वे बोले, तुम्हारी प्रिंसिपल से मिलने आया था, "ओह!" संक्षिप्त सा उत्तर देकर मैं चुप हो गई, अब प्रिंसिपल के परिचित से छात्र क्या कहे! ज़रा रुककर वे बोले - "मेरा नाम नीरज है, गीत लिखता हूँ।"
मैं हतप्रभ थी, नीरज!!!  मैं चेहरे से वाकिफ़ नहीं थी क्योंकि उस ज़माने में चित्रहार में फिल्म और गीतकार के नाम दिए जाते थे सो नाम से तो मैं भली-भांति परिचित थी। यकीन नहीं हो रहा था कि जिनके गीत हम बचपन से सुनते-पसंद करते रहे थे, मेरे सामने थे, कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वे इस तरह रास्ते में मिल जाएँगे। हम यही सोचते थे कि जिस तरह हीरो-हीरोइन और फिल्मों के अन्य कलाकार, बड़े-बड़े व्यक्तित्व हुआ करते हैं, गाड़ियों में घूमते हैं, उसी प्रकार गीतकार भी होते होंगे। मैंने कहा मुझे पके गीत पसंद हैं। वे मुस्कुराए और मेरा अगला प्रश्न सुनकर हंस पड़े थे क्योंकि मैं उनसे पूछ बैठी थी - "आप नीरज हैं तो आप बस में सफ़र क्यों कर रहे हैं?" मुस्कुराकर उन्होंने कहा था, "क्योंकि बसें सफ़र करने के लिए होती हैं।"  हैरानी व संकोच में ज्यादा कुछ कह नहीं पाई फिर भी बैग से रजिस्टर निकालकर उनके हस्ताक्षर लिए थे। हस्ताक्षर करते हुए उन्होंने कहा था, मेरे हस्ताक्षर लेकर क्या करोगी? मैं कोई बड़ा आदमी थोड़े ना हूँ।

फिर भी उन्होंने शायद मेरा दिल रखने को शुभकामनाओं सहित लिखकर हस्ताक्षर किए थे। वे हस्ताक्षर भी उस घर से इस घर के सफ़र में कहीं गुम हो गए। बहुत संकोच से मैंने उन्हें बताया मैं भी थोड़ा-थोड़ा लिखती हूँ..। उन्होंने कहा था, "लिखते रहना, लिखना कभी छोड़ना मत, ये तुम्हें साँसे देगा...।" १९ की वय में उस समय शायद यह समझ नहीं आया था, आज आता है। ये वाक़या न जाने कितनी बार लिखने की सोची पर लिखा नहीं...। कल उनके जाने के समाचार से अब तक मन में गूँज रहे हैं शब्द, ये तुम्हें साँसें देगा...।

लेखन की राह पर चलने को प्रेरित करने के लिए मैं सदा उनकी आभारी रहूँगी।

सच नीरज, लिखने ने ही शायद आपको साँसें दी और हमें ऐसे गीत जो हमारी साँसों में बस गए। यही होता है अमर हो जाना। गीतकार तुम्हें नमन है!

- भावना सक्सैना की स्मृति से।

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कवि गोपालदास नीरज

नमस्कार साथियों, 

कवि नीरज से जुड़ा अपना एक संस्मरण साझा कर रहा हूँ। मुझे अनायास ही काफ़ी पुराना एक प्रसंग याद आ रहा है। अपनी नौकरी के शुरुआती बरसों में, सन सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध तक मैं चित्तौड़ में पदस्थापित रहा। उस ज़माने में चित्तौड़-भीलवाड़ा में कवि सम्मेलन खूब ही हुआ करते थे। बहुत बड़े-बड़े कवि सम्मेलन, दस-पंद्रह हज़ार की उपस्थिति और सारी-सारी रात चलने वाले। नीरज, काका हाथरसी, बालकवि बैरागी, सोम ठाकुर, संतोषानंद  आदि उन दिनों कवि सम्मेलनों के सुपरस्टार हुआ करते थे। अगर कोई कवि लालकिले पर आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन में काव्य पाठ कर आता था तो जैसे उसके सुर्खाब के पर लग जाया करते थे।

तो हुआ यह कि किसी कवि सम्मेलन में नीरज जी हमारे शहर में आए। तब तक फ़िल्मों में भी वे काफ़ी कामयाब हो चुके थे और हर कवि सम्मेलन में उनसे 'मेरा नाम जोकर', 'शर्मीली', 'प्रेम पुजारी', 'छुपा रुस्तम' वगैरह के उनके लिखे लोकप्रिय गीतों को सुनाने की फरमाइश की जाती थी और वे भी खुशी-खुशी उन फरमाइशों को पूरा करते थे। ज़ाहिर है कि इस तरह की रचनाओं और कुछ और लोकप्रिय गीतों जैसे 'कारवाँ गुज़र गया' वगैरह में ही सारा समय बीत जाता और वे  नया कुछ तो कभी सुना ही नहीं पाते। मैं उनसे मिलने गया और बातों का सिलसिला कुछ ऐसा  चला कि मैं उनसे यह कह बैठा कि कवि सम्मेलनों में उनसे फ़िल्मी गाने सुनकर मुझे बहुत निराशा होती है। और भी काफ़ी कुछ कह दिया मैंने उनसे। उन्होंने बहुत धैर्य से मेरी बातें सुनी और फिर बड़ी शालीनता से मुझसे दो बातें कही। एक तो यह कि इन सब बातों से वे भी परिचित हैं, लेकिन यह उनकी मज़बूरी है कि जिन लोगों ने अच्छे-खासे पैसे देकर उन्हें बुलाया है, उन्हें वे खुश करें और दूसरी यह कि उनके पास भी अच्छी और नई कविताएँ हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाले कहाँ हैं? इसके जवाब में मैंने उनसे कहा कि सुनने वाले तो हैं लेकिन उनके पास आपको देने के लिए बड़ी धन राशि नहीं है। नीरज जी ने कहा कि अगर सच्चे कविता सुनने वाले मिलें तो वे बिना पैसे लिए भी उन्हें अपनी कविताएँ सुनाने को तैयार हैं। उनके इस प्रस्ताव को मैंने तुरंत लपक लिया और उन्हें अपने कॉलेज में काव्यपाठ के लिए ले गया। विद्यार्थियों से मैंने कहा कि नीरज जी बिना एक भी पैसा लिए हमारे यहाँ केवल इसलिए आए हैं कि हम उनसे सिर्फ़ और सिर्फ़ कविताएँ सुनना चाहते हैं, इसलिए आप उनसे कोई फरमाइश न करें। जो वे सुनाना चाहें वह सब उन्हें सुनाने दें। 

आज मैं इस बात को याद करके चमत्कृत होता हूँ कि नीरज जी ने लगभग दो घंटे अपनी बेहतरीन कविताएँ सुनाईं, और मेरे विद्यार्थियों ने पूरी तल्लीनता और मुग्ध भाव से उन्हें सुना। इसके बाद मैंने ही नीरज जी से अनुरोध किया कि हमारे विद्यार्थियों ने इतने मन से आपको सुना है, अब अगर आप इनकी पसंद के दो-एक गीत भी सुना दें तो बहुत मेहरबानी होगी। नीरज जी की उदारता देखिए कि उन्होंने विद्यार्थियों की फ़रमाइश पर अपने सारे लोकप्रिय फ़िल्मी गीत भी एक-एक करके सुना दिए! लेकिन उस दिन मुझे महसूस हुआ कि 'छुपे रुस्तम हैं हम क़यामत की नज़र रखते हैं' और 'ओ मेरी शर्मीली'  जैसे गाने लिखने और सुनाने वाले नीरज के भीतर एक कवि उदास और इस इंतज़ार में बैठा है कि कोई आए और उससे कुछ सुनने की इच्छा ज़ाहिर करे!

- दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की स्मृति से।


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