‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



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शनिवार, 25 मार्च 2023

कामिल बुल्के जी के व्यक्तित्व की पुण्य स्मृति में

सुदूर दक्षिण में रहनेवाली मुझे भी पुण्यात्मा कामिल बुल्के जी के दर्शन का सौभाग्य मिला। यह १९७२-७३ की बात है। मैं उस्मानिया विश्वविश्वविद्यालय में एम०ए० हिंदी की छात्रा थी। "एशिया के देशों में राम कथा" के संदर्भ में उन्होंने व्याख्यान दिया। प्रशांत मुद्रा में उनके भाषण के साथ उनका व्यक्तित्व भी झलक रहा था। तब मुझे समझ में आया कि किसी भी भाषा पर कोई अन्य भाषा-भाषी भी साधिकार बोल सकता है, बशर्ते परिश्रम के साथ उस भाषा के प्रति प्रेम हो। प्रेम के कारण परिश्रम का समय भी आनंददायक होता है। 

हिंदी विभाग में थोड़ी सहमी सकुचायी-सी रहती थी। मेरे आचार्य बनारस हिंदू विश्वविद्यालय एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के थे। विवाह के बाद मैं हैदराबाद आई। मैं गोदावरी किनारे पर बसे राजमहेंद्री नगर की हूँ। फादर कामिल बुल्के मेरे प्रेरणास्रोत रहे। आज से पचास साल पहले उन्होंने मुझमें साहस जगाया। 

ख़ैर, व्याख्यान का दिन आज मेरी स्मृति में फ़ोटो जैसे सुरक्षित है। बड़ा हॉल पचास-साठ विद्यार्थी एवं अन्य विशिष्ट व्यक्तियों से भरा था। व्याख्यान के बाद मैंने भी प्रश्न पूछा था। राम के संदर्भ में उनका यह उद्धरण आज भी मुख-मुद्रा के साथ याद है -  
"अवनि हिमाद्रि समुद्र जनि करहु वृथा अभियान  
शांत धीर गंभीर तुम सम राम सुजान।।" 

- प्रोफ़ेसर पी० मणिक्याम्बा 'मणि' की स्मृति से।

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कामिल बुल्के से मैं भी मिला था!

डॉ० फ़ादर कामिल बुल्के से मैं भी मिला था! बेल्जियम से थे! उनके हिंदी शब्दकोश से अधिक प्रामाणिक शायद ही कोई दूसरा हो!

वे रामायण पर रिसर्च करना चाहते थे, परंतु मृत्यु ने उन्हें हम सबसे छीन लिया!

बीआइटी रांची में भी कई बार आए थे। दो बार तो स्वयं मैं उन्हें लेकर आया काॅलेज में समारोह के लिए। (इंजीनियरिंग के चौथे वर्ष में मैं अपने काॅलेज में भारतीय साहित्य परिषद के संपादन विभाग का अध्यक्ष रहा, और कई वर्षों के बाद वार्षिक पत्रिका रचना १९८४ छापी, जो श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उद्घाटित भारतीय विज्ञान कांग्रेस का विशेष संस्करण थी, और पहली बार रंगीन फोटो छपे थे, श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उद्घाटन के भी)।

डॉ० फ़ादर कामिल बुल्के चर्च और मंदिर, दोनों जगह समान सम्मान पाते थे और दो-तीन बार उनके मुंह से मैंने सुना था, कि राम सबके हैं, और रामायण किसी एक धर्म विशेष का धर्म ग्रंथ नहीं है बल्कि विश्व ग्रंथ है।

डॉ० फ़ादर कामिल बुल्के के व्यक्तित्व के आस-पास भी अगर कोई रहा, तो धार्मिक सहिष्णुता उस व्यक्ति के मन में स्थिर हो गई। उनकी बुराई करने वाला मुझे आज तक कोई मिला ही नहीं।

मुझे ठीक से याद नहीं पर उनकी मृत्यु संभवतः १९८२ अथवा १९८३ में हुई।

- अशोक शुक्ल की स्मृति से।

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फ़ादर कामिल बुल्के

१९६८ की बात रही होगी, मैं विज्ञान स्नातक के प्रथम वर्ष का छात्र था, हिंदी हमारा विषय नहीं थी, केवल फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स। जमशेदपुर की कोऑपरेटिव कॉलेज बनफ कॉलेज मानी जाती थी, छात्रों की संख्या के अनुसार और क्षेत्रफल के अनुसार भी। एक विभाग से दूसरे विभाग में हम साईकल से जाया करते थे। फिर लाइब्रेरी, कैंटीन, कॉमन रूम इत्यादि इत्यादि सब अलग। हमारी कॉलेज रांची विश्वविद्यालय का हिस्सा थी और कॉलेज के हिंदी के विभागाध्यक्ष डॉ० सत्यदेव ओझा थे, पतले-दुबले लंबे, हर छात्र उनकी बहुत इज्जत करता था, मेरे जैसा छात्र भी। रांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ० फादर कामिल बुल्के थे, वे सेवियर रांची के भी विभागाध्यक्ष थे। उनका शब्द कोश नया-नया आया था और पूरे भारत में चर्चा का विषय था। तभी एक नोटिस लगी कि फलां तारीख को थिएटर नंबर ४ में उनका व्यक्तव्य होगा, जो विद्यार्थी सुनना चाहें समय से पहले स्थान ग्रहण करें। हम कुछ विज्ञान के विद्यार्थी जिन्हें हिंदी से प्रेम था, वे भी गए। अच्छा रौबीला चेहरा, दाढ़ी युक्त, बोलने का अंदाज़ इतना प्रभावी कि व्यक्ति बरबस ही आकर्षित हो जाए। रुक-रुककर शब्दों को चबा-चबाकर बोलने का तरीका कि हर शब्द स्पष्ट हृदय में उतरता जाए। उन्होंने बाल्मीकि रामायण और राम पर एक घंटा अपना व्यक्तव्य दिया। कोई भ्रम नहीं कि क्या बोल रहे हैं। आज भी वह व्यक्तव्य कानों में गूँजता है। बहुत से आख्यान तदपुरांत सुने, कई महात्माओं के भी सुने, पर सीधे विषय केंद्रित वैसे एक या दो ही सुने होंगे। कहते हैं विष्णुकांत शाष्त्री जी का भी यही अंदाज़ है, पर मैंने उन्हें सामने कभी नहीं सुना, हाँ रिकॉर्डिंग ज़रूर सुनी है।

कुछ व्यक्तित्व जो नयनों के झरोखों में बस जाते हैं, उनमें निस्संदेह फादर कामिल बुल्के सर्वोच्च थे।

- सुरेश चौधरी की स्मृति से।

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