‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



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शुक्रवार, 24 मार्च 2023

ममता कालिया

मैं भी ममता जी से जुड़ी एक याद साझा करना चाहती हूँ, जो शायद उन्हें याद भी न हो।

बात सन १९९८ के आसपास की है। कुछ समय पहले ही मैंने अपने विवाहित जीवन में प्रवेश किया था। इलाहाबाद में अपनी गृहस्थी की शुरुआत के लिए मकान की तलाश में हम ममता जी के घर की तरफ़ भी गए।
उन दिनों मुझे पढ़ने के महत्व, चयन या उसके व्यापक रूप की जानकारी के बगैर सिर्फ पढ़ने से प्रेम था।
प्रतिष्ठित अख़बार में कार्यरत मेरे पति 'शहर के विशिष्ट परिचय' पर एक शृंखला कर रहे थे, उन्होंने मुझे इस शानदार दंपत्ति से मिलवाया।

बहुत अफ़सोस के साथ इसे मेरी अज्ञानता ही कहूँगी कि इन दोनों के सुंदर व्यक्तिव से प्रभावित होते हुए भी मेरा सारा उत्साह सिर्फ इस बात पर था कि मेरी मम्मी ममता जी की छात्रा रही हैं। उनके लेखन, उनकी विशिष्टता, किसी भी बात को मैं एक प्रशंसक, पाठक या अमूल्य निधि पाने वाले व्यक्ति की तरह नहीं निभा पाई।

आज बार-बार लगता है कि उस समय को जाकर पकड़ लाऊँ और पूरी तरह से अपने लिए जी लूँ, जब मेरे सामने हँसते-मुस्कुराते हुए रवींद्र जी और उनकी ढेर सारी बातें थीं।

उनके स्नेह में भीगी ममता जी की वह दृष्टि और भाव मुझे अभी तक याद हैं जब उन्होंने रविंद्र जी के लेखन की तारीफ़ करते हुए कहा था कि ये इतना अद्भुत लिख कर भी उसे जिस सरलता में छुपा लेते हैं, उसके लिए शिकायत करूँ या सराहना पता नहीं।

मेरे कहने पर भी ममता जी ने बिना मेरी मदद लिए ज़िंदगी के भरपूर स्वाद से भरी चाय तो पिलाई ही, साथ ही हमारी नई ज़िंदगी की समझ के लिए दोनों ने मिलकर अपने बहुत सारे खट्टे-मीठे अनुभव और सीख बाँटी।
खिलखिलाते हुए उन कुछ घंटो की सभी बातें तो नहीं याद है लेकिन उन दोनों के स्नेह की उस छाप को मैं कभी भुला नहीं पाई हूँ।



- अर्चना उपाध्याय की स्मृति से।

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गुरुवार, 23 मार्च 2023

ममता कालिया - पहाड़ की छांह में

प्रिय लेखिका से फिर मिलना
वह भी एक पत्र के बहाने!

ममता कालिया अचानक मेरी प्रिय लेखिका नहीं बन गईं। उनका उपन्यास 'बेघर' पढ़ने के बाद एक लंबा अंतराल रहा। जब मैं हिंदी पढ़ाने विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में हंगरी के विख्यात ऐलते विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन विभाग में पहुँची, तब मेरे कक्ष की अलमारी में ममता कालिया बहुविध बिराजी हुई थीं। मैं एक सिरे से उन्हें पढ़ती चली गई, उनके लेखकीय व्यक्तित्व से गहरे जुड़ती चली गई, इतना कि विभाग के इकलौते एम०ए० हिंदी के छात्र पीटर को सुझाया कि शोध के लिए ममता कालिया के कथा साहित्य पर विचार करो, उन्हें पढ़ने के बाद। 
 
ठीक याद है कि 'बेघर' पढ़ने के बाद एक पत्र मैंने ममता जी को लिखा था - एक पाठक का प्रशंसा पत्र...। जो उनकी बेशुमार फैन मेल में से एक रहा होगा।
लेकिन मेरे लिए, उस पत्र का उत्तर एक अकेला ही रहा।
नहीं मालूम था कि आने वाले समय में ममता जी से साक्षात्कार होगा, कई रूपों में कई बार मिलना होगा और उनकी कृतियों से जी भरकर प्यार होगा...। इतना कि बहुतों से ललक कर कहूँ - ममता कालिया को पढ़ना! तुम्हें अच्छा लगेगा।

आज ममता जी का वह पत्र साझा कर रही हूँ, जिसने पुख़्ता किया कि ममता जी नहीं बदली! वही हैं, मस्त मगन अल्हड़ मुक्त और बेहतरीन स्मरण शक्ति की मालकिन!

पत्र के अंत में वे लिखती हैं कि आप पढ़ती रहें तो लिखने में क्या है हम लिखते रहेंगे!
और वे लिख रही हैं तब से अब तक   ...अनवरत!

शुभकामनाएँ अनंत प्रिय लेखिका!!

ममता कालिया का पत्र पाठक विजया सती को (पृ० १)
(पृ० २)



















प्रिय विजया, 
आपका पत्र कई स्तरों पर आल्हादित कर गया। इतनी जिज्ञासा कि मेरी रचनाएँ ढूँढ-ढूँढकर पढ़ी, मुझे अभिभूत कर गई। दूसरी बात, आप मेरे पुराने व प्रिय कॉलेज से जुड़ी हैं। १९६१-६३ में जब हिंदू कॉलेज में मैं एम०ए० की छात्रा थी, महिला लेक्चरर्स नहीं रखी जाती थीं। इतनी प्रगति प्राप्त की कॉलेज ने। आँखों के आगे कॉलेज के गलियारे, कैंटीन, क्लासरूम सब घूम गए। पता नहीं मेरे विभाग के प्रोफ़ेसर वहीं हैं कि बदल गए, प्रोफ़ेसर कँवर, सूद, देसाई, रैना, बहुत कुछ याद गया आपके पत्र से।
आप पढ़ती रहें तो लिखने में क्या है, हम लिखते रहेंगे।

ममता कालिया
१७-१०-७९

- विजया सती की स्मृति से।

ममता कालिया इस समृति पर कहती हैं,

"प्रिय विजया सती, इतने अरसे में पत्ते पेड़ से झड़ जाते हैं पर आपने मेरे पत्र का पन्ना संभाल कर रखा। आप नहीं जानती कि कितना जीवन सिंचन कर दिया आपने मेरे अंदर। कोई दूर बैठा हमें पढ़ रहा है, यह एक विरल, विलक्षण प्रेम अनुभूति है।"

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