‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



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रविवार, 14 अप्रैल 2024

सदी के महानायक से भेंट

महाकवि हरिवंशराय बच्चन और मेरे पिताजी प्रख्यात कवि व साहित्यकार प्रोफेसर स्व  दिनकर सोनवलकर जी घनिष्ठ मित्र थे।इन दोनों कवियों की पहली मुलाकात का प्रसंग भी बहुत मार्मिक है।1960 के आसपास जबलपुर में एक कविसम्मेलन सेठ गोविन्ददास जी के सौजन्य से आयोजित किया गया था।इसमें 53 वर्षीय बच्चन जी और 28 वर्षीय पिता स्व दिनकर जी एक ही मंच पर थे।बच्चन जी ने उनकी पहली पत्नी स्व श्यामाजी की याद में एक दुखांत कविता "साथी अंत दिवस का आया;"लिखी थी।दिनकरजी ने उसी मंच पर यही कविता गीत रूप में स्वरबद्ध कर अपने स्वर में हारमोनियम पर ऑंखे बन्द कर तल्लीनता से प्रस्तुत की।जैसे ही गीत समाप्त कर दिनकर जी ने आंखें खोली ,देखा बच्चन जी की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही है ओर वे दिनकर जी को एकटक देख रहे हैं।दिनकर जी अपराधबोध से ग्रस्त हो गए कि मैंने ये गीत सुनाकर महाकवि को दुखी कर दिया।अगले ही पल बच्चन जी उठे और दिनकरजी को गले से लगाकर कवि सम्मेलन के बाद अपने साथ होटल में ले गये जहाँ वे ठहरे हुए थे।वहां परिचय हुआ और पतों व एक दूसरे के काव्य संग्रहों का आदान प्रदान हुआ। उस समय दिनकरजी विवाह के बाद खण्डवा कॉलेज की शासकीय नौकरी दमोह के मोह में छोड़कर दमोह के निजी स्कूल में अध्यापक हो गए थे।ओशो उनके सहपाठी थे ही। अब बच्चन जी और दिनकरजी में पत्रों के नियमित आदान प्रदान का सिलसिला जो आरम्भ हुआ वो 2000 तक दिनकरजी की मृत्यु के कुछ साल पहले तक चलता रहा।बच्चन जी दिनकरजी के पैतृक घर दमोह भी आये और 1966 में रतलाम कॉलेज के गेदरिंग में दिनकरजी के अनुरोध पर मुख्य अतिथि बतौर शामिल हुए व मधुशाला सुनाई।इस कार्यक्रम में हारमोनियम दिनकर जी ने बजाई।बालकवि बैरागी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे।दिनकर जी रतलाम कॉलेज में 64 से 70 तक रहे व 70 से 2000 तक मृत्यु पर्यंत जावरा में रहे जहां कॉलेज की लाय ब्रेरी,विश्राम गृह मार्ग दो स्कूल एक तालाब उनके नाम पर है।रतलाम में 67 में पुनः बच्चन जी एक रात 12 बजे दिनकरजी के स्टेशन रोड निवास पर ट्रेन लेट होने से आये और उनकी पत्नी का नाम मीरा से मीनाक्षी रखा व दो वर्षीय बिटिया प्रतीक्षा के स्लेट पर चिड़िया बनाकर 51 रुपए आशीर्वाद स्वरूप दिये। उसी समय अमिताभ के निर्माणाधीन घर का नाम भी संयोगवश प्रतीक्षा रखा गया।एक बार दिनकरजी72 में चकल्लस कार्यक्रम के दौरान  बच्चन जी के निवास पर गए तब भोजन उपरांत बच्चन जी के निर्देश पर अमिताभ ने सितार पर कुछ धुन सुनाई।

बच्चनजी ने अपने समस्त संग्रह दिनकरजी को भेंट किये व पत्रों में अपनी भावनाएं व वेदना भी व्यक्त करते थे।यहाँ तक कि तत्समय अमिताभ और रेखा के प्रेम प्रसंग को लेकर उतपन्न परिस्थितियों पर भी बच्चन जी पिता दिनकरजी से पत्रों में शेयर करते थे।उस समय फोन दुर्लभ व मोबाइल तो थे ही नहीं।कुछ े पत्र दुष्यंत स्मृति संग्रहालय भोपाल में देखे जा सकते हैं।

ये पीठिका इसलिये आवश्यक थी ताकि अमिताभ जी से मेरी मुलाकात की प्रस्तावना स्पष्ट हो सके।बचपन से ही मैं भी महानायक की फिल्मों का मुरीद था अब भी हूँ और गर्व से मित्रों परिचितों को उनसे और उनके पिता से अपने पिता के सम्बन्धों को बताया करता था।एक स्वाभाविक इच्छा थी कि महानायक से इन सम्बन्धों,स्मृतियों ,संस्मरणों ,पुराने पत्रों फोटोज के साथ भेंट की जाए।महाकवि बच्चन  के 2003 में अवसान पर मैंने संवेदना पत्र के साथ दिनकरजी व महाकवि के कुछ पत्र व फोटोज अमिताभ जी को प्रसंगवश भेजे।आश्चर्यजनक रूप से 15 दिन बाद अमिताभ जी का प्रिंटेड उत्तर आया जिसमें उन्होंने अपने हाथ और हस्ताक्षर से पुनश्चः करके ये लिखा कि आपके पिताजी और आपके 


सम्बन्ध बाबूजी और मेरे परिवार से थे ये स्मरण कर मन भर आया।पुरानी स्मृतियां छवियाँ साकार हो गई।कभी मुम्बई आएं तो मिलें।

पत्र के साथ बच्चन जी का फोटो जिस पर उनकी पंक्तियाँ लिखी थी "मैं खुद को छुपाना चाहता तो जग मुझे साधु समझता।शत्रु मेरा बन गया है छल रहित व्यवहार मेरा ",

इस पत्र के बाद महानायक से मिलने की उत्कंठा अधिक बढ़ गई  2009 में उज्जैन पदस्थापना के बाद लगभग 2014से मैंने महानायक के पते पर मिलने की तिथि हेतु सतत पत्राचार आरम्भ किया।कहीँ से उनके निवास का नम्बर मिलने पर कई बार फोन भी लगाए ।हमेशा उनकी सचिव रोज़ी यही बोलती कि आपके पत्र सर को भेज दिये हैं जैसे ही वे समय देंगे आपको सूचित करेंगे।ऐसा लगातार महीनों तक चलता रहा।इसी बीच उज्जैन में स्व शिव शर्मा जी के निवास पर व्यंग्यकार स्व शरद जोशी के छोटे भाई लेखक स्व रोमेश जोशी जी से 2017 में भेंट हुई।वे भी दिनकरजी के मित्रवत थे।उन्होंने मुझे उनका और शिव शर्मा जी द्वारा लिखित उपन्यास हुजु रे आला भेंट किया।अनायास इसके कुछ दिन बाद फेसबुक पर महानायक को ये उपन्यास भेंट करते हुए रोमेश जी का फोटो देखा।मैंने उनसे ये रहस्य पूछा कि आप किस माध्यम से अमिताभ जी से मिल लिये।उन्होंने बमुश्किल बताया कि मेरे दामाद श्री पराग चाफेकर अमिताभ जी के फ़िल्म वितरण के पार्टनर हैं और उनके कारण ही ये सम्भव हुआ।बहुत प्रार्थना के बाद उन्होंने पराग जी का नम्बर दिया ।बस बातों बातों में पराग जी से अनुनय विनय अनुरोधों की लंबी श्रृंखला के बाद दो साल बाद जनवरी 2018 में पराग जी का संदेश आया कि अब आपकी मुलाकात का स्वप्न साकार होने के आसार दिख रहे है।मैं प्रफुल्लित हो गया।जनवरी के बाद अक्टूबर2018 आ गया।मैं पराग जी को परेशान करता रहा कि दादा कब मुलाकात होगी।यही रोज़ी मेडम उन्हें भी टालती रही।आखिर एक दिन 26 आकटूबर को पराग जी ने अमिताभ जी को उलाहना देते हुए बोल दिया कि आपको प्रतीक सोनवलकर से नहीं मिलना है तो साफ मना कर दीजिये।बस महानायक ने बोला तुम नाराज मत हो ।30 अक्टूबर को शाम साढ़े छह बजे उन्हें बुला ही लो। पराग जी का जब फोन आया मैं सिंहस्थ मेला भवन में विधानसभा चुनाव की मीटिंग में था। मेरी बाँछें खिल गई।खिलती भी क्यों नहीं बरसों पुराना स्वप्न जो साकार हो रहा था।मैं और मेरा बेटा एडवोकेट व कवि सार्थक सोनवलकर 30 अक्टूबर को विमान से ढाई बजे मुम्बई पहुंचे। पराग जी के साथ  सवा 6 बजे जलसा में प्रवेश किया।वहाँ का सारा स्टाफ पराग जी से परिचित है ।कक्ष में बैठते ही चाय आई और सहायक ने बताया कि साहब का कोई विदेशी मेहमान इंटरव्यू ले रहे हैं और साहब आते हैं। ये कहकर वह चला गया।हमें लगा कम से कम 15 मिनिट तो लगेंगे ही। महानायक के समय की पाबंदी और अनुशासन देखिये कि हमारी चाय भी खत्म नहीं हुई और वे अकेले ही कक्ष में तीन मिनिट यानी 6बजकर 29 मिनिट पर इन्टरव्यू छोड़कर दिये समय के एक मिनिट पहले आ गये।

आते ही पराग जी को मुस्कुराते हुए धौल जमाई कि तू बहुत परेशान करता है। पराग जी ने मेरी ओर इशारा किया बोले इन्हीं के लिये आपको परेशान किया।मैंने और पुत्र ने उनके  चरण स्पर्श किये और महाकाल का प्रसाद,भस्मारती की भस्म,हरिओम जल ,पीला दुशाला ,उज्जैन का नमकीन मिठाई उन्हें भेंट की।उनकी विनम्रता देखिए प्रत्येक वस्तु ध्यान से अपने हाथों में ली और ससम्मान ग्रहण कर मेज पर रखी।मैंने बच्चन जी की वही कविता जिसे सस्वर सुनकर  वे पिता दिनकरजी से प्रभावित हुए थे,अपने स्वर में स्वरबद्ध कर उपरोक्त  तमाम संस्मरणों सहित उन्हें भेंट की।वे भी अभिभूत हुए और यादों में खो से गये। प्रत्येक संस्मरण महानायक ने बिना हड़बड़ी के धैर्यपूर्वक सुना और गुना।महाकाल का दुशाला उन्होंने इसलिये नहीं पहना क्योंकि ठग्स ऑफ हिंदुस्तान की शूटिंग के स्टंट में उनके हाथ  में चोट लगने से प्लास्टर बंधा था।फ़ोटो की बारी आई तो उन्होंने अपने तरीके से मेरा और सार्थक का हाथ पकड़कर अलग अलग कोणों से फ़ोटो खिंचवाए।पुत्र सार्थक ने जब मधुशाला की दो प्रतियों पर उनके ऑटो ग्राफ चाहे तो बोले दो पर क्यों ?पुत्र ने कहा एक मेरी और एक मित्र के लिये।उन्होंने सहर्ष ऑटो ग्राफ दिये और बेटे से पूछा तुम कहाँ रहते हो ,क्या कर रहे हो,क्या इरादा है आदि। इसी बीच मैंने उन्हें महाकाल व मध्यप्रदेश यात्रा का निमंत्रण दिया और स्मरण कराया कि कुली फ़िल्म की शूटिंग में आपके घायल होने पर महाकाल में भी प्रार्थना की गई थी।वे श्रद्धा से  भावुक हो गये। इसके बाद उन्होंने पूछा और कुछ आप कहना चाहते हैं?हमें भी लगभग 25 मिनिट हो गए थे हमने कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए इजाजत ली और पराग जी को विशेष धन्यवाद देकर गौरवपूर्ण यादों के साथ मुंबई एयरपोर्ट पहुंचे और रात साढ़े ग्यारह बजे उज्जैन लौटे।

कुल मिलाकर महानायक से मिलना असम्भव जैसा ही है और यदि पिता दिनकरजी के संदर्भ व पराग जी की पहल न  होती तो मिलना असम्भव ही था।पराग जी ने बताया कि 77 वर्ष की अवस्था में भी महानायक सुबह  साढ़े चार  बजे उठकर योगा जिम के बाद काम पर निकल जाते हैं और देर  रात 12 बजे के बाद आकर प्रशंसकों के कमेंट पर उत्तर देते हैं और नियमित स्वाध्याय के बाद ही केवल चार घण्टे विश्राम करते हैं।उनकी ऊर्जा व जीवटता दुर्लभ है।आगामी तीन वर्षो तक इतना काम है कि कोई डेट उपलब्ध नहीं है।महानायक को उनके 78 बसन्त पूर्ण होने पर बधाई शुभकामनाएं अभिनन्दन।वे इसी प्रकार स्वस्थ सक्रिय रहें और अपने अभिनय से देश और विश्व को आल्हादित आनन्दित करते रहें।

प्रतीक सोनवलकर की स्मृति से

 संयुक्त आयुक्त क्षेत्रीय ग्रामीण विकास व पंचायत राज प्रशिक्षण केंद्र इंदौर 


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शनिवार, 2 दिसंबर 2023

डॉ० हरिवंश राय बच्चन जी का खत कुंअर बेचैन के नाम

डॉ० हरिवंश राय बच्चन जी का पत्र पिताश्री डॉ० कुँअर बेचैन जी के लिए अमिताभ बच्चन जी के लैटरहैड पर**

बात है 1975-76 की जब मैं पाँच वर्ष का रहा होऊँगा। एक दिन डाकिया रोज की तरह दरवाज़े की साँकल बजाकर घर में चिट्ठियाँ डालकर गया और दरवाज़े की साँकल की आवाज़ सुनकर हम बच्चे सीढ़ियों से उतरकर दरवाज़े की ओर दौड़े। तब हम ग़ाज़ियाबाद के पुराने शहर डासना गेट पर रहते थे जो घर पहली मंज़िल पर था। कुछ पत्रिकाओं, कुछ पोस्टकार्ड, कुछ अन्तर्देशीय पत्रों की भीड़ में एक बड़ा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा था जिस पर प्रेषक के नाम में लाल रंग से अमिताभ बच्चन लिखा था।

पापाजी सम्मेलन में बाहर गए हुए थे तो यथावत सारे पत्र मम्मी के हाथ में देते हुए हमने कहा कि ये पत्र पहले खोलकर पढ़ें ये अमिताभ बच्चन ने भेजा है पापाजी को। मम्मी ने भी उत्सुकता से पत्र खोला तो पहली पंक्ति में लिखा था,


प्रिय कुँअर,

मेरे लैटरहैड ख़त्म हो गए थे इसलिए ये पत्र मैं अमिताभ के लैटरहैड पर लिख रहा हूँ। 

तब तक मम्मी समझ चुकी थीं कि ये पत्र अमिताभ जी ने नहीं बल्कि डॉ० हरिवंश राय बच्चन जी का था जिसमें उन्होंने पापाजी के नवगीत संग्रह “पिन बहुत सारे” की बहुत प्रशंसा की थी और पापाजी के साथ साझा की मंच की कुछ स्मृतियों का भी उल्लेख किया था। उन्होंने एक संरक्षक की की तरह पापाजी को पुत्रवत रूप में ढेरों आशीर्वाद दिए हुए थे। 

पापाजी उस समय कोलकाता कविसम्मेलन में गए हुए थे और दो दिन बाद घर लौटे। जब मम्मी ने उनको सारे पत्र दिए तो पाया कि वो एक पत्र ग़ायब है। हम बच्चों से प्रश्न किया गया तो पाया कि वो तो सामने वाली ताऊजी के पास है। कारण था हम बच्चे उस पत्र को लेकर पूरे मोहल्ले में घूम रहे थे और मोहल्ले के हर घर में ये चर्चा थी कि डॉक्टर साहब के घर अमिताभ बच्चन का पत्र आया है। सारी मुँहबोली चाचीजी, ताईजी, बुआजी या दादीजी सबको मालूम था ये बात।

पापाजी ने कहा कि “जाओ लेकर आओ ताईजी के घर से वो पत्र।” जब हम लाए और पापाजी ने अपने फोल्डर में उस पत्र को सँभालकर रख लिया जहाँ वो सभी ज़रूरी प्रपत्र रखा करते थे। बाद में उन्होंने उस पत्र का उत्तर भी लिखा। 


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बाद में घर बदलने के समय पत्र इधर-उधर हो गए और नए घर में आने के बाद हम ये तलाशते ही रह गए कि वो पत्र कहाँ सँभालकर रख गया जो मोहल्ले और रिश्तेदारों में एक चर्चित प्रसंग रहा था। आज भी अफ़सोस है कि काश तब भी मोबाइल का ज़माना होता तो तुरंत पत्र का फ़ोटो खींचकर अपने पास रख लिया होता। 

इसके कई वर्षों बाद डॉ० हरिवंश राय बच्चन जी की स्मृति में एक कार्यक्रम में पापाजी भी आमंत्रित थे और जब वो लौटे उसके कुछ दिनों बाद पापाजी के लिए अमिताभ बच्चन जी का ही लिखा पत्र धन्यवाद रूप में आया। इस बार मैंने बिना देरी किए मोबाइल से पत्र की तस्वीर ली और अपने पास सुरक्षित रख लिया। तलाश है अभी भी उस पुराने पत्र की जो कहीं सँभालकर बहुत सुरक्षित रखा गया था।


-प्रगीत कुँअर की स्मृति से

(सिडनी, ऑस्ट्रेलिया)


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मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

बच्चन और उनकी पाठशाला

चालीस वर्ष पूर्व हम कुछ मित्रों ने एक संस्था बनाई थी, 'यंग फ्रेंड्स सोसायटी' (जो अब 'तरुण मित्र परिषद' के नाम से उल्लेखनीय कार्य कर रही है)। सोसायटी का वार्षिकोत्सव आज़ाद भवन, आई०सी०आर० नई दिल्ली में होना तय हुआ। भवन आरक्षित कर लिया गया और मुख्य अतिथि की खोज जारी हुई। बैठकों में एक नाम सर्वसम्मति से तय हो गया - श्रीमती तेजी बच्चन।

मैं संस्था का आयोजन मंत्री था, अतः श्रीमती बच्चन से मिलकर निवेदन करने का दायित्व मुझे दिया गया। मैं समझ नहीं पाया कि श्रीमती बच्चन से कैसे मिलूँ। मैंने कविवर श्री अजित कुमार से सहायता माँगी। वे किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे, जहाँ अमिताभ बच्चन छात्र रहे थे। अजित कुमार के सौजन्य से श्रीमती बच्चन से मिलना तय हो गया। तब वे १०, विलिंगटन क्रीसेंट, नई दिल्ली में रहती थीं।

हम लोग श्री अजित कुमार के साथ उनके घर गए और हमें श्रीमती बच्चन और डॉ० हरिवंशराय से मिलने का सौभाग्य मिला। दोनों के साथ हमने चायपान किया। बच्चन जी ने हमारी संस्था के विषय में पर्याप्त जानकारी ली और हमें तेजी बच्चन जी की स्वीकृति प्राप्त हो गई।

संयोग की बात कि निर्धारित दिन पर मुझे श्री बच्चन का फोन आया कि हम श्रीमती बच्चन को लेने के लिए ३ बजे आ जाएँ। कार्यक्रम संध्या ६ बजे होना तय हुआ था, मैंने पूर्ण विनम्रता से ज़ल्दी आने का कारण किसी भाँति घुमा-फिराकर पूछा, जिस पर जवाब मिला था कि तेजी जी को ठीक नियत समय पर पहुँचने की आदत है पर वे तैयार होने में पर्याप्त समय लेती हैं, अतः दो घंटे का अंतराल देना उचित होगा।

मेरे लिए बच्चन जी का फोन आकाशवाणी था और आदेश पालन कर्तव्यनिष्ठा। उन दिनों दिल्ली की सड़कों पर आजकल-सी भीड़भाड़ नहीं होती थी और मैं तीन बजे के स्थान पर ढाई बजे ही पहुँच गया।

१० विलिंगटन क्रीसेंट का वह बच्चन जी का बंगला, मंत्रियों के बंगलों-सा बड़ा बंगला था, लुटियन की बंगला कलाप्रियता का उदाहरण था। चारों तरफ़ खुली हरीतिमा में पीतवर्णी बंगला बहुत आकर्षक लगता था। मैंने फाटक खोला, बंद किया, झुरमुटों के बीच गुज़रते रास्ते से गुज़रा और बरामदे में लगे घंटी के काले परिवेश में समाहित सफेद बटन को छू भर दबाया, कोई प्रतिक्रिया नहीं, दूसरी बार भी नहीं, तीसरी बार दबाने पर अलसाई-सी आवाज़ आई, "रुकिए भई, खोलते हैं।" यह वर्षों से परिचित कवि की वह वाणी थी, जिसे बाल्यपन से गीतों के स्वर गुँजाते सुना था।

दरवाजा खुला, प्रश्नवाचक मुद्रा में बच्चन जी का गंभीर प्रश्न था, "अभी आ गए, अभी तो विश्राम कर रहे थे?" मैंने क्षमा माँगी। उन्होंने नज़रों से ही माफ़ कर दिया, पानी-वानी पूछा और फिर थोड़ी देर के लिए भीतर जाकर बाहर आए, इस बार उनके कंधों पर गहरे भूरे रंग की शॉल थी- सर्दियों के दिन थे, वे मुझे अपना बगीचा दिखाने लगे- मैं मंत्रबिद्ध यंत्रवत उनके साथ-साथ विचरण करने लगा। वे बड़े मन से एक-एक पौधे के विषय में सविस्तार बता रहे थे, मैं सुन रहा था और अपने को भाग्यवान मान रहा था कि मुझे अपने इच्छित व्यक्तित्व से रू-ब-रू होने का अवसर हाथ लग सका था।

बगीचे की यात्रा समाप्त हुई। अभी तो साढ़े तीन भी नहीं बजे थे, अब क्या होगा? बच्चन जी का टाइमटेबल तैयार था - अगली कक्षा बरामदे में हुई, पहली बॉटनी यानी वनस्पति की कक्षा थी और दूसरी कक्षा पुरातत्व की आरंभ हुई। यह कक्षा और भी रोचक थी बरामदे अनेक मूर्तियों, मूर्तिखंड, शिलालेख आदि से करीने से सजाए गए थे- बच्चन जी एक-एक कला प्रतीक दिखाते और वह कहाँ से कैसे उपलब्ध हुआ बताते और फिर पूरे समाचार सुनाते कि अमुक कला प्रतीक क्या है, किसकी व कब की निर्मिति है आदि-आदि। साढ़े चार बज गए। मैंने प्रश्नसूचक दृष्टि से बच्चन जी को देखा, वे मंदस्मित के साथ कह उठे, "अभी तो तैयारी के लिए तैयार हुई होंगी, उन्हें सजने-वजने में बड़ा वक़्त लगता है। ये आजकल बालों का फैशन भी तो अजीब सा है - वक्त लेता है।"

बरामदे में बिछी कुर्सियों में से दो पर हम दोनों बैठ गए और अब शुरू हुआ ट्यूटॉरियल, सर ने पूछा, "कहाँ पढ़ाते हो, क्या लिखते हो, कुछ बताओ-कुछ सुनाओ।"

मैंने उन्हें बताया कि मैं यूँ ही कुछ कविता-कहानी, व्यंग्य आदि लिखना सीख रहा हूँ पर जो सुनाता हूँ वह मेरा लिखा नहीं है- वह उनका लिखा है, यानी 'मधुशाला'। वे कुछ चौंके और टाइम पास के लिए मुझे सुनाने को कह दिया। अब उन्हें क्या पता था कि बरसों से मैं मधुशाला सुनाता हूँ बिल्कुल उनकी शैली में उनकी नकल करता सा। दरअसल मेरे बचपन के मित्र- श्री सुरेंद्र, जब भी अमृतसर से दिल्ली आते, हमारे घर में ठहरते और हम दोनों अक्सर मधुशाला का समवेत गान करते। श्री सुरेंद्र भाई से ही मैंने नाक से गाने का प्रयोग सीखा था, जैसा कि बच्चन जी गाते थे और अतिशय लोकप्रिय थे- उनकी मधुशाला की गायन ख्याति असीम थी।''

बहरहाल, मैंने "मेरे शव पर वह रोए, हो जिसके आँसू में हाला" गाना शुरू कर दिया, दूसरी पंक्ति में ही संकोच टूट गया और अंतिम पंक्ति के अंतिम अक्षर 'मधुशाला' गाने पर बच्चन जी की वाणी का साथ भी मिला।

यह एक भव्य मुलाकात थी जो मेरी स्मरण-डायरी का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। उस समारोह के बाद दो बार मैं श्रीमती बच्चन की फोटो देने के बहाने से अपने मित्रों के साथ विलिंगटन क्रीसेंट गया और दोनों बार श्रद्धेय बच्चन जी से बात करने का सुयोग हुआ। पहली बार उन्होंने शिकायत की थी कि हमने उन्हें तेजी जी वाले समारोह में 'आमंत्रित' क्यों नहीं किया। हम मानो कट से गए थे। दूसरी बार मैंने उन्हें बताया भी और दिखाया भी कि स्कूली जीवन में एक बार वे हमारे स्कूल में पधारे थे, उनके ऑटोग्राफ लेने के लिए बच्चे उमड़ पड़े थे, मैं अपनी ऑटोग्राफ-बुक थामे कहीं पीछे खड़ा था, मेरे लंबे-चौड़े सहपाठी राकेश ने मेरी ऑटोग्राफ बुक मुझसे लेकर आगे भीड़ में लड़-भिड़कर बच्चन जी के हाथ तक पहुँचा दी थी- बच्चन जी ने राकेश से पूछा था- "तुम्हारा घर का नाम क्या है" और ऑटोग्राफ दे दिए। मेरी ऑटोग्राफ बुक पर आज भी मैं देखता हूँ- लिखा है, "टिल्लू के लिए" और अँग्रेज़ी में 'गुड' लिखे जाने जैसे बच्चन जी के हस्ताक्षर मौजूद हैं। इस घटना के वर्षों बाद उस दिन उन्होंने मेरी आटोग्राफ बुक देखी थी, मैंने निवेदन किया था, "कृपया इस पर लिख देंगे 'हरीश के लिए'।" वे बोले, "नहीं, टिल्लू ने कहा था, उसी को ही ऑटोग्राफ दिए थे, तुम चाहो तो नए करवा लो।"

हम तीन मित्रों ने 'मित्रत्रयी' नाम से छिटपुट लेखन आरंभ किया था। हम 'मित्रत्रयी' की ओर से नूतन वर्षाभिनंदन पत्रक भी भेजते थे तथा परिचर्चा हेतु मत एकत्रित करते थे- मेरे पास उस समय के बच्चन जी के हाथ के लिखे पत्र मौजूद हैं। वे सभी के पत्रों का तुरंत जवाब दिया करते थे। 'मित्रत्रयी' द्वारा आयोजित एक परिचर्चा के लिए उनके हाथ का लिखा एक वक्तव्य भी है, जिसके संशोधन के लिए उन्होंने एक दूसरा वक्तव्य भी प्रेषित किया था। वे हर दृष्टि से एक संभ्रात, कुलीन व्यक्तित्व के स्वामी थे, जो सच्चा कर्मयोग का पाठ पढ़ाते थे।

सन १९७७-७८ की बात है, कांस्टीट्यूशन क्लब में एक सभा में मैं अपनी डेढ़-दो बरस की बेटी अन्विता को लेकर गया था। कार्यक्रम की समाप्ति पर डॉ० नगेंद्र और डॉ० विजयेंद्र स्नातक एक साथ बाहर की ओर आ रहे थे। दोनों का पहनावा लगभग एक-सा होता था। अन्विता ने आश्चर्य से भरे स्वर में ज़ोर से कहा था, "ओ दो दो नाना जी?"
वहाँ बच्चन जी भी थोड़ा पीछे खड़े थे, अन्विता ने देखा, वे भी धोती-कुर्ते में थे, असमंजस में कहा, "एक और नाना जी?" धीर-गंभीर बच्चन जी अपनी हँसी न रोक पाए और उसे प्यार से एक धौल दिया।

वह सभा बच्चन जी की संगोष्ठियों में भाग लेने वाली अंतिम सभाओं में से थी, फिर तो वे बीमारी की दीर्घ अवधि में फँसते चले गए थे। मैं दो बार उन्हें देखने गुलमोहर पार्क के उनके घर 'सोपान' में गया था। श्रीमती तेजी बच्चन उनकी सेवा-सुश्रूषा में निमग्न रहती थीं, उन्हें कष्टरहित देखना चाहती थीं। बीच में वे कुछ स्वस्थ भी हुए थे और कमानी सभागार में एक विशिष्ट समारोह में उन पर केंद्रित एक भव्य कार्यक्रम हुआ था, जिसमें श्रीमती इंदिरा गाँधी पधारी थीं। उक्त समारोह में श्री राजीव गाँधी और श्री अमिताभ बच्चन साथ-साथ आए थे। दिल्लीवासियों के लिए यह एक यादगार कार्यक्रम था जिसमें श्रीमती इंदिरा गाँधी, डॉ० हरिवंशराय बच्चन के समक्ष मानो एक भोली छोटी बालिका सी बन गई थीं और उनका आशीर्वाद लिया था।

.....और भी अनेक यादें हैं उस महाकवि की, उस भविष्यद्रष्टा की, पर उन्हीं के शब्दों में उनको याद करते हुए मन भीग उठता है :
अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला 
अपने युग में सबको अद्भुत ज्ञात हुआ अपना प्याला
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया
अब न रहे वे पीनेवाले अब न रही वह मधुशाला 

- हरीश नवल की स्मृति से।

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शुक्रवार, 31 मार्च 2023

विष्णु प्रभाकर, गोपालदास नीरज और मैं

सबका अभिवादन! 

यह सर्वविदित है कि एक साहित्यकार का परिचय हमें उनकी रचनाधर्मिता और कृतित्व के माध्यम से मिल पाता है। उनकी रचनाओं में उनके अंतर और बाह्य रूप के दर्शन होते हैं, पर इससे भी अधिक अंतरंग पहलू को हम तब जान पाते हैं जब हमें व्यक्तिगत अनुभव होते हैं। 

मैं आदरणीय गोपालदास नीरज जी से संबंधित एक ऐसा ही निजी अनुभव अपनी लेखनी की सामर्थ्यानुसार आप सबके समक्ष रख रही हूँ।

बात वर्ष २००२ या २००३ की है। मैं उस समय कनाडा, टोरोंटो में अपने छोटे भाई सुधीर के पास आई हुई थी। वहाँ के एक प्रसिद्ध लेखक श्याम त्रिपाठी जी मिलने आए। वे अहिंदी भाषी देश में हिंदी की त्रैमासिक पत्रिका 'हिंदी चेतना' निकालने का सराहनीय कार्य कर रहे थे और अभी भी कर रहे हैं। वे बच्चन जी के ऊपर एक विशेषांक निकालना चाह रहे थे। इसके लिए वे बराबर बच्चन परिवार और अमिताभ बच्चन से संपर्क करने की कोशिश करते रहे, पर बड़े दुखी होकर उन्होंने बताया कि किसी ने घास नहीं डाली। बच्चन जी पर सामग्री न मिलने के कारण पत्रिका निकालना उनके लिए संभव नहीं था, अतः बड़े हताश थे। मुझसे उन्होंने बड़ी आशा के साथ इस कार्य में सहयोग देने का अनुरोध किया। मैंने हँस कर कहा, "अमिताभ बच्चन को तो आप भूल जाइए, मैं भारत पहुँच कर उनके समकालीन लेखकों (हालाँकि अधिकतर अब संसार में नहीं हैं) से संपर्क करने का प्रयास अवश्य करूँगी, यह मेरा आपसे वादा है।" त्रिपाठी जी के चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई। 

दिल्ली पहुँच कर दो महान साहित्यकार मेरे दिमाग़ में आए, आदरणीय विष्णु प्रभाकर और आदरणीय गोपालदास नीरज। एक बाबूजी पूज्य यशपाल जी से उम्र में बड़े और एक छोटे। पहले मैंने विष्णु ताऊजी को फ़ोन मिलाया और सब बात बताई। कहने लगे, "बेटी मेरा स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं है और कोई लिखने वाला मेरे पास नहीं है, अगर तू पास होती तो तुझे लिखवा देता।" मैं समझ गई कि उनसे बच्चन जी पर संस्मरण नहीं मिल पाएगा क्योंकि उनके अस्वस्थ होने की जानकारी मुझे पहले से थी। पर चार-पाँच दिन के बाद देखती हूँ कि उनका लेख आ गया। मैंने फ़ोन किया तो कहते हैं, "बेटी तेरी बात कैसे नहीं रखता।"

इस बीच मैंने नीरज चाचाजी को अलीगढ़ फ़ोन किया और बच्चन जी पर कुछ लिखने को कहा। एकदम बोले, "अन्नदा, तू एक काम कर। मेरी एक पुस्तक डायमंड पब्लिकेशन वाले छाप रहे हैं बच्चन जी के ऊपर, 'अग्निपथ का राही'।" पुस्तक पूरी नहीं हुई है पर डमी तैयार है। तू मेरा नाम लेकर वह मँगवा ले कि मैंने परमीशन दे दी है। उसमें अनेक लेखकों के संस्मरण हैं। त्रिपाठी जी को अच्छी सामग्री मिल जाएगी उसमें से।" 

मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि पुस्तक स्वयं के हाथों में पहुँचने के पहले कोई इस तरह से किसी और को देने की  उदारता दिखा सकता है। मैंने तत्काल डायमंड प्रकाशन को फ़ोन करके डमी की दो प्रतियाँ मँगवाईं और कनाडा रवाना कर दीं। त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक की सामग्री के आधार पर पूरा विशेषांक छाप दिया। वे बहुत प्रसन्न थे कि उनका यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ अंक बन गया था। वे समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे इन दोनों दिग्गज लेखकों के प्रति कृतज्ञ भाव प्रकट करें। 

मैं अभिभूत और गर्वित थी कि दोनों मूर्धन्य साहित्यकारों ने मुझ अकिंचन की छोटी-सी याचना को इतना महत्त्व दिया। संबंधों के प्रति संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता का यह अनुपम, अनुकरणीय व अविस्मरणीय उदाहरण है। दोनों महान विभूतियों को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि!

आदरणीय नीरज चाचा जी का वह गले पर हाथ रखकर खाँसना, मधुर और मदिर कंठ का वह सुरूर जो बिना मदिरा पिए श्रोताओं पर चढ़ जाता था। शृंगार, आध्यात्म और दर्शन का अनोखा संगम उनके काव्य की प्रमुख विशेषता थी। जाते-जाते ऐसा स्थान रिक्त कर गए हैं कि उसकी पूर्ति होना तो संभव ही नहीं है, पर उनकी रचनाएँ अमर हैं और उनके स्वर की मधुर गूँज हमारे कानों में सदा गूँजती रहेंगी। 
मेरा शत शत नमन।

- अन्नदा पाटनी की स्मृति से।

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