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हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



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बुधवार, 27 सितंबर 2023

कृष्णा सोबती जी के साथ कुछ खट्टे अनुभव, मिठास के साथ।

 तब मैं ' कादम्बिनी ' का कार्यकारी संपादक हुआ करता था। मैंने सोबती जी से एक बार आग्रह किया कि आप हमें अगले अंक के लिए कोई संस्मरण दीजिए।वह तारीख भी बताई ,जब तक वह लिख कर दे सकें तो आगामी अंक में ही हम उसे छापना चाहेंगे।जहाँ तक याद आता है, 17 तारीख तक अगले महीने का अंक तैयार होकर प्रेस में छपने के लिए चला जाता था और उसी महीने की 25-26 तारीख तक छपकर आ जाता था।मैंने अंदाज़न कुछ पेज सोबती जी के संस्मरण के लिए छोड़ रखे थे मगर उनका संस्मरण मिला-अंंक छूट जाने के बाद।

व्यावसायिक पत्रिकाओं की अपनी मजबूरियाँँ होती हैं, उन्हें एक खास दिन छपने के लिए प्रेस में भेजना ही होता है।इस कारण वह संस्मरण उस अंक में न जा सका और मुझसे यह चूक हुई कि मैं सोबती जी को यह बात पहले नहीं बताई।बता देता तो शायद मामला सुलझ जाता।वैसे संभव यह भी है कि तब भी न सुलझता।जब अगला अंक उनके पास गया और उन्होंने देखा कि उनका वह संस्मरण नदारद है।शाम को उनका फोन आया कि वह छपा क्यों नहीं?मैंने कारण समझाया और कहा कि यह विलंब से मिला, इसलिए अब अगले अंक में  छपेगा।काफी समझाने पर वह मान गईं, हालांकि अमृता प्रीतम से  'ज़िन्दगीनामा ' शब्द के इस्तेमाल को लेकर वह लंबी कानूनी लड़ाई में उलझी थीं। सोबती जी को आशंका यह थी कि यह अमृता प्रीतम ने रुकवाया है।उनकी इस आशंका का आधार पहले की कोई ऐसी घटना थी या उनका मन अमृता प्रीतम को लेकर अनावश्यक रूप से आशंकित रहने लगा था,इसकी जानकारी मुझे नहीं। जहां तक मेरा सवाल है,अमृता जी से न जीवन में कभी मुलाकात हुई, न उन्हें कभी कहीं देखा था। कभी इच्छा भी पैदा नहीं हुई,उनसे मिलने की।सच कहूं तो उनका भावातिरेकी लेखन मुझे पसंद नहीं था।वैसे अमृता जी के पास ऐसा जासूसी तंत्र रहा नहीं होगा कि कृष्णा सोबती कहां-कहां छप रही हैं,यह पता करके उसे रुकवा सके।कोई विशुद्ध लेखक कितना भी  नामी हो, इतना ताकतवर भी नहीं हो सकता कि हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के मालिक या संपादक उनके कहने पर चले! अमृता जी का नाम  बड़ा था मगर थीं तो वह भी कुल मिलाकर एक लेखक हीं! यह बात सोबती जी को समझाई-बताई भी। अमृता जी के साथ उनके लंबा- खर्चीले मुकद्दमा लड़ने से पैदा हुई थकावट और खीज इसका कारण रही होगी।

खैर उस समय तो वह मान गईं।मैं उस रात चैन की नींद सोया।सुबह फिर उनका फोन आया, नहीं, वह अब नहीं छपेगा।उन्हें फिर से समझाना व्यर्थ साबित हुआ।दुख तो बहुत हुआ मगर मैं बेबस था। वापस भेजना पड़ा।

दूसरा वाकया तब हुआ,जब मैं 'शुक्रवार ' का संपादक था।मेरे पास एक फ्रीलांसर यह सुझाव लेकर आए कि वह लेखकों से बात कर एक सीरीज लिखना चाहेंगे कि इन दिनों वे क्या लिख -पढ़ रहे हैं।मैंने कहा, बढ़िया आइडिया है,लिखिए लेकिन हमारे एक पेज से अधिक लंबा नहीं, चूँकि यह बुनियादी रूप से राजनीतिक -सामाजिक पत्रिका है। शीर्षक और फोटो के बाद हीकरीब आठ सौ शब्दों की गुंजाइश बचती है।वे लाए थे- एक- दो लिखकर कुछ लेखकों के बारे में। मैंने कहा कि पहले दो- तीन वरिष्ठ लेखकों से बात करके लाइए,फिर हम इन्हें भी छापेंगे।

उन्होंने सोबती जी से संपर्क किया,वह राजी हो गईंं।बहुत से लोग जानते हैं कि सोबती जी साक्षात्कारकर्ता पर कुछ नहीं छोड़ती थीं। लिखित सवालों के जवाब फुलस्केप कागज पर बड़े - बड़े अक्षरों में खुद लिख कर देती थीं।उन्होंने लिखा,जो ' शुक्रवार ' के तीन पेज से कम में न था। मैंने उनसे कहा कि बंधु, इतना लंबा छापना मुश्किल होगा।सोबती जी के पास फिर जाइए, शायद वे इसे छोटा कर सकें।वैसे भी मुझे वह कुछ उलझा हुआ सा लगा था।वे हाँ करके तो गए मगर मेरे कक्ष से निकल कर वहीं सहयोगी महिला पत्रिका ' बिंदिया' पत्रिका की संपादक को वह आलेख दे आए। उन्होंने इसे पूरा छापना स्वीकार कर लिया और छाप भी दिया।वह अंक जब सोबती जी के पास पहुँचा तो उन्होंने मुझे फोन किया। वह आगबबूला हो गईं कि मैंने तुम्हारी पत्रिका के लिए दिया था, ' बिंदिया '  पत्रिका को तुमने कैसे दे दिया? यह तुमसे किसने कहा था? मैंने सफाई दी कि सोबती जी, इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है, स्वयं मुझे छपने ही पर पता चला है लेकिन वह विश्वास करें,तब न !

वैसे यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि 'कादम्बिनी'  में हमने एक स्तंभ ' कथा प्रतिमान' शुरू किया था, जिसमें हम हिन्दी के श्रेष्ठ कथाकारों से उनकी अपनी पसंद की देशी-विदेशी कहानी का चयन करने का आग्रह करते थे।उनसे कहते थे कि आपने उस कहानी का चयन क्यों किया, इस पर एक टिप्पणी  लिखें।शर्त एक थी कि वह कहानी हिंदी में उपलब्ध होना चाहिए। हम वह कहानी तथा चयनकर्ता की उस पर टिप्पणी प्रकाशित करते थे।इस स्तंभ के लिए कृष्णा जी ने चन्द्रधर शर्मा की कालजयी कहानी ' उसने कहा था ' का चयन किया और उस पर टिप्पणी लिखी मगर यह संस्मरण वाले उस अप्रिय प्रसंग से पहले की बात है।इस स्तंभ के लिए उनके अलावा विष्णु प्रभाकर, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, अमरकांत, श्रीलाल शुक्ल, शेखर जोशी, विद्यासागर नौटियाल, विजयदान देथा आदि ने भी एक-एक कहानी का चयन किया था और टिप्पणी लिखी थी। 2007 में इस चयन को पुस्तकाकार रूप में राजकमल प्रकाशन ने ' बोलता लिहाफ ' शीर्षक से प्रकाशित भी किया था।

सोबती जी के साथ आई खटास कभी लंबी नहीं चली।पता नहीं कैसे और कब मिठास फिर से लौट आती थी। इसकी पहल वे अकसर करतीं।उनसे मिलना होता रहा।उन्होंने राजकमल प्रकाशन से  'जनसत्ता ' में प्रकाशित  आलेखों की दो पुस्तिकाएँ  छपवाने से पहले उनके संपादन का दायित्व एक - एक कर मुझे सौंपा।मैंने यह काम स्वीकार तो कर लिया मगर बेहद डरते- डरते!बहुत जरूरी होने पर ही कहीं कलम चलाई, ताकि फिर से हमारे-उनके बीच कोई गलतफहमी पैदा न हो जाए ।बाद में एक बार मिलने पर उन्होंने किसी संदर्भ में कहा कि मैं जिसे संपादन का दायित्व देती हूँ,  उसे पूरी स्वतंत्रता देती हूँ।मैं मन ही मन बहुत पछताया मगर मैंने उन्हें नहीं बताया कि मैं तब कितना डरा हुआ था।

एक बार 'हंस' में विश्वनाथन त्रिपाठी और मेरी बातचीत छपी।उसके बाद इससे खुश होकर मगर ऐसा कहे बगैर उन्होंने मेरे घर दो टेबल लैंप भिजवाए।एक मेरे लिए, एक त्रिपाठी जी के लिए।बिस्तर पर अधलेटा होकर देर रात को उसी की रोशनी में कई बार लिखता - पढ़ता रहता हूँ और वे याद आती रहती हैं।

(संभावना प्रकाशन से प्रकाशित साहित्यिक संस्मरणों की पुस्तक ' राह उनकी एक थी '  से एक अंश)

-विष्णु नागर की स्मृति से


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रविवार, 2 जुलाई 2023

कृष्णा सोबती जी की सहृदयता

 कृष्णा सोबती की बात हो रही है तो मुझे एक प्रसंग याद  आया । दो दशक पहले मैं मराठवाडा विश्वविद्यालय , औरंगाबाद की एक छात्रा का पीएच. डी मौखिकी (viva- voce ) के लिए गयी थी  । विषय कृष्णा सोबती जी के उपन्यासों के संदर्भ में था  । मौखिकी हो गयी  । मैं छात्रा के काम से प्रभावित हुई थी । भोजन भी हो गया था  । मैं गेस्ट हाउस जाने ही वाली थी , वह छात्रा भागती मोबाइल लेकर आयी । उसने मोबाइल को हथेली में दबा कर रखा और कहा कि कृष्णा सोबती जी मुझसे बात करना चाहती हैं  । मैं ने मोबाइल लिया और उन से बात करने लगी  । उन्होंने छात्रा के शोधकार्य के बारे में पूछा और लगातार उन की उत्सुकता को महसूस कर रही थी  । उन्होंने मेरेी प्रश्नावली के बारे में पूछा । वे खुश थीं - छात्रा की मौखिकी के बारे में मेरे विचार जान कर । उन्होंने कहा कि छात्रा लगातार उनके साथ अपने विषय के बारे में चर्चा करती थी   मौखिकी के बाद भी फ़ोन किया तो  मुझ (परीक्षक ) से बात करने का मन हुआ । उस के बाद मेरे बारे में भी जानना चाहा  । बात हो कर इतना समय हो गया  । फिर शब्दशः याद है  । किसी विश्वविद्यालय की छात्रा को उन्होंने समय दिया , दिशा निर्देश दिया साथ ही इतना ममत्व दिया । उस दिन शोध छात्रा अभिभूत थी  । शोध कार्य के दौरान उन के साथ वार्तालाप को साझा कर रही थी  । ऐसा नहीं था कि  उन पर पहला शोध था  । दर्जनों शोधकार्य  तब तक हो चुके थे  । फिर भी उस छात्रा के प्रति कृष्णा सोबती जी का वात्सल्य के बारे में  सुन कर उनके गरिमामय व्यक्तित्व का आभास हुआ  था  । व्यक्तिगत परिचय हमारे लिए नामुमकिन है  । इस तरह अद्भुत क्षणों के साथ साहित्यकारों को जानने अवसर मिलता है ।  इस से युवाओं को महान् व्यक्तित्व के पास जाने का साहस मिलता है । 

 - प्रो. माणिक्यम्बा "मणि" की स्मृति से


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बुधवार, 21 जून 2023

शब्दों की आत्मा से साक्षात्कार (कृष्णा सोबती)


बात उन दिनों की है जब मैं दिल्ली में कृष्णा सोबती जी से मिली थी। उनसे मिलना एक आत्मीयता में बंध जाना था। वे पूछ रही थीं-" क्या लिख रही हो आजकल?" मन हुआ कहूं ,पीछे छूट गए रास्तों को ढूंढ रही हूं ।

अतीत ही तो है जो परछाई की तरह पीछा करता है। जब उस अतीत को याद कर कलम उठाती हूँ तो कभी मित्रो, कभी बालो ,कभी जया ,कभी रतिका...... उनकी रचनाओं के पात्र मेरे मन को  झंझोड़ते रहते हैं।

उनका उपन्यास "मित्रो मरजानी" एक ऐसा उपन्यास है जिसने प्रकाशित होते ही कई सवाल खड़े कर दिए ।नायिका मित्रो ने एक विवादास्पद नारी चरित्र की तरह हिंदी साहित्य में प्रवेश किया कि पूरे शिक्षित समाज में इसके प्रति एक जिज्ञासा जागृत हो गई ।यह न टैगोर की ओस जैसी नारी थी न शरतचन्द्र या जैनेंद्र कुमार की विद्रोहिणी नारी ।इसे आदर्श का कोई मोह न था ।न समाज का भय न ईश्वर का ।इसीलिए मित्रो हमें चौकाती है, डराती है क्योंकि वह खुलकर वह सब कहती है जिसे आम और खास लड़कियां कहते डरती हैं।

"सूरजमुखी अंधेरे के "उपन्यास एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसके फटे बचपन ने उसके सहज भोलेपन को असमय चाक कर दिया और उसके तन मन के गिर्द दुश्मनी की कटीली बाड़ खेंच दी। अंदर और बाहर की दोहरी लड़ाई लड़ती नायिका रत्ती का जीवन वृत्त चाहत और जीवट भरे संघर्ष का दस्तावेज है ।बचपन में रत्ती यानी  रतिका बलात्कार की शिकार होती है ।यह घटना एक गांठ की तरह उसके मन में जड़ जाती है। बड़ी होते-होते यह गांठ उसके भीतर चल रहे युद्ध में उसे कई मोर्चों पर तैनात कर देती है । पुरुष के प्रति वह हीन भावना से ग्रसित है।

वह पुरुष के द्वारा ही तो समाज में लांछित की गई ।शारीरिक अत्याचार के कटु अनुभव से गुजरी रतिका अपनी आंखों में दाम्पत्य जीवन की मधुर तस्वीर भी सँजोए  है ।वह मां बनने को भी आतुर है। रीमा के घर परिवार का भरापूरा ऊष्मा से भरा माहौल उसे बेचैन कर देता है ।आखिर वह भी तो एक स्त्री है। ये कामनाएं पालना स्वाभाविक ही है ।एक खास उम्र के बाद औरत इस अकेलेपन को महसूस करती है ।वह अकेलापन रतिका को भी परेशान करता है।

इन दोनों उपन्यासों का जिक्र करते हुए मैं कह सकती हूं कि उनकी लेखनी शब्दों की मानसिकता से नहीं खेलती शब्दों की आत्मा से साक्षात्कार करती चलती है और इसीलिए असीमित प्रभाव की सृष्टि करने में सक्षम है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी ।अपनी रचना यात्रा के दौरान उन्होंने लगभग हर मोड़ पर कोई न कोई सुखद विस्मय  दिया है। "डार से बिछुड़ी "से लेकर "सूरजमुखी अंधेरे के" तक एक से एक सधी कृतियाँ ।

"हम हशमत "के जीवंत आलेख और औपन्यासिक संरचना शिल्प का नया प्रतिमान "जिंदगीनामा।" जिंदगीनामा तक आते-आते उनकी रचना बगिया के अंकुरित बीज जमीन से सिर उठा विशाल वृक्ष बन गए हैं।

 विद्रोही तेवर, खुले आसमान में अपने परों को पसारने ,आंधियो  से लड़ने की ताकत रखने वाली उनकी कहानियों के महिला चरित्र आज समाज के सामने चुनौती हैं। जो घर की चौखट पार न कर सकने की मजबूरी को धता बता रहे हैं।

उनसे मेरी पहली और आखिरी मुलाकात में चाय पीते हुए वे कहती हैं -" तुम्हारा लेखन जैसे मेरी लेखनी का वारिस है। "

मैं कहती हूं -"कृष्णा दी, मैं हर बार अपनी लेखनी के जरिए आपके लेखन ही से तो रूबरू होती हूँ।" 

- संतोष श्रीवास्तव की स्मृति से


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