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हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



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रविवार, 14 अप्रैल 2024

हरिशंकर परसाई के साथ बीस बरस


समय चालीस वर्ष पूर्व से अधिक, स्थान-सफदरजंग अस्पताल की ऊपरी मंज़िल का एक वार्ड, जिसमें एक पलंग पर लेटे हुए श्री हरिशंकर परसाई को देखने मैं और प्रेम जनमेजय गए थे। कैसा था वह अप्रतिम क्षण जब पहली बार अपने आराध्य व्यंग्य गुरु से बातचीत करने का अवसर मिला था।

परसाई जी की एक टांग क्षतिग्रस्त थी, इलाज चल रहा था, पीड़ा केवल टांग में थी, उनके चेहरे पर उसका कोई भाव स्पष्ट नहीं था। उन्होंने उठने का यत्न करते हुए दो उदीयमान रचनाकारों का स्वागत किया जो व्यंग्य के क्षेत्र को धर्मक्षेत्र समझ उसमें कूद चुके थे। मेरे सेनानायक परसाई जी ही थे। उनकी कोई भी रचना, कहीं से भी उपलब्ध हो, मैं ढूंढ-ढूंढकर अवश्य पढ़ता था। मैं ही क्यों मेरे जैसे अनेक नव व्यंग्यकारों की शैली और लेखन-चेतन पर परसाई जी का गहरा प्रभाव पड़ा था।

वे अस्पताल में कई दिन रहे, उनसे मिलने के, बतियाने के, गुरुमंत्र लेने के अनेक मौके मिले। वे मानते थे कि 'व्यंग्य का क्षेत्र अभी रिक्त है, नई कहानी और नई कविता की जड़ें जम चुकी हैं, व्यंग्य को पूर्णतः अपना लेना चाहिए।' मेरे भीतर के रचनाकार ने यह बात पक्की गांठ बाँध ली थी।

जब कभी व्यंग्य तथा व्यंग्य से संबंधित विषयों पर प्रश्न उठते और समाधान न मिलते, हाथ अपने आप उठकर परसाई जी को पत्र लिख देता और आँखें दो दिन बाद से लैटर बाक्स में पावती ढूंढने लगतीं। तब मैं शाहदरा में रहता था, नेपियर टाउन, जबलपुर से उनका जवाब अवश्य आता था। वर्षों पूर्व व्यंग्य के लिए परिचर्चा का आयोजन करते हुए मैंने परसाई जी को पत्र लिखा था और पूछा था कि क्या वे व्यंग्य को एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा मानते हैं? उनका उत्तर देहावसान से ठीक बीस वर्ष पूर्व दस अगस्त उन्नीस सौ पिचहत्तर को मुझे मिला था जिसे आठ अगस्त को लिखा गया था। मुझे घोर अचरज हुआ कि जिस लेखक के कारण 'व्यंग्यकार' विशेषण सम्मानित हुआ, जिसने इसे शुद्र से ब्राह्मण बनाया, वह स्वयं इसे 'विधा' ही नहीं मानता। परसाई जी ने साफ़-साफ़ लिखा व्यंग्य स्पिरिट है। ... व्यंग्य विधा नहीं है। कारण यह है कि व्यंग्य का अपना कोई स्ट्रक्चर नहीं है। कहानी, नाटक, उपन्यास का स्ट्रक्चर है, व्यंग्य का नहीं है......।

मैं हतप्रभ था क्योंकि हम तो 'व्यंग्य' को गद्य की एक स्थापित विधा मनवाने पर तुले हुए थे और ठोस व्यंग्य का सबसे बड़ा लेखक हमारी नज़र में तब हरिशंकर परसाई ही थे।

परसाई जी के व्यंग्य की सबसे बड़ी ताक़त जो विरासत में अजातशत्रु, ज्ञान चतुर्वेदी, मुझे, जनमेजय, सुरेश कांत तथा कतिपय अन्य हमारी पीढ़ी के व्यंग्यकारों को मिली, वह है - व्यंग्य की परिणति का करुणा में होना, यही त्रासदी ही सार्थक व्यंग्य है, शैली के स्तर पर बदलाव हो सकते हैं। मेरा सौभाग्य कि मुझे परसाई जी से कथात्मकता की किस्सागोई का शैली भी मिली, भले ही बातचीत में उनकी यह शैली नज़र नहीं आती थी।

उन्नीस सौ अठत्तर में जबलपुर जाने का मौका हाथ लगा। युवा व्यंग्यकार रमेश शर्मा 'निशिकर' के बंगले में सपरिवार ठहरना हुा। भाई 'निशिकर' ने एक व्यंग्य-गोष्ठी परसाई जी की अध्यक्षता में मेरे रचना पाठ पर आयोजित की। अनेक साहित्यकार और व्यंग्य-प्रेमी उपस्थित हुए किंतु परसाई जी को वहाँ न पाकर निराशा के उत्सव में मेरे साथ शामिल हुए। गोष्ठी समाप्ति के बाद हम लोग परसाई जी के निवास पर गए। वे अस्वस्थ थे, लेटे थे, हमें देख हाथ जोड़ क्षमा मांगने लगे कि 'किसी ने जाने न दिया, तबियत ख़राब हो गई....।'

मैं उनकी शालीनता और भद्रता देख विह्वल हो उठा। एक वटवृक्ष का घासफूस के आगे नत् देख मैंने उनके चरण पकड़ लिए और आशीर्वाद की मांग की। वे बोले, एक व्यंग्य रचना सुनाओ और आशीर्वाद मिलेगा। मैंने अपनी एक प्रिय रचना 'बुढ़िया, सराय रोहिल्ला और विक्रमार्क' डरते-डरते सुनाई। उन्होंने सराहना की तथा ढेरों आशीर्वाद दिए, कहा, 'गोष्ठी मेरे घर होनी चाहिए थी, घर उतना बड़ा नहीं है पर मन भी तो देखना चाहिए था मगर निशिकर माने नहीं थे।'

परसाई जी दैहिक रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद मानसिक रुग्णता के शिकार न हुए। जिस विचारधारा पर उनकी सोच टिकी हुई थी उसे कभी विलग न हुए। मैंने पहली बार उन्हें पहले दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग पर स्थित प्यारेलाल भवन के प्रेक्षागृह में हो रही प्रोग्रेसिव गोष्ठी की कार्यवाही में हिस्सेदारी


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करते देखा था। मेरा आकर्षण वहाँ केवल वे ही थे। कुर्तुल-एन-हैदर वक्तव्य देकर

आई थीं, परसाई प्रतिक्रिया दे रहे थे। तभी एक लेखक ने अपने भाषण में धर्मवीर

भारती का नाम लेकर उन पर कीचड़ उछालना शुरू किया, मुझे बेहद खला। भारती

हमारे प्रिय थे क्योंकि हम लोग 'धर्मयुगीन' कहलाते थे .... कोई कुछ कहता न

कहता परसाई जी ने उठकर उन महाशय के कथन पर अपना विरोध दर्ज कराया कि

जो अनुपस्थित है तथा यहाँ अप्रासंगिक है उस पर ऐसी टिप्पणी देना शोभा नहीं देता

मेरी कीचड़ छंट गई, भारती जी पर मानों छीटें भी नहीं पड़े... मैं परसाई जी पर

मुग्ध हो उठा था, मुझे उनका शोभा मंडल नज़र आने लगा था। तब मैं सोचता था,

क्या कभी उनसे मिल पाऊँगा।

दिसंबर अठासी में कॉलेज का टूर लेकर पंचमढ़ी जाना हुआ, लौटते हुए मैंने

तथा सुरेश ऋतुपर्ण ने जबलपुर का कार्यक्रम बनाया तथा विद्यार्थियों की शंकाओं

को लेकर हम लोग परसाई जी के घर गए। परसाई जी बेहद प्रसन्न हुए, विद्यार्थियों

की शंकाओं का समुचित समाधान किया। हम सब उनके पलंग के चारों ओर बैठे,

खड़े या टिके थे, वे पलंग पर लेटे थे, तब वे बैठ नहीं पाते थे। उन्होंने वातावरण में

इतनी सहजता पैदा कर दी कि एक छात्रा परमजीत कौर ने उन्हें क्षीर सागर में शेष-

शैय्या पर लेटे विष्णु भगवान बताया। वे यह उपमा सुनकर खूब हँसे। एक छात्र गौतम

ने 'दलित साहित्य' पर उनसे इंटरव्यू लेना चाहा, वे लगभग बैठ गए यह उनके

भीतरी मन का प्रश्न था और दलित साहित्य पर धाराप्रवाह बोलने लगे

'पंचमढ़ी टूर' आज भी हमारे छात्रों की यादों की धरोहर है। वे जब भी मिलते हैं परसाई जी के घर की यात्रा की बरबस याद आती है, विशेषकर परसाई जी का आग्रह कर बिस्किट खिलाना तथा फ़ोटो खिंचवाना नहीं भूल पाता, उनका मेरे प्रति व्यंग्यात्मक कमेंट 'तुम अब ज्ञानपीठ मार्का हो' मैं भी भला कहाँ भुला सकता हूँ।

एक सहज इंसान थे परसाई जी जिनमें ममता और शालीनता कूट-कूट कर भरी हुई थी, जो उन्हें ठीक से नहीं जानते थे, उनके बारे में भ्रांतियाँ पाल लेते थे। मसलन एक टी.वी. प्रोड्यूसर जो परसाई जी की कृति 'रानी नागफनी' पर धारावाहिक बना चुके थे, उनके विषय में भ्रांत थे। जब सन् नब्बे में वे दूरदर्शन के लिए धारावाहिक प्रस्ताव बनवाने आए और मैंने तथा प्रेम जनमेजय ने उनके समक्ष तेरह व्यंग्यकारों की तेरह रचनाओं पर आधारित एक धारावाहिक बनाने का विचार


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दिया, वे ख़ुश हुए, लेकिन परसाई जी का पहला नाम सुनते ही कि पायलेट एपिसोड

उनकी कृति पर हो, वे कहने लगे, 'परसाई जी डिफिकल्ट हैं, वे बड़ी शर्तें रखेंगे,

उनसे आप ही स्वीकृति मंगवाओ। लेकिन मैं उन्हें उतना पैसा नहीं दे पाऊँगा, जितना

वे मांगेंगे, आप ही निपटें .... आदि आदि ....

परसाई जी ने हमें लौटती डाक से ही स्वीकृति भेज दी तथा किसी भी

रचना को लेने तक की हामी भरी, पैसे की बात तो पत्र में कहीं थी ही नहीं। पत्र

देखकर प्रोड्यूसर विंग कमांडर दास विस्मय से भर उठे, बोले, 'दरअसल परसाई जी

से मैंने कभी डाइरेक्ट डील नहीं किया था, इसलिए गलतफहमी हुई।'

सन् तिरानवे में भी हमने परसाई जी से किसी रचना के प्रकाशन की अनुमति मांगी थी जो जगमोहन चोपड़ा की 'बहरहाल' योजना के अधीन थी, अनुमति तुरंत व बिना शर्त ही मिली। हमें उनका आशीर्वाद ही नहीं, प्यार ही नहीं, दुलार भी मिला। वे गोष्ठियों में नहीं जा पाते थे। जब से एक राजनैतिक दल के कार्यकर्ताओं ने उन पर शारीरिक प्रहार किए थे, तब से ही वे स्वस्थ नहीं हो पाए किंतु मानसिक शक्ति उनकी प्रबल रही जिसका उदाहरण है उनके द्वारा निरंतर लिखा जाने वाला धारदार व्यंग्य।

आज वह हिंदी व्यंग्य का स्तंभ शरीर से नहीं दिखाई देता किंतु हमारे हिंदी व्यंग्य साहित्य पर आज भी उनका मस्तिष्क राज कर रहा है, कुछ नहीं छोड़ा उन्होंने, सब पर प्रहार किया, हम लोग उनसे आगे जाने की बात दूर, उनके पासंग तक फटक भी कहाँ पा रहे हैं।

हरीश नवल की स्मृति से 

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सोमवार, 25 दिसंबर 2023

कैसे मिले अज्ञेय ....

 बात उन दिनों की है जब मैं ‘इंडिया टुडे’ (हिंदी) में साहित्य, कला आदि देखता था। हमारे संपादक थे श्री प्रभु चावला।  उनके निर्देशानुसार मुझे ‘इंडिया टुडे’ के साहित्यिक विशेषांक के लिए कोई अच्छी सी योजना बनानी थी। मैंने अपने एक सहायक श्री चितरंजन खेतान के साथ यह योजना बनाई कि कुछ साहित्यकारों, प्रकाशकों और पाठकों से पूछना है कि उन्हें इस वर्ष कौन-सी पुस्तकें पढ़ी और क्यों? हमने तय किया कि यह प्रश्न किसी को बताया नहीं जायेगा, इसे तभी पूछा जायेगा जब हम साहित्यकार/प्रकाशक/पाठक से मिलेंगे।

मैंने और चितरंन ने यह प्रश्न पूछने के लिए जिनको चुना, उनमें अज्ञेय का नाम सर्वोपरि था। मैंने श्री अज्ञेय से फोन पर उनसे मिलने का समय लिया। जो समय उन्होंने दिया उस दिन वे किसी आवश्यक बैठक की वजह से मिल नहीं पाये और ऐसा तीन बार हुआ।

मुझे और चितरंजन को रोज ही किसी न किसी से इस हेतु मिलना होता था। एक दोपहर कहीं जाने से पहले मैंने संपादन विभाग के एक पत्रकार को कहा कि वे हमारे लौटने से पूर्व श्री अज्ञेय मेरे लिये समय ले लें और मैंने उन्हें अज्ञेय जी का व्यक्तिगत फोन नम्बर दे दिया।

जब मैं किसी प्रकाशक से मिलकर वापिस दफ़्तर में आया, इससे पहले कि मैं उन पत्रकार से अज्ञेय जी के विषय में पूछता, उन्होंने बहुत खीझे स्वर में कहा, ‘‘सर मैंने आपके दिये नम्बर पर अज्ञेय जी को कई बार फोन किया लेकिन वे नहीं मिले। हर बार जो व्यक्ति फोन उठाता था वह यही कहता कि अज्ञेय तो नहीं हैं, मैं वात्सयायन बोल रहा हूँ मुझसे अगर नवल जी मिलना चाहें तो स्वागत है। मैं हर बार अज्ञेय जी को पूछता और हर बार वही व्यक्ति कहता रहा कि, ‘‘अज्ञेय नहीं हैं मैं वात्सयायन हूँ मुझसे अगर  ‘इंडिया टुडे’ का काम बनता हो तो मैं हाज़िर हूँ, मैं भी एक साहित्यकार और पत्रकार हूँ।’’

मैंने बड़ी हैरत से अपने आवेश को दबाते हुए पूछा, ‘‘क्या तुम्हें मालूम नहीं कि वात्सयायन और अज्ञेय एक ही हैं?’’ इस पर वह बहुत लज्जित हुआ और माफी मांगने लगा। मैंने कहा, ‘‘माफी अज्ञेय जी से मांगिए, जिस पर उसका निवेदन था कि ‘‘मैं उनसे अब बात न हीं कर पाऊँगा। अब आप ही उनसे बात कीजिये।’’

मैंने अज्ञेय जी को तभी फोन किया और उनसे बहुत क्षमा मांगी। इस पर हँसते हुए उन्होंने कहा, ‘‘आज मेरा भ्रम टूट गया कि मेरा पूरा नाम सभी हिंदी के साहित्यकार और पत्रकार जानते होंगे।’’

अज्ञेय जी की विनोद प्रियता का यह एक विशिष्ट उदाहरण था। आप जानना चाहते होंगे कि अज्ञेय या वात्सयायन से फिर मैं कब मिला?

अज्ञेय जी अपने पिता की स्मृति में एक व्याख्यान-माला आयोजित करते थे, उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अमुक दिन चार बजे उनसे मिलने साहित्य अकादमी के सभा कक्ष में आ जाऊँ, कार्यक्रम पाँच बजे आरंभ होगा तब तक हमारी बातचीत हो जाएगी।

मैं चार बजे पहुँच गया लेकिन अज्ञेय जी के चाहने वाले उस समय भी व्याख्यान होने से पूर्व अज्ञेय जी को मिलने वहाँ पहुँच कर उन्हें घेरे हुए थे। मैं प्रश्नसूचक भाव से उन्हें देखता रहा और वे मुझे चाय पीने का संकेत करते रहे। कार्यक्रम से पहले चाय का आयोजन होता था, वे मुझसे मिल पाते उससे पहले बहुत से श्रोता चाय पान के लिए आते रहे।

मन मारकर मैं हाथ में चाय का प्याला लिए अज्ञेय जी को निहारता रहा। अचानक वे सबको छोड़कर मेरे पास आये और हाथ पकड़कर बाहर की ओर ले चले। चलते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘कितना समय लगेगा’’ मैंने उत्तर दिया ‘‘जी केवल एक सवाल पूछना है, लेकिन यहाँ बाहर भी लोग खड़े है आपको देखकर आपकी ओर आ रहे हैं’’, वे बोले, ‘‘लिफ्ट  में चलो।’’

मैं उनके साथ लिफ्ट में चला गया। उन्होंने कहा ‘‘पूछो अब कोई नहीं आएगा।’’ चलती लिफ्ट में मैंने सवाल पूछा। लिफ्ट ऊपर दूसरे फ्लोर तक पहुँची, सभा फर्स्ट फ्लोर पर थी, उससे ऊपर तक कम ही लोग आते-जाते थे। ऊपर पहुँचकर अज्ञेय जी ने लिफ्ट रुकने पर उसका दरवाज़ा खोल दिया। तब तक लिफ्ट रुकी रहती जब तक दरवाज़ा न बंद होता। अज्ञेय जी ने खड़ी लिफ्ट में मेरे प्रश्न का उत्तर दिया। अपनी उस वर्ष पढ़ी गई पुस्तकों का नाम बताया और उन पर उनकी तथा उनके रचनाकारों पर बात की और उसके बाद दरवाज़ा बंद करके नीचे जाने के लिए बटन दबा दिया।

लिफ्ट से निकलते ही अज्ञेय जी को मिलने और देखने आए हुए श्रोता उमड़ पड़े। अज्ञेय जी ने मेरी पीठ पर हाथ रख विदा लेने का संकेत किया .... भूलेंगे नहीं खड़ी लिफ्ट के वे पाँच-सात मिनट और भूलेंगी नहीं कभी वात्सयायन जी की अज्ञेयता ......

-डॉ. हरीश नवल की स्मृति से



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गुरुवार, 4 मई 2023

नाटक का राजहंस मोहन राकेश

मोहन राकेश एक अप्रतिम साहित्यकार थे जिन्हें 'नई कहानी' आंदोलन का प्रणेता भी कहा जाता है और 'आधुनिक नाटक का मसीहा' भी। मेरा सौभाग्य कि मुझे उनका साथ और सहयोग मिला। उनके नाटकों का में प्रथम शोधार्थी था। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. लिट्. की उपाधि हेतु मुझे उनके नाटकों पर शोध का विषय आसानी से नहीं मिला। बात 1970 की है, एम.ए. के परीक्षाफल के आधार पर प्रथम तीस विद्यार्थियों को दो वर्षीय एम. लिट्. में प्रवेश प्राप्त होता था। इन तीस में से उस वर्ष में भी एक था। विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोध विषय आबंटन हेतु चयन समिति की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता 31. नगेन्द्र कर रहे थे। सदस्यों में डॉ. विजयेन्द्र स्नातक, डॉ० सावित्री सिन्हा, डॉ. दशरथ ओझा और डॉ. उदयभानु सिंह भी थे। ये सभी हिंदी के जाने-माने विद्वान् थे और एम.ए. में हमारे शिक्षक भी।

मेरा क्रम आया, मेैं तनिक घबराहट के साथ भीतर गया, डॉ० नगेन्द्र ने मुझसे पूछा कि मैं किस विधा पर विषय चाहता हूँ। मैंने उत्तर दिया, 'नाटक पर'। डॉ० नगेन्द्र ने। पूछा कि क्या मैंने कोई विषय सोचा है। जैसे ही मैंने उत्तर दिया, 'मोहन राकेश के नाटकों का विवेचन', वे भड़क उठे, 'मोहन राकेश के नाटक? नहीं नहीं इस पर नहीं हो सकता। प्रसाद पर ले लो भारतेंदु पर ले लो। मोहन राकेश पर क्यों लेना चाहते हो वो तो अभी नए हैं!" मैंने विनम्रतापूर्वक कहा, 'श्रीमन्! वे आज के सर्वश्रेष्ठ नाटककार माने जाते हैं उनके नाटकों ने हमारी पीढ़ी को बहुत प्रभावित किया है।"

डॉ. नगेन्द्र को मेरा उत्तर उपयुक्त नहीं लगा। उनके सामने विद्यार्थी तो क्या अध्यापक भी अपनी असहमति व्यक्त नहीं कर पाते थे। नगेन्द्र जी ने कहा, 'मोहन राकेश ने अभी लिखे ही कितने नाटक हैं?" मेरे मुख से फूट पड़ा, जी जितने कालिदास ने।' डॉ. नगेन्द्र को इस उत्तर की अपेक्षा नहीं थी। सावित्री सिन्हा जी ने स्थिति को अनुकूल बनाते हुए बड़े प्रेम से कहा, हरीश, डॉ. साहब ठीक कह रहे हैं तुम भारतेंदु या प्रसाद पर विषय ले लो" मैंने निवेदन किया, श्रीमन मोहन राकेश के नाटक उनसे आगे की सोच के नाटक हैं, मुझे उन पर ही विषय दे दीजिए। डॉ. सावित्री सिन्हा ने नगेन्द्र जी की ओर देखा। नगेन्द्र जी बोले, 'देखो, मोहन राकेश अभी युवा लेखक हैं और वैसे भी हम प्रायः जीवित साहित्यकारों पर शोध नहीं करवाते।'

उनका कथन मुझे तीर सा चुभा, मैं खड़ा हो गया और यह कहकर कि, 'मैं फिर उनपर उनके बाद ही शोध करूंगा', कक्ष से बाहर निकल गया। मैं रुआंसा हो गया था और कला संकाय के उत्तरी कॉरीडोर में जाकर मुंडेर पर बैठ गया। चिंतन करने लगा कि मैंने ठीक किया या ग़लत। मुझे लगने लगा कि मैंने ग़लत ही किया, प्राध्यापक पद पाने के लिए एम. लिट्. करना आवश्यक है भले ही शोध का विषय कोई भी हो। मैं यह सोच-सोच भी दुखी होने लगा कि डॉ. नगेन्द्र जैसे सम्मानित और समर्थ विद्वान् गुरु की अवहेलना मैंने कर दी है, इससे मेरा करियर प्रभावित हो सकता है। मुझे पछतावा होने लगा था कि मुझे ऐसा करके अशालीन नहीं होना चाहिए था। मुझे अपने सपने टूटते नज़र आने लगा मुझे लगा कि अब बात बिगड़ गई है, ठीक न हो सकेगी क्योंकि मैंने अभद्रता की। मुझे वॉकआउट नहीं करना चाहिए था....

मैं अभी चिंता निमग्न ही था कि वहाँ हिंदी विभाग का सेवा कर्मचारी ईश्वर चंद आया और मुझसे बोला, 'तुम्हें नगेन्द्र जी बुला रहे हैं।' उसका आना उस समय मुझे सच में सर्वशक्तिमान ईश्वर का आना ही लगा। मैं उसके साथ चल पड़ा और निश्चय कर लिया कि. जो भी जैसा भी विषय मिलेगा वह स्वीकार कर लूंगा।

मैं सिर झुकाए कक्ष में प्रवेश कर गया और डॉ. नगेन्द्र जी की वाणी मेरे कानों में गूंजी, ‘यह कोई तरीका है, चलो जो विषय बोलोगे समिति दे देगी।' इस प्रकार मुझे सौभाग्य मिला कि में मोहन राकेश पर शोध करने वाला प्रथम शोधार्थी बन सका।

मोहन राकेश जी तक यह बात पहुँच गई। मैं जब अपने शोध के सिलसिले में उनसे मिला तब उन्होंने बताया कि उन्हें डॉ. दशरथ ओझा जी ने पूरी घटना बताई थी। इस घटना के कारण भी वे मुझे अपने करीब पाते थे। शोध के सिलसिले में अब मेरा उनसे मिलना अक्सर होने लगा। मैं उनके नाटकों से संबंधित जिज्ञासाओं का ढेर उनके पास लेकर जाता और वे जब उनका शमन करने लगते थे तो प्रायः एक-आध सवालों का जवाब देने में एक- दो घंटे निकल जाते। वे उन पात्रों में खो जाते जिनकी नाट्य सृष्टि उन्होंने ही की थी। वे मल्लिका के बारे में, सावित्री के विषय और सुंदरी के बारे में बताते-बताते भावुक हो जाते।। भावावेश में कही गई उनकी बातों का बहुत सारा प्रतिशत मेरे पल्ले तक नहीं पड़ता था। एक शाम तो हद हो गई. हम रिवोली सिनेमा हॉल की रेस्तरां में बैठे थे। फिल्म चल रही थी। 

इसलिए रेस्तरां में उस समय केवल हम दोनों ही वहाँ थे। मोहन राकेश जी कुछ बताते बताते कहीं खो गए और फिर अत्यंत भावुक होकर कहने लगे, 'मैं ही हूँ, महेन्द्रनाथ, बार-बार घिसा जाने वाला रबर का टुकड़ा में ही हूँ। नंद भी मैं ही हूँ मातुल भी में ही और कालिदास भी और जाने क्या हिंदी में बोलते-बोलते वे अँग्रेज़ी में बोलने लगे। मुझे यह लग रहा था कि वे रो न पड़े। इसके विपरीत जब वे पंजाबी में कभी कोई जालंधर या अमृतसर की घटना सुनाते अथवा मेरी कोई बात उन्हें विनोदप्रिय लगती, वे बहुत ज़ोर से खुलकर हँसते बल्कि ठहाका लगाते। उनका ठहाका दीवार की सफेदी का चूना गिरा सकता था।

मैं सोच-सोचकर बहुत खुश होता था कि मेरी कुछ बातें उनसे मिलती हैं। मेरा जन्म भी आठ जनवरी को हुआ, पंजाब में ही हुआ, मुझे भी अपनी माँ से अतिशय प्रेम था और मुझे भी दोस्तों के साथ महफिल जुटाने में बहुत आनंद आता है। मैंने सिवाय जन्मदिन के मिलान के बॉकी बातें उनसे साझा नहीं कीं। मोटे चश्मे के पीछे चमकती उनकी आँखें कुछ कह जाती थीं। बहुत उन दिनों उनका नाटक 'आधे-अधूरे' एक युग प्रवर्तक नाटक के रूप में हिंदी साहित्य और हिंदी रंगमंच का सर्वाधिक चर्चित नाटक हो रहा था। मेरे नाट्य शिक्षकों में डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल जैसे प्रख्यात नाटककार भी थे जो मुझसे यदा-कदा उलाहने के स्वर में पूछ चुके थे कि मैं उनके नाटकों की तुलना में, जिनकी संख्या मोहन राकेश के नाटकों से अधिक है, राकेश के नाटकों को क्यों अधिक महत्त्व देता है। इस पर मैंने उन्हें जो बताया वह में राकेश जी को बताकर अच्छा समीक्षक होने का तमगा पा चुका था। मैंने अपनी सीमित बुद्धि से आकलन करते हुए पाया था कि डॉ. लाल यद्यपि अच्छा नाटक लिखते हैं और लिखने से पूर्व योजना बना लेते हैं कि किस शैली या शिल्प और किस प्रकार के मंच के लिए लिखना है। वे चरित्रों को अपने नियंत्रण में अनुशासित करते हैं। जबकि मोहन राकेश कोई बड़ी योजना नहीं बनाते चरित्र सृष्टि के विषय में सोचते हैं और वे चरित्रों को अपने बंधन में नहीं रखते, उनके नाटक उनके चरित्रों के अनुसार गतिवान होते हैं इसलिए वे चाहकर भी पुरुष चरित्रों को स्त्री चरित्रों से अधिक प्रभावी नहीं बना पाए।

- अच्छे समीक्षक का तमगा मिलने से मेरा उत्साहवर्धन हुआ था और में मोहन राकेश के साथ उनकी आली पकड़कर उनके चरित्रों को समझने की कोशिश करता रहा।

सितंबर 1971 में मेरा चयन दिल्ली विश्वविद्यालय के शिवाजी कॉलेज में हुआ। तब मुझे एम. लिट्. करते हुए एक वर्ष हुआ था. प्रीवियस की परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त हुए थे। मैंने राकेश जी को अपने लेक्चर नियुक्त होने की खबर दी। वे बहुत खुश हुए और मुझे पंजाबी में शाबाशी देते हुए कहने लगे, 'हमारा हरीश प्रोफेसर हो गया। अभी तो इसने सिर्फ़ 'मोहन' पढ़ा है जब 'राकेश' पढ़ लेगा तो पता नहीं क्या बनेगा?" उनका संकेत एम. लिट. फाइनल उत्तीर्ण करने का था। फाइनल में ही लघु शोध प्रबंध विभाग में जमा कराना था।

एक दिन मोहन राकेश जी का हमारे घर, शाहदरा में फोन आया। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं चाँदनी चौक जाऊँगा? उन्हें ज्ञात था कि मैं अक्सर अपने दोस्तों के साथ दरीबा चाँदनी चौक में, जहाँ हम पहले रहा करते थे, जाता हूँ। मैंने कहा, 'हाँ बताइये क्या करना है।' वे बोले, 'तुम्हें पार्टी देनी है, तुम प्रोफ़ेसर बन गए हो न!' मुझे थोड़ा संकोच हुआ मैंने कहा, "ऐसा क्या?" उन्होंने कहा, 'हाँ पार्टी देनी है उसके लिए चाँदनी चौक से दरीबा कलां के जलेबी और समोसे ले आना' मैंने कहा, 'अच्छा जी, कितनी ले लूँ? उन्होंने कहा, पार्टी है सोच-समझकर ले आना।"

मैंने दादा जी और बीजी को बताया कि आज मुझे मोहन राकेश जी पार्टी दे रहे हैं। दोनों खुश हुए। बीजी ने हिदायत दी कि ज़रा अच्छे कपड़े पहनकर जाना और जलेबी समोसे रखने के लिए थैला जरूर ले जाना। तब मेरे पास कोई वाहन नहीं था, शाहदरा से चाँदनी चौक तक फोर-सीटर चलते थे जिन्हें फटफटिया कहा जाता था में फटाफट तैयार होकर फोर-सीटर से दरीबा पहुँचा और पार्टी का सोचकर मैंने अनुमान लगाया कि दस- बारह व्यक्ति तो जरूर होंगे। मैंने उसी हिसाब से समोसे और जलेबियाँ खरीद लिये और वहाँ से एक थ्री व्हीलर (तब उसे स्कूटर कहते थे) लेकर राकेश जी के घर पहुँच गया।

राकेश जी के यहाँ उनके मित्र (संभवतः) राजिन्दर पाल बैठे हुए थे। सिगार चल रही थी। मैंने थैला रखा। राकेश जी के पैर छुए और कहा कि आप मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं, अभी पार्टी में सब लोग आएंगे उशसे पहले ही अपना आशीर्वाद दे दीजिए। उन्होंने एक जोरदार ठहाका लगाया और कहा, 'लोग' जितने आने थे वो तो आ चुके। तू थैले भर के ले आया हम हफ्ता भर खाएँगे!' और फिर उनके ठहाके गूंजने लगे। उस पार्टी में उस दिन हम तीनों ने गला भर-भरकर जलेबी और समोसे खाए और तीन बार गिलास भर-भरकर चाय पी। हाँ उस दिन मैं भी उनके साथ ठहाके लगा सका और उनसे खुल सका, जिसका लाभ मुझे तब तक वे रहे मिलता रहा।

मैं शोध हेतु जो लिखता था. दरियागंज में राधाकृष्ण प्रकाशन के ऑफिस में अक्सर मोहन राकेश जी को दिखाता था। मोहन राकेश और राधाकृष्ण प्रकाशन के स्वामी ओमप्रकाश जी की गहरी मित्रता थी। मेरे परिवार का भी संबंध ओमप्रकाश जी के परिवार से था। उनकी पत्नी को में बुआ जी संबोधित करता था। मैंने बुआजी के ही घर में मोहन राकेश जी को पहले-पहल देखा था तब में हिंदू कॉलेज का विद्यार्थी था। कभी-कभी मैं और मेरे भाई हरेन्द्र जी बुआ जी को मिलने जाते थे। उनके बेटे अरविन्द के साथ मेरे भाई हरेन्द्र जी की अच्छी जमती थी। अरविन्द भाई कालांतर में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) के निदेशक भी रहे। राकेश जी ने ओमप्रकाश जी को मेरा लघु शोध-प्रबंध स्वीकृत होने के बाद उसे प्रकाशित करने को कहा था। वे मेरा लिखा पढ़ते नहीं, कहीं कहीं से सुनते थे और कहते थे कि यह डिग्री के लिए लिखा जा रहा है, जब प्रकाशित करना होगा, तब मैं पूरा पढ़ेगा और संपादन करूंगा। वे प्रोफेसरी कर चुके थे, उन्हें पूरा अंदाज़ा था कि शोध- प्रबंधों में कितना कुछ अनावश्यक लिखा जाता है जिसे वे 'पेज भराऊ' कहते थे। जब तक मेरा लघु शोध प्रबंध पूरा होता उससे पूर्व तीन जनवरी 1972 को सैंतालिस वर्ष की अल्पायु में मोहन राकेश का निधन हो गया।

वे नहीं रहे लेकिन उनका साहित्य, विशेष कर नाटक जिंदा रहेंगे। जिंदा रहेंगी उनकी यादें, उनकी बातें, उनके ठहाके । 'शब्द' की सार्थकता पर कार्य करने वाले राकेश जी के शब्दों से सार्थक हुआ उनका साहित्य सदा जिंदा रहेगा।

हरीश नवल की स्मृति से


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मोहन राकेश पर एक चर्चा

 बात 1999 की है। सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर ,हिमांशु जोशी और कई अन्य विशिष्ट साहित्यकारों के साथ मैं उपराष्ट्रपति भवन में तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री कृष्णकांतजी द्वारा नार्वे से प्रकाशित एक पत्रिका के लोकार्पण समारोह में था। हम अगली पंक्ति में बैठे थे।जबतक महामहिम नहीं पधारे थे, मेरे मन में आया क्यों न कमलेश्वर जी से मोहन राकेश एक के बारे में एक अनौपचारिक चर्चा कर कुछ जानकर हासिल की जाए। जिज्ञासावश कमलेश्वर के अखाड़े की एक कड़ी (मोहन राकेश) केन्द्र में रखकर चर्चा की शुरुआत की तो कमलेश्वर जी कहने लगे, छठें- सातवें  दशक में राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और मेरी 'तिक्कड़ी' थी। पत्र-पत्रिकाओं में हमारे कहानियां/लेख छपती थीं, हम बड़ी बेबाकी से एक-दूसरे की समीक्षा करते थे। 

हमारी टीका-टिप्पणियां सकारात्मक-नकारात्मक--दोनों प्रकार की होती थीं। हम आजकल की तरह नकार की दशा में भी बुरा नहीं मारते थे। बल्कि नकारात्मक टीमें प्रबुद्ध लोग और भी ध्यान से पढ़ते थे, चर्चा  करते थे। इससे एक विशेष  लाभ हुआ कि हम जल्द ही केन्द्र में आ गए। एक लेख जो 'सारिका' में छपा था पढ़कर मोहन राकेश ने थोड़ा तल्ख शब्दों में  कहा, कभी  कुछ अधिक  लिखा  करो। इस पर यादव ने मुस्कुराते हुए कटाक्ष  किया- ये कम+लेश्वर (कमलेश्वर) हैं।इनका कम लिखा ही अधिक समझो। फिर हम तीनों खिलखिलाकर हँस पड़े।

राजेंद्र यादव के सम्बन्ध में उन्होंने बताया कि मोहन राकेश के नाम को उन्होंने ही प्रतिष्ठित किया। मोहन राकेश का मूल नाम था मदन मोहन गुगलानी। उनके पिता करमचंद गुगलानी पेशे से वकील थे। साहित्य और संगीत में उनकी विशेष  दिलचस्पी थी। मोहन राकेश के प्रारम्भिक लेखन पर उनका प्रभाव  परिलक्षित होता है। राजेंद्र यादव ने कहा था कि उनके पिता के 'चन्द' को राकेश बदलकर "मोहन राकेश"  नाम दे दिया। इस बात को जब मोहन राकेश ने कमलेश्वर से कहा तो वह हंसते हुए  बोल पड़े--राजेन्द्र को कौन काट सकता है!

मोहन राकेश लम्बा जीवन नहीं पाए। कुल 47 साल। इस अल्पावधि में उन्होंने तीन नाटक--आषाढ़ का एक दिन, 'लहरों  का राजहंस' और आधे- अधूरे। अंडे के छिलके: अन्य एकांकी तथा बीज नाटक  लिखे जो उनकी मृत्यु के एक साल बाद प्रकाशित हुआ। इनकी अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, निबन्ध, यात्रा-वृत्तान्त आदि।अंधेरे बन्द कमरे उनका बहुचर्चित  उपन्यास है। उनकी नाट्य-कृतियां हों या कथात्मक रचनाएं, उनमें उनके व्यक्तित्व की छाप  साफ नज़र आती है। 

मोहन राकेश का जीवन दुखों से भरा हुआ था।आर्थिक परेशानियां थीं। कर्म के महत्व  को एक सीमा तक ही स्वीकारा जा सकता है। जीवन में सुख-दुख रिलेटेड हैं। यह समयचक्र है। सामान्य जीवन के घात-प्रतिघात एवं समस्याएं उनकी कृतियों में बिम्बित-प्रतिबिंबित होते हैं। 'आषाढ़ का एक दिन' एवं 'लहरों के राजहंस' आरंभिक  दिनों के नाटकों के पारंपरिक मूल्यों से काफी प्रेरित- प्रभावित है। रंगमंच की दृष्टि से ये नाटक प्रसाद  के "चन्द्रगुप्त" नाटक की भांति मंचीयता की कसौटी पर सफल नहीं कहे जा सकते।पर इनमें उनकी स्वच्छन्दतावादी  प्रवृत्ति  की साफ  झलक मिलती  है। उनके समीक्षात्मक संस्मरण को' आगे बढ़ाते हुए मैंने अपनी विवेचनात्मक  दृष्टि  से आगे बढ़ाते  हुए  अपनी बात कही- मगर आधे-अधूरे' नाटक में नारी की स्थिति एक आइरनी (दुर्भाग्य) से जुड़ी है। इसे संयोग नहीं,कुतर्क  के 'मूड' में कहा जा सकता है। नारी- पात्रों का रोल नाटक की कथावस्तु की 'पताका'बनकर फहराती है। 

'लहरों केराजहंस'में भी नारी का कोई स्वस्थ सामाजिक  स्वरूप नहीं उभरा है। ऐसा लगता है, जैसी को दोयम  दर्जे के रूप में चित्रित  किया गया है। संभवतः उनके  पक्षकार और शोधार्थी इस दिशा में विचार करेंगे। 

इसी बीच महामहिम उपराष्ट्रपति पधारे और पत्रिका का लोकार्पण  हुआ।  लेकिन इस बीच मोहन राकेश पर एक सार्थक संस्मरणात्मक चर्चा का 'फ्रेमवर्क' हो चुका था। कुछ अन्य प्रसंग/संस्मरण भी हैं जिन्हें फिर कभी-कहीं अन्यत्र। अस्तु।

डॉ. राहुल की स्मृति से


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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

रोशन रहेंगे शब्द डॉ.कुँअर बेचैन के

'ये दुनिया सूखी मिट्टी है/ तू प्यार के छींटे देता चल '


डॉ. कुंअर बेचैन, डॉ. हरीश नवल

कम शब्दों में इतनी बड़ी बात कहने वाले डॉ० कुंअर बेचैन एक बड़े साहित्यकार तो थे ही, एक बड़े इंसान भी थे। सदा मुस्कराते रहने वाले डॉ. कुंअर भीतर से कितने बेचैन थे, यह केवल वे ही जानते थे। उनके जीवन के संघर्ष उन्हें बहुत बड़ा कवि हृदय दे सके थे। उनके गीत उनके सामाजिक सरोकारों के दर्पण हैं। मेरा सौभाग्य मुझे उनका साथ लगभग पैंतीस वर्ष मिला, यद्यपि एक श्रोता के रूप में मैंने उन्हें पचास साल से अधिक सुना।

सन् 1985 की गर्मियों में अचानक मेरी मुलाक़ात बेचैन जी से मंसूरी के नीलम रेस्टोरेंट में हो गई जहाँ के परांठे बहुत प्रसिद्ध थे परांठों के साथ-साथ डॉ. बेचैन से गीत, अगीत, प्रगीत और नवगीत पर जानदार चर्चा हुई। हम दोनों ही हिंदी के प्राध्यापक थे और अन्य विषयों के अलावा काव्यशास्त्र भी पढ़ाते थे। तब नवगीत नया-नया ही था। उसके विषय में डॉ. बेचैन से कुछ नवीन व्याख्याएँ सौगात के रूप में मुझे मिलीं। रेस्टोरेंट से हम दोनों की विदाई एक बहुत अच्छे सूक्त वाक्य से हुई, जब उन्होंने कहा –“नीलम किसी किसी को सूट करता है पर आज यह हम दोनों को कर गया।

डॉ. बेचैन से संक्षिप्त मिलाप प्रायः कवि सम्मेलनों के आरंभ होने से पहले अथवा समापन के बाद मिलता था, जब वे औरों से भी घिरे होते थे। हाँ गोष्ठियों में भले ही कम मिलना होता था किंतु भरपूर होता था। विशेषकर लखनऊ  माध्यम गोष्ठियों में रहना, खाना-पीना साथ होता था। दिल्ली के हंसराज कॉलेज में उन्हें खूब बुलाया जाता था। वहाँ के आयोजक डॉ० प्रभात कुमार मुझे हिंदू कॉलेज से बेचैन जी से मिलने के लिए आमंत्रित किया करते थे। प्रभात जी से भी उनकी बहुत बनती थी। डॉ. बेचैन गुणग्राहक थे और प्रभात जी की सैन्स ऑफ ह्यूमर के प्रशंसक थे जिस कारण हम तीनों की हँसी दूर-दूर तक गुंज जाती थी एक दिन मैं और डॉ. प्रभात, डॉ० बेचैन के घर गाजियाबाद गए। ट्राफियों, सम्मान पत्रकों और भाभी और भाभी जी की गरिमा से भरा घर मेरे मन में घर कर गया। उसके बाद मैं अपनी पत्नी स्नेह सुधा के साथ दो बार गाजियाबाद गया। स्नेह सुधा चित्रकार हैं और कविता भी लिखती हैं यह बात कुंअर जी को बहुत भाती थी वे स्वयं एक बड़े चित्रकार थे जिनके रेखाचित्रों की धूम सर्वत्र है प्रियजन को अपनी पुस्तक भेंटते हुए एक अद्भुत रेखाचित्र क्षण भर में उस पर बना देते थे। मेरे पास भी उनकी कविता और चित्रकला के बहुत से संग्रहणीय साक्षी हैं।

मैंने एक बार डॉ॰ बेचैन से मेरे कॉलेज में हो रहे कवि सम्मेलन हेतु अनुरोध किया। वे बोले, "हिंदू कॉलेज में बुला रहे हो तो मुझे कवि सम्मेलन की जगह साहित्यिक संगोष्ठी में बुलाओ, कविताएँ तो मैं सुनाता ही रहता हूँ मुझसे किसी साहित्यिक विषय पर चर्चा करवाओ।" अवसर की बात है कि लगभग एक महीने बाद ही हिंदू कॉलेज में तीन दिवसीय गोष्ठी हुई जिसमें एक दिन डॉ. बेचैन के नाम हुआ वे 'साहित्य के प्रदेय' विषय पर बोले और बहुत प्रभावी बोले जिसमें विद्यार्थियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के भी उन्होंने सम्यक् उत्तर दिए विद्यार्थी बहुत ख़ुश और समापन के बाद उनसे आटोग्राफ लेने के लिए भीड़ में बदल गए। डॉ० साहब ने सभी को अपने हस्ताक्षर के साथ-साथ संदेश भी दिए। मैंने पाया कि विद्यार्थियों से भी अधिक प्रसन्न हुए और संतुष्ट कुंअर जी स्वयं थे क्योंकि उन्हें अपने मन की बातें कहने का भरपूर अवसर मिला था, ऐसा उन्होंने मुझे बताया।

हुए

ग़ज़ल के व्याकरण संबंधित भी उनकी पुस्तक और उनकी एक पत्रिका के दो अंक मेरे पास है। दुष्यंत कुमार के बाद मेरी समझ से डॉ० बेचैन ने निरंतर हिंदी ग़ज़ल को विकसित और प्रसारित किया। उनके काव्य अवदान में जहाँ नौ गीत संग्रह है वहीं ग़ज़ल के पंद्रह संग्रह हैं कविता की अन्य शैलियों में उनके दो कविता संग्रह, एक हाइकु संग्रह एक दोहा संग्रह और एक महाकाव्य भी है। उन्होंने दो उपन्यास भी लिखे जिनमें 'जी हाँ मैं ग़ज़ल हूँ मेरी पुस्तक संपदा में है। अत्यंत सरस शैली में डॉ. बेचैन ने मिर्ज़ा ग़ालिब की कथा लिखी है जिसमें गजल का मानवीकरण किया है। बेमिसाल है यह उपन्यास।

जब मैंगगनांचल' का संपादन कर रहा था, मैंने बेचैन जी से एक विशेष अंक के लिए उनकी तीन गजलें मांगी जिसपर उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि

'गगलांचल' में उनके संस्मरण छपें ताकि विदेश में भी पता चले कि मैं गद्य भी लिखता हूँ। मैंने सहर्ष दो कड़ियों में उनसे संस्मरण लिए जिनमें से जब एक प्रकाशित हुआ इसकी प्रशंसा में बहुत से पाठकों के पत्र आए, उनमें से अधिकतर नहीं जानते थे कि कुंअर जी गद्य भी लिखते हैं। इस संस्मरण का शीर्षक था 'मैं जब शायर बनाइसमें उन्होंने अपने कॉलेज की एक फैन्सी ड्रैस प्रतियोगिता का ज़िक्र किया था जिसमें वे शायर बने थे और वे अपने घर से ही एक शायर के गेटअप में पान चबाते दाढ़ी लगाए, सिगरेट का धुआँ उड़ाते, छड़ी लिए सभागार में संयोजक के पास पहुँचे और उन्होंने कुंअर जी को सम्मान देते हुए अपने साथ बिठा लिया और कहा कि मुशायरा तो रात आठ बजे से है अभी तो फैन्सी ड्रैस प्रतियोगिता चल रही है, आप प्रतियोगिता देखिए आपका नाम जान सकता हूँ। कुंअर जी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा, "जनाब मुझे कासिम अमरोहिणी कहते है सीधे अमरोहा से ही रहा हूँ, गजलें और नज्में कहता हूँ।

फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता समाप्त हुई तीन पुरस्कार दिए गए। प्रोग्राम समाप्त होने वाला था कि कुंअर जी ने संयोजक से कहा कि मैं कुछ कहना चाहता हूँ। संयोजक ने घोषणा कर दी कि आदरणीय कासिम अमरोहवी साहब इस प्रतियोगिता के बारे में अपने विचार रखना चाहते है। कुंअर जी ने माइक संभाला और प्रतियोगिता की सराहना करते हुए कहा कि आपने गौर नहीं किया कि एक शख्स और भी है जिसने फैन्सी ड्रेस में हिस्सा लिया लेकिन उसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया। यह कहकर उन्होंने अपनी दाढ़ी मूंछे हटा दी। वे पहचान लिए गए और निर्णय बदला गया। ज़ाहिर है उन्हें प्रथम घोषित किया गया।

डॉ॰ बेचैन की आदत थी जो मेरी भी थी कि गोष्ठियों में हम दोनों नोट्स लेते मैं उन्हें बोलने के बाद नष्ट कर देता था लेकिन डॉ० बेचैन उन्हें फाइल में रखते थे उन्होंने पाँच हज़ार से ज़्यादा कवि सम्मेलनों में भाग लिया था। इन नोट्स में कवि सम्मेलन का इतिहास अंकित है जिनके आधार पर उन्होंने दो हज़ार पृष्ठ खुद ही टाप कर लिए थे। संभवतः आने वाले किसी समय उनकी कवि सम्मेलन महागाथा एक ग्रंथ के रूप में प्रकट हो जाए।

बहुत सी और भी यादें उनसे जुड़ी हुई हैं। 22 दिसंबर, 2013 डॉ० बेचैन को हिंदी भवन में 'संवेदना सम्मान' प्रदान करने के लिए हिंदी भवन में एक समारोह हुआ जिसकी अध्यक्षता श्री बालस्वरूप राही की थी। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, कृष्ण मित्र, मंगल नसीम और प्रवीण शुक्ल के वक्तव्य थे और मुझे मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था। जब अन्यों के भाषण चल रहे थे, डॉ० बेचैन ने मुझे पर्ची पर लिखकर आदेशात्मक आग्रह किया कि मैं जब बोलूं तो केवल उनके काव्य कर्म का ही विश्लेषण करूँ। मैंने ऐसा ही किया था जिससे डॉ. बेचैन बहुत प्रसन्न और संतुष्ट हुए। उनका कहना था कि प्रायः वक्ता 'कुंअर बेचैन' पर बोलते हैं, 'कुंअर बेचैन' के काव्य कर्म पर नहीं।

मुझे उनका एक ऐसा संस्मरण ध्यान रहा है जिसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक आयाम उद्घाटित हुए थे दिसंबर 2008 में जापान में उर्दू, हिंदी पढ़ाने के सौ वर्ष मनाए गए थे, जिसमें जापान भारत और पाकिस्तान के कवियों का सम्मेलन भी था जिसमें कुंअर बेचैन जी को अध्यक्षता करनी थी। मुझ सहित पाँच प्रतिभागी और थे। पाकिस्तान के दल ने हम भारतीयों की अवहेलना करते हुए बड़ी निर्लज्जता से घोषित अध्यक्ष के स्थान पर पाकिस्तान के तहसीन फिराकी को अध्यक्ष पद पर बैठा दिया। मैंने विरोध में खड़े होकर कुछ कहना चाहा, तो बेचैन ने मेरा हाथ पकड़ मुझे बिठा दिया और बोले, "उन्हें मनमानी करने दो औक़ात पद से नहीं प्रतिभा से जानी जाती है। कुछ कहो मैं चुप होकर बैठ गया पाकिस्तान के दल ने कवि सम्मेलन के संचालन का दायित्व भी स्वयं हथिया लिया। सम्मेलन आरंभ हुआ पहले पाकिस्तान के कवियों ने

अपना रचना पाठ किया, फिर भारत की बारी आई। एक-एक कर सुरेश ऋतुपर्ण, हरजिन्दर चौधरी, लालित्य ललित और मैंने कविताएँ प्रस्तुत कीं। समापन कवि के रूप में कुंअर बेचैन ने एक ग़ज़ल और एक कविता प्रस्तुत की और बैठने लगे, लेकिन श्रोताओं ने जिनमें पाकिस्तान के कवि भी थे उन्हें बैठने दिया और एक-एक कर डॉ० बेचैन जी कि अनेक रचनाएँ सुनी। सभी उपस्थित जन देर तक खड़े होकर तालियाँ बजाते रहे। पाकिस्तानी दल भी तालियाँ पीट रहा था। अब अध्यक्ष जनाब हसीन फिराकी का उद्बोधन था जिसमें उन्होंने कहा कि वे बहुत शर्मिन्दा हैं कि उनके देश की कविता अभी तक इश्क, हुसन और जुल्फों में ही अटकी हुई है और भारत की कविता ग़रीबी, माँ-पिता, नदी, पेड़ पत्तियाँ और इंसानियत जैसे विषयों को अनेक अर्थ देकर समेटती है; विशेषकर कुअर बेचैन साहब की रचनाएँ। उन्होंने भी बाकायदा नोट्स बना रखे थे और कुंअर जी की कविताओं को बहुत से उदाहरण देते हुए उनका यशोगान किया।

बात यहीं नहीं रुकी पाकिस्तान ने डॉ० कुंअर बेचैन का अभिनदंन करने के लिए टोक्यो के एक पाँच - तारा होटल में अभिनंदन समारोह और भव्य डिनर आयोजित किया। कुंअर जी के कारण उनके साथ-साथ हम भारतीय साहित्यकारों का ही नहीं अपितु पूरे भारत का अभिनदंन हुआ।

कुंअर बेचैन जी का मानना था कि 'शब्द एक लालटेन' है जिसे आप अपने हाथ में लेकर अँधेरा दर करते चल सकते हो। उन्होंने जीवन भर इस लालटेन को थामे रखा और उनके शब्दों की लालटेन ऐसी है जो कभी भी बुझेगी नहीं, रोशनी देती रहेगी।

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डॉ. हरीश नवल की स्मृति से

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