‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



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गुरुवार, 30 मार्च 2023

आप खुशबू हैं किताबों में मिलेंगे!

नब्बे वर्ष का लंबा जीवन, लगभग छह दशक का रचनाकर्म! संभवतः कुछ अधूरी कहानियाँ और संस्मरण! दुनिया में किस व्यक्ति को ज़िंदगी में सबकुछ मिला है? मन्नू जी, आपका लिखना रुका, पर कम लिखकर यश भी तो खूब मिला - यह क्या कम है?

मन्नू भंडारी, कथाकार से भी पहले अध्यापिका के रूप में मेरे मन की स्मृतियों में बसती हैं। विद्यार्थी जीवन में उन्हें मैडम अधिक और कथाकार कम - इस रूप में जानती रही। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध कॉलेज मिरांडा हाउस में बी०ए० की कक्षाओं में उनसे हिंदी पढ़ना, फिर एम०ए० करते हुए समकालीन कथा साहित्य पर उनसे संवाद .. ये स्मृतियाँ भुलाए जाने के लिए नहीं हैं।

अच्छी तरह याद है.. बी०ए० ऑनर्स हिंदी के दूसरे साल में, मन्नू जी के साथ गोदान पर वह पहली क्लास .. छोटी छोटी नाजुक उँगलियों वाले उनके हाथों से बनती वे नाज़ुक आकृतियाँ.. और वह रोचक अभिव्यक्ति तो कभी भुलाई ही न जा सकी, जब कथासाहित्य के पेपर में कहानी विशेष पर टिप्पणी करते हुए मन्नू जी ने कहा -
"ज्यों केले के पात पात में पात, त्यों सज्जन की बात बात में बात!"

कड़क कलफ़ वाली सुंदर सूती साड़ियाँ और छोटे से माथे पर गहरे मेहरून रंग की बड़ी सी सिंदूर बिंदिया .. यह शिल्पा की चिपकू बिंदी बाज़ार में आने से पहले की बात ज़रूर है मैडम, पर आपसे पढ़ते थे, यह बहुत पहले की बात नहीं! आपसे पढ़कर, जब हम खुद पढ़ाने लगे, तब आपकी अस्वस्थता के बीच हमने आपको कई बार ढूँढा, आग्रह-मनुहार की, आपको अपने बीच पाना चाहा, उस आत्मीय गहन स्वर को फिर सुनना चाहा। लेकिन आप नहीं मिली तो नहीं मिली। आप काले मोतियाबिंद और बाद में न्यूरोल्जिया से जूझ रही थी।

आपकी रचनाओं के बहाने आपसे मिलना, हमेशा सार्थक लगता रहा, इतना कि यह प्रिय शे'र भी कुछ बेमानी सा लग रहा है ..
अबके बिछुड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!

मैंने इसमें एक नया मानी तलाशने की कोशिश की, उसे आपके साथ की स्मृतियों को समर्पित करती हूँ...
न तो बिछुड़े हैं न ख्वाबों में मिलेंगे
आप खुशबू हैं, किताबों में मिलेंगे!

साहित्य की आरंभिक समझ देने के लिए आपका आभार मैडम!

- विजया सती की स्मृति से।

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गुरुवार, 23 मार्च 2023

ममता कालिया - पहाड़ की छांह में

प्रिय लेखिका से फिर मिलना
वह भी एक पत्र के बहाने!

ममता कालिया अचानक मेरी प्रिय लेखिका नहीं बन गईं। उनका उपन्यास 'बेघर' पढ़ने के बाद एक लंबा अंतराल रहा। जब मैं हिंदी पढ़ाने विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में हंगरी के विख्यात ऐलते विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन विभाग में पहुँची, तब मेरे कक्ष की अलमारी में ममता कालिया बहुविध बिराजी हुई थीं। मैं एक सिरे से उन्हें पढ़ती चली गई, उनके लेखकीय व्यक्तित्व से गहरे जुड़ती चली गई, इतना कि विभाग के इकलौते एम०ए० हिंदी के छात्र पीटर को सुझाया कि शोध के लिए ममता कालिया के कथा साहित्य पर विचार करो, उन्हें पढ़ने के बाद। 
 
ठीक याद है कि 'बेघर' पढ़ने के बाद एक पत्र मैंने ममता जी को लिखा था - एक पाठक का प्रशंसा पत्र...। जो उनकी बेशुमार फैन मेल में से एक रहा होगा।
लेकिन मेरे लिए, उस पत्र का उत्तर एक अकेला ही रहा।
नहीं मालूम था कि आने वाले समय में ममता जी से साक्षात्कार होगा, कई रूपों में कई बार मिलना होगा और उनकी कृतियों से जी भरकर प्यार होगा...। इतना कि बहुतों से ललक कर कहूँ - ममता कालिया को पढ़ना! तुम्हें अच्छा लगेगा।

आज ममता जी का वह पत्र साझा कर रही हूँ, जिसने पुख़्ता किया कि ममता जी नहीं बदली! वही हैं, मस्त मगन अल्हड़ मुक्त और बेहतरीन स्मरण शक्ति की मालकिन!

पत्र के अंत में वे लिखती हैं कि आप पढ़ती रहें तो लिखने में क्या है हम लिखते रहेंगे!
और वे लिख रही हैं तब से अब तक   ...अनवरत!

शुभकामनाएँ अनंत प्रिय लेखिका!!

ममता कालिया का पत्र पाठक विजया सती को (पृ० १)
(पृ० २)



















प्रिय विजया, 
आपका पत्र कई स्तरों पर आल्हादित कर गया। इतनी जिज्ञासा कि मेरी रचनाएँ ढूँढ-ढूँढकर पढ़ी, मुझे अभिभूत कर गई। दूसरी बात, आप मेरे पुराने व प्रिय कॉलेज से जुड़ी हैं। १९६१-६३ में जब हिंदू कॉलेज में मैं एम०ए० की छात्रा थी, महिला लेक्चरर्स नहीं रखी जाती थीं। इतनी प्रगति प्राप्त की कॉलेज ने। आँखों के आगे कॉलेज के गलियारे, कैंटीन, क्लासरूम सब घूम गए। पता नहीं मेरे विभाग के प्रोफ़ेसर वहीं हैं कि बदल गए, प्रोफ़ेसर कँवर, सूद, देसाई, रैना, बहुत कुछ याद गया आपके पत्र से।
आप पढ़ती रहें तो लिखने में क्या है, हम लिखते रहेंगे।

ममता कालिया
१७-१०-७९

- विजया सती की स्मृति से।

ममता कालिया इस समृति पर कहती हैं,

"प्रिय विजया सती, इतने अरसे में पत्ते पेड़ से झड़ जाते हैं पर आपने मेरे पत्र का पन्ना संभाल कर रखा। आप नहीं जानती कि कितना जीवन सिंचन कर दिया आपने मेरे अंदर। कोई दूर बैठा हमें पढ़ रहा है, यह एक विरल, विलक्षण प्रेम अनुभूति है।"

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