‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



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सोमवार, 24 जुलाई 2023

विष्णु प्रभाकर की जयंती पर कुछ यादें

मित्र अरूण कहरवां ने आग्रह किया कि विष्णु प्रभाकर जी को स्मरण करूं कुछ इस तरह कि बात बन जाये । मैं फरवरी , 1975 में अहमदाबाद गुजरात की यूनिवर्सिटी में केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा अहिंन्दी भाषी लेखकों के लिए लगाये गये लेखन शिविर के लिए चुना गया था । दिल्ली में नरेंद्र कोहली जी मुझे रेलगाड़ी में विदा करने आए थे । पहली बार एक छोटे से कस्बे के युवा ने इतनी लम्बी रेल यात्रा की थी । बिना बुकिंग । एक कनस्तर पर बैठ कर । यूनिवर्सिटी पहुंचा । दूसरे दिन क्लासिज शुरू हुईं । मैंने कथा लेखन चुना । हमारे कथा गुरु के रूप में विष्णु प्रभाकर जी आमंत्रित थे । मज़ेदार बात कि आज की प्रसिद्ध कथाकार राजी सेठ व उनकी बहन कमलेश सिंह भी हमारे साथ प्रतिभागी थीं । कुल बतीस लेखक विभिन्न हिंदी भाषी प्रांतों से चुन कर आए थे । विष्णु प्रभाकर जी की सबसे चर्चित व लोकप्रिय पुस्तक आवारा मसीहा तब प्रकाशित हुई थी और वे उसकी प्रति झोले में रखते थे बड़े चाव से दिखाते । उनका शरतचंद्र का कहा वाक्य नहीं भूलता कि लिखने से बहुत मुश्किल है न लिखना । यानी जब कोई रचना आपके मन पर सवार हो जाती है तो आप उसे लिखे बिना नहीं रह सकते । फिर उनकी सुनाई लघुकथा : 

चांदनी रात थी । नदी किनारे मेंढकों के राजा ने कहा कि कितनी प्यारी चांदनी खिली है । आओ चुपचाप रह कर इसका आनंद लें और सभी मेंढक यही बात सारी रात टर्राते रहे । 

देखिए कितना बड़ा व्य॔ग्य । एक सप्ताह ऐसे ही कथा लेखन की बारीकियां सीखीं । शब्द चयन के बारे में वे कहते थे कि भागो नहीं , दौड़ो । इसका गूढ़ अर्थ यह कि भागते हम डर से हैं जबकि दौड़ते हम विजय के लिए हैं । 

 वे उन दिनों साप्ताहिक हिंदुस्तान के लिए कहानी का संपादन यानी चयन करते थे । मेरी कहानी थी -एक ही हमाम में । यह कहानी कार्यशाला में पढ़ी । उन्होंने शाम की सैर पर मुझे कहा कि कुछ तब्दीलियां कर लो तो इसे साप्ताहिक हिंदुस्तान में दे दूं । मैंने राजी सेठ से यह बात शेयर की । उन्होंने कहा कि इसलिए तब्दील मत करो कि यह साप्ताहिक हिंदुस्तान में आयेगी । यदि जरूरी हो तो चेंज करना । मैंने लालच छोड़ा और वह कहानी रमेश बतरा ने साहित्य निर्झर के कथा विशेषांक मे प्रकाशित की और उतनी ही चर्चित रही । यानी चेंज लेखक सोच समझ कर करे । 

इसके बाद मैंने लगातार विष्णु जी से सम्पर्क बनाये रखा । वे हर पत्र  का जवाब देते । अनेक पत्र घर में पुरानी फाइलों में मिलते रहे । बहुत समय बाद पता चला ये पत्र वे बोल कर मृदुला श्रीवास्तव और बाद में वीणा को लिखवाते थे । नीचे हस्ताक्षर करते थे । फिर वे लुधियाना आए । तब भी मुलाकात  हुई । जालंधर आए तब भी दो दिन मुलाकातें हुईं । फिर मैं दैनिक ट्रिब्यून में उपसंपादक लगा तो उनकी इंटरव्यू प्रकाशित की -मैं खिलौनों से नहीं किताबों से खेलता था । इसके बाद मेरी ट्रांस्फर हिसार के रिपोर्टर के तौर पर हुई । यहां आकर विष्णु जी का हिसार कनैक्शन पता चला कि वे रेलवे स्टेशन के पास अपने मामा के पास ही पढ़े लिखे और उन्होंने ही उनकी पशुधन फाॅर्म में नौकरी लगवाई । वहीं लेखन में उतरे और नाटक मंचन में अभिनय भी करते रहे । बीस वर्ष यहीं गुजारे । शायद सारा जीवन हिसार में गुजारते लेकिन सीआईडी के इंस्पेक्टर ने कहा कि काका जी , क्रांति की अलख पंजाब के बाहर जगाओ । तब हिसार पंजाब का ही भाग था । इस तरह वे परिवार सहित दिल्ली कश्मीरी गेट बस गये और यह उनके लेखन के लिए वरदान साबित हुआ । संभवतः हिसार में रह कर वे इतनी ऊंची उड़ान  न भर पाते । कहानी ही नहीं , नाटक और लघुकथा तक में उनका योगदान है । बहुचर्चित जीवनी आवारा मसीहा पर उन्हें जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार मिला जिसे उन्होंने मकान बनाने में लगाया और उसी मकान पर कब्जा हुआ और वे प्रधानमंत्री तक गये और आखिरकार मकान मिला । वे इतने स्वाभिमानी थे कि प्रधानमंत्री के एक समारोह में जब उनके बेटे को साथ नहीं जाने दिया तब वे वापस आ गये । पता चलने पर प्रधानमंत्री ने चाय पर बुलाया । वे गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी होते हुए भी किसी प्रकार की पेंशन लेने को तैयार न हुए । 

आखिर दैनिक ट्रिब्यून की ओर से कथा कहानी प्रतियोगिता के पुरस्कार बांटने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया क्योंकि वे हिसार के हीरो थे । उन्हें पांवों में सूजन के कारण कार में ही दिल्ली से लाने की व्यवस्था करवाई और वे यहां चार दिन रहे । प्रतिदिन मैं उन्हें मामा जी के घर से लेकर आयोजनों में ले जाता । वे गुजवि के भव्य वी आई पी गेस्ट हाउस में नहीं रुके । उनका कहना था कि मुझे यह आदत नहीं और मैं अपने मामा के घर ही रहूंगा । यह सारी व्यवस्था संपादक विजय सहगल के सहयोग से करवाई । जब समारोह के बाद उन्हें सम्मान राशि दी तब वे आंखों में आंसू भर कर बोले -कमलेश । तेरे जैसा शिष्य भी मुश्किल से मिलता है । 

बाद में उन्हें सपरिवार दिल्ली छोड़ने गया । मेरा दोहिता आर्यन मात्र एक डेढ़ वर्ष का था । उसे गोदी में खूब खिलाया । वह फोटो भी है मेरे पास ।  लगातार लेखन में जुटे रहे और आज भी उनके बेटे अतुल  प्रभाकर के साथ सम्पर्क बराबर हैं । उन्होंने दो वर्ष पूर्व दिल्ली के समारोह में बुलाया और मुझसे कहानी पाठ के साथ विष्णु जी के संस्मरण सुनाने को कहा । इसी प्रकार रोहतक के एमडीयू के हिंदी विभाग के विष्णु स्मृति समारोह में मुझे विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया । बहुत कुछ है पर तुरंत जो ध्यान में आया लिख दिया । हिसार की चटर्जी लाइब्रेरी को उन्होंने 2100 पुस्तकें अर्पित कीं ।  लाइब्रेरी में उनकी फोटो भी लगाई गयी है । हिसार के आमंत्रण पर उनका कहना था कि जब भी बुलाओगे तब नंगे पांव दौड़ा आऊंगा । आज बहुत याद आ रहे हैं विष्णु जी । हरियाणा सरकार ने जिला पुस्तकालय को विष्णु प्रभाकर जी के नाम से जोड़ा  तब भी राज्यपाल आए और विष्णु जी का पूरा परिवार भी आया । बहुत सी छोटी छोटी यादें उमड़ रही हैं । वे हमारे दिल में सदैव रहेंगे । मेरी चर्चित पुस्तक यादों की धरोहर में सबसे पहले इंटरव्यू विष्णु प्रभाकर जी का ही है जो उसी कथा कहानी प्रतियोगिता के समारोह के अवसर पर दैनिक ट्रिब्यून में विशेष रूप से प्रकाशित किया गया था । यह इंटरव्यू विशेष रूप से दिल्ली जाकर किया था और वे उस शाम बाहर खड़े मेरा इंतज़ार कर रहे थे । उन्होंने इंटरव्यू के बाद अपना उपन्यास अर्द्धनारीश्वर मुझे भेंट किया था । एक ऐसा उपहार जिसे मैं भूल नहीं सकता ।  इस पुस्तक के दो संस्करण पाठकों के हाथों में बहुत कम समय में पहुंचे ।

-कमलेश भारतीय की स्मृति से


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मंगलवार, 20 जून 2023

विष्णु प्रभाकर जी के साथ वह दस दिन

  


           लेखक छोटा या बड़ा नहीं होता। वह लेखक, लेखक ही कहलाता है। कपड़ा भले ही नया-पुराना हो सकता है, लेकिन लेखक कभी नया-पुराना नहीं कहलाया जाता है। यह बात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी एक औपचारिक वार्तालाप के दौरान कह रहे थे। उनसे बातचीत करते समय यह लग ही नहीं रहा था कि इतनी बड़ी शख्सियत के सामने मेरी बात हो रही थी, जबकि कल तक उन्हें मैंने किताबों में ही पड़ा था। किताबों में ही उनका रेखाचित्र देखा था। यह बात साल 1980 जनवरी की थी।  उन दिनों टी.वी पर भी कभी उनकी झलक नहीं देखने में आती थी। केवल समाचार पत्रों में ही कभी रचनाओं के माध्यम से या कभी किसी लेख के माध्यम से ही उनकी बात पढ़ने मिलती। यह बात दार्जिलिंग की है, उन दिनों मैं लेखक शिविर में गोंदिया से प्रतिनिधित्व कर रहा था, तब मैं महज 20 साल का था।  कभी यह भी नहीं सोचा था कि मेरी भेंट विष्णु प्रभाकर जी से होगी।  वह इतने मिलनसार होंगे, इसकी भी कल्पना नहीं थी। वे जब किसी विषय पर बात करते हैं तो करते ही चले जाते थे। और सुनने वाला सुनते ही रह जाता था, मैं भी सुन ही रहा था। ऐसा लगता था कि उन्हें लगातार सुनते ही रहें। उन दिनों मैं उनके साथ 10 दिनों तक था। दार्जिलिंग के जिस स्कूल में हम ठहरे थे वहाँ साहित्यिक चर्चाओं के अलावा हमारे पास कुछ नहीं था। सुबह दिन निकलते ही चाय पर साहित्य की चर्चा होती। दार्जिलिंग की वादियों में टहलते, तब भी साहित्य पर ही वे बात करते। लगता था जैसे वे साहित्य गढ़ने के लिए ही बने हों।  शिविर में भी वही चर्चा भोजन के समय भी वही चर्चा फुर्सत के क्षणों में भी साहित्य पर ही चर्चा करते। 

अक्सर वे साहित्यकार शरदचंद्र चट्टोपाध्याय जी पर बात करते वे। अपना उपन्यास आवारा मसीहा पर वे अक्सर चर्चा करते। वह शरदचंद्र चट्टोपाध्याय जी को लेकर इस तरह बात करते जैसे चट्टोपाध्याय भी हमारे साथ में बैठे हों। एक छवि सी मन में उतर जाती थी, जब वह उनकी जीवनी पर रोशनी डालते। कभी चकला घर की बातें होती तो कभी उनके फुर्सत क्षणों की। कभी और किसी चीज पर। फिर दार्जिलिंग जैसे पहाड़ी क्षेत्र में 10 दिन तक रहना हम लोगों के लिए किसी स्वर्ग की सैर करने जैसी बात थी। वह भी काफी गदगद थे।  अक्सर वे हमें समझाते थे। कहते थे हमेशा लिखा करो। अपना लिखा अपने वरिष्ठ को दिखाओ जो वाकई में साहित्य के प्रति समर्पित हो।   

   आठ दिवसीय शिविर में विष्णु प्रभाकर जी अक्सर कहते कि हर लेखक के लिए चिंतन और मनन आवश्यक है। उसके बिना वह अधूरा है। हर लेखक को पढ़ना जरूरी है। जिस चीज में उसकी रुचि है उस विषय को लेकर उस व्यक्ति ने अवश्य पढ़ना चाहिए। कुछ नहीं तो समाचार पत्र अवश्य पढ़ें। मैं स्वयं भी  समाचार पत्रों के अलावा किताबें पढ़ना पसंद करता हूं। इससे आपको शब्दों के ज्ञान के साथ ही साहित्य में क्या लिखा जा रहा है इसकी भी जानकारी मिलती है। अतः अपने चुने हुए विषय पर लिखने से पहले यह भी जान लेना ज़रूरी है कि उस विषय पर क्या और कैसे लिखा गया। और मैं कैसे लिख सकता हूँ? यह जानना और समझना बहुत ज़रूरी है। एक दिन मैंने अपनी लिखी कुछ कहानियाँ देते हुए उनसे कहा, दादा जब भी आपको फुर्सत मिले आप इन कहानियों को पढ़िएगा ज़रूर और अपनी राय भी अवश्य दीजिएगा। तब उन्होंने कहा- क्यों नहीं, क्यों नहीं। यहाँ मेरे पास समय ही समय है। मैं कल अवश्य तुम्हें  इस पर अपनी प्रतिक्रिया दूँगा।  

        मैंने उन्हें पढ़ने के लिए अपनी छह कहानियाँ दी थीं और उन्होंने एक ही रात में उन्हें पढ़कर दूसरे दिन अपनी प्रतिक्रिया दी। मैं हैरान था कि इतनी जल्दी मुझे अपनी कहानियों पर इतनी बड़ी शख्सियत से प्रतिक्रिया मिलेगी। मैं काफ़ी गदगद हुआ। मेरे लिए उनकी प्रतिक्रिया किसी प्रमाण पत्र से कम न थी।

  उन्होंने कहा लिखकर  रुको मत, लिखते रहो।  लिखते के पश्चात हमेशा चिंतन, मनन और अध्ययन करना कभी मत भूलो। इसे अपने पास गाँठ बाँधकर रख लो, यह जीवन भर काम आएगा। और यह बात आज भी मेरे काम आ रहा है। उस समय उन्होंने मेरी सौदा कहानी का ज़िक्र करते हुए कहा था, यह एक अनमेल विवाह की कहानी है। इसे लिखने से पूर्व एक बार मुंशी प्रेमचंद का निर्मला उपन्यास पढ़ते तो तुम और भी अच्छा लिख पाते । ऐसा नहीं है कि अभी अच्छा नहीं लिखा,‌‌अच्छी बात यह है कि निर्मला कहानी को पढ़े बिना तुमने एक नए तरीके से सौदा कहानी को लिखा है। यह तारीफ के काबिल है जहाँ तक शब्दों के प्रयोग की बात है तो वह और भी अच्छी तरीके से इसे मांजा जा सकता था।  लेकिन फिर भी यह कहानी अपने आप में परिपूर्ण है। मैं चाहता हूँ कि एक बार तुम  निर्मला को अवश्य पढ़ो। तब तुम्हें समझ में आएगा कि उसे कैसे लिखा गया। दादा की हर बात मैं आज भी नहीं भूला हूँ।  उनकी कही अनेक बातें मेरे ज़ेहन में है। आज विष्णु प्रभाकर जी हमारे बीच नहीं है, लेकिन इतने सालों के बाद भी उनकी बातें आज भी उतनी ही कारगर और सटीक है। उस समय उनके साथ चल रही चर्चा के दौरान मैंने उनकी बातें डायरी में  शब्द बद्ध की थी। वे अपनी लिखी कहानियों और उपन्यासों का भी ज़िक्र करते। लेकिन आज मेरे लिए अफसोस की बात यह है कि उनके साथ मैंने जिन पलों को बिताया उनमें से, मेरे पास चित्र के रूप में एक भी चित्र नहीं है। फिर भी मैं अपने आपको गौरवान्वित महसूस इसलिए करता हूँ कि मैंने उनके साथ समय बिताया। एक साथ भोजन किया। आज भी विष्णु प्रभाकर जी के साथ दार्जिलिंग और कोच्चि में बिताए सुनहरे पल  कभी भुलाए नहीं भूलते। हालांकि इसके बाद भी  मेरी उनसे नागपुर में अक्सर मुलाकात हुआ करती। नागपुर में वे अक्सर अपने बेटे के पास आते। मेरी उनसे मुलाकात सुबह टहलते समय होती थी और साहित्य पर चर्चा के अलावा मुझे भी लिखने के लिए प्रेरित करते।

                                -अतुल कुमार प्रभाकर की कलम से


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