‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



मंगलवार, 25 जुलाई 2023

निराला और अज्ञेय

 एक बार अज्ञेय अपने लेखन के शुरूआती दिनों में शिवमंगल सिंह सुमन जी के साथ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी से मिलने के लिये गये। उस समय दोपहर हो रही थी और निराला जी अपने खाने के लिये कुछ बना रहे थे। तो जैसे ही उन्होंने द्वार पर दस्तक दी, तो निराला जी उन्हें पहचान नहीं पाये और उनका नाम पता पूछने लगे, उन्होंने जब अज्ञेय का नाम सुना तो अंदर आने की आज्ञा दे दी। अज्ञेय को उस समय बड़े लेखक भी जानने लगे थे। अंदर आने पर निराला रसोई में गये। और वो दोनों बस इधर-उधर कमरे की नीरसता को ताकते रहे।

अब जो आगे का हिस्सा पढ़ेंगे वह ज्यों का त्यों वसंत का अग्रदूत से लिया गया है - 

इस बीच निराला एक बड़ी बाटी में कुछ ले आए और उन दोनों के बीच बाटी रखते हुए बोले, ''लो, खाओ, मैं पानी लेकर आता हूँ,'' और फिर भीतर लौट गए।

बाटी में कटहल की भुजिया थी। बाटी में ही सफाई से उसके दो हिस्से कर दिए गए थे।

निराला के लौटने तक दोनों रुके रहे। यह क्लेश दोनों के मन में था कि निरालाजी अपने लिए जो भोजन बना रहे थे वह सारा-का-सारा उन्होंने हमारे सामने परोस दिया और अब दिन-भर भूखे रहेंगे। लेकिन अज्ञेय यह भी जानते थे कि हमारा कुछ भी कहना व्यर्थ होगा-निराला का आतिथ्य ऐसा ही जालिम आतिथ्य है। सुमन ने कहा, ''निरालाजी, आप...''

''हम क्या?''

''निरालाजी, आप नहीं खाएँगे तो हम भी नहीं खाएँगे।''

निरालाजी ने एक हाथ सुमन की गर्दन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ''खाओगे कैसे नहीं? हम गुद्दी पकड़कर खिलाएँगे।''

सुमन ने फिर हठ करते हुए कहा, ''लेकिन, निरालाजी, यह तो आपका भोजन था। अब आप क्या उपवास करेंगे ?''

निराला ने स्थिर दृष्टि से सुमन की ओर देखते हुए कहा, ''तो भले आदमी, किसी से मिलने जाओ तो समय-असमय का विचार भी तो करना होता है।'' और फिर थोड़ा घुड़ककर बोले : ''अब आए हो तो भुगतो।''

दोनों ने कटहल की वह भुजिया किसी तरह गले से नीचे उतारी। बहुत स्वादिष्ट बनी थी, लेकिन उस समय स्वाद का विचार करने की हालत उनकी नहीं थी।

जब वो लोग बाहर निकले तो सुमन ने खिन्न स्वर में कहा, ''भाई, यह तो बड़ा अन्याय हो गया।''

अज्ञेय ने कहा, ''इसीलिए मैं कल से कह रहा था कि सवेरे जल्दी चलना है, लेकिन आपको तो सिंगार-पट्टी से और कोल्ड-क्रीम से फ़ुरसत मिले तब तो! नाम 'सुमन' रख लेने से क्या होता है अगर सवेरे-सवेरे सहज खिल भी न सकें!''


वसंत का अग्रदूत से...

प्रस्तुति मनीषा कुलश्रेष्ठ


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सोमवार, 24 जुलाई 2023

विष्णु प्रभाकर की जयंती पर कुछ यादें

मित्र अरूण कहरवां ने आग्रह किया कि विष्णु प्रभाकर जी को स्मरण करूं कुछ इस तरह कि बात बन जाये । मैं फरवरी , 1975 में अहमदाबाद गुजरात की यूनिवर्सिटी में केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा अहिंन्दी भाषी लेखकों के लिए लगाये गये लेखन शिविर के लिए चुना गया था । दिल्ली में नरेंद्र कोहली जी मुझे रेलगाड़ी में विदा करने आए थे । पहली बार एक छोटे से कस्बे के युवा ने इतनी लम्बी रेल यात्रा की थी । बिना बुकिंग । एक कनस्तर पर बैठ कर । यूनिवर्सिटी पहुंचा । दूसरे दिन क्लासिज शुरू हुईं । मैंने कथा लेखन चुना । हमारे कथा गुरु के रूप में विष्णु प्रभाकर जी आमंत्रित थे । मज़ेदार बात कि आज की प्रसिद्ध कथाकार राजी सेठ व उनकी बहन कमलेश सिंह भी हमारे साथ प्रतिभागी थीं । कुल बतीस लेखक विभिन्न हिंदी भाषी प्रांतों से चुन कर आए थे । विष्णु प्रभाकर जी की सबसे चर्चित व लोकप्रिय पुस्तक आवारा मसीहा तब प्रकाशित हुई थी और वे उसकी प्रति झोले में रखते थे बड़े चाव से दिखाते । उनका शरतचंद्र का कहा वाक्य नहीं भूलता कि लिखने से बहुत मुश्किल है न लिखना । यानी जब कोई रचना आपके मन पर सवार हो जाती है तो आप उसे लिखे बिना नहीं रह सकते । फिर उनकी सुनाई लघुकथा : 

चांदनी रात थी । नदी किनारे मेंढकों के राजा ने कहा कि कितनी प्यारी चांदनी खिली है । आओ चुपचाप रह कर इसका आनंद लें और सभी मेंढक यही बात सारी रात टर्राते रहे । 

देखिए कितना बड़ा व्य॔ग्य । एक सप्ताह ऐसे ही कथा लेखन की बारीकियां सीखीं । शब्द चयन के बारे में वे कहते थे कि भागो नहीं , दौड़ो । इसका गूढ़ अर्थ यह कि भागते हम डर से हैं जबकि दौड़ते हम विजय के लिए हैं । 

 वे उन दिनों साप्ताहिक हिंदुस्तान के लिए कहानी का संपादन यानी चयन करते थे । मेरी कहानी थी -एक ही हमाम में । यह कहानी कार्यशाला में पढ़ी । उन्होंने शाम की सैर पर मुझे कहा कि कुछ तब्दीलियां कर लो तो इसे साप्ताहिक हिंदुस्तान में दे दूं । मैंने राजी सेठ से यह बात शेयर की । उन्होंने कहा कि इसलिए तब्दील मत करो कि यह साप्ताहिक हिंदुस्तान में आयेगी । यदि जरूरी हो तो चेंज करना । मैंने लालच छोड़ा और वह कहानी रमेश बतरा ने साहित्य निर्झर के कथा विशेषांक मे प्रकाशित की और उतनी ही चर्चित रही । यानी चेंज लेखक सोच समझ कर करे । 

इसके बाद मैंने लगातार विष्णु जी से सम्पर्क बनाये रखा । वे हर पत्र  का जवाब देते । अनेक पत्र घर में पुरानी फाइलों में मिलते रहे । बहुत समय बाद पता चला ये पत्र वे बोल कर मृदुला श्रीवास्तव और बाद में वीणा को लिखवाते थे । नीचे हस्ताक्षर करते थे । फिर वे लुधियाना आए । तब भी मुलाकात  हुई । जालंधर आए तब भी दो दिन मुलाकातें हुईं । फिर मैं दैनिक ट्रिब्यून में उपसंपादक लगा तो उनकी इंटरव्यू प्रकाशित की -मैं खिलौनों से नहीं किताबों से खेलता था । इसके बाद मेरी ट्रांस्फर हिसार के रिपोर्टर के तौर पर हुई । यहां आकर विष्णु जी का हिसार कनैक्शन पता चला कि वे रेलवे स्टेशन के पास अपने मामा के पास ही पढ़े लिखे और उन्होंने ही उनकी पशुधन फाॅर्म में नौकरी लगवाई । वहीं लेखन में उतरे और नाटक मंचन में अभिनय भी करते रहे । बीस वर्ष यहीं गुजारे । शायद सारा जीवन हिसार में गुजारते लेकिन सीआईडी के इंस्पेक्टर ने कहा कि काका जी , क्रांति की अलख पंजाब के बाहर जगाओ । तब हिसार पंजाब का ही भाग था । इस तरह वे परिवार सहित दिल्ली कश्मीरी गेट बस गये और यह उनके लेखन के लिए वरदान साबित हुआ । संभवतः हिसार में रह कर वे इतनी ऊंची उड़ान  न भर पाते । कहानी ही नहीं , नाटक और लघुकथा तक में उनका योगदान है । बहुचर्चित जीवनी आवारा मसीहा पर उन्हें जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार मिला जिसे उन्होंने मकान बनाने में लगाया और उसी मकान पर कब्जा हुआ और वे प्रधानमंत्री तक गये और आखिरकार मकान मिला । वे इतने स्वाभिमानी थे कि प्रधानमंत्री के एक समारोह में जब उनके बेटे को साथ नहीं जाने दिया तब वे वापस आ गये । पता चलने पर प्रधानमंत्री ने चाय पर बुलाया । वे गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी होते हुए भी किसी प्रकार की पेंशन लेने को तैयार न हुए । 

आखिर दैनिक ट्रिब्यून की ओर से कथा कहानी प्रतियोगिता के पुरस्कार बांटने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया क्योंकि वे हिसार के हीरो थे । उन्हें पांवों में सूजन के कारण कार में ही दिल्ली से लाने की व्यवस्था करवाई और वे यहां चार दिन रहे । प्रतिदिन मैं उन्हें मामा जी के घर से लेकर आयोजनों में ले जाता । वे गुजवि के भव्य वी आई पी गेस्ट हाउस में नहीं रुके । उनका कहना था कि मुझे यह आदत नहीं और मैं अपने मामा के घर ही रहूंगा । यह सारी व्यवस्था संपादक विजय सहगल के सहयोग से करवाई । जब समारोह के बाद उन्हें सम्मान राशि दी तब वे आंखों में आंसू भर कर बोले -कमलेश । तेरे जैसा शिष्य भी मुश्किल से मिलता है । 

बाद में उन्हें सपरिवार दिल्ली छोड़ने गया । मेरा दोहिता आर्यन मात्र एक डेढ़ वर्ष का था । उसे गोदी में खूब खिलाया । वह फोटो भी है मेरे पास ।  लगातार लेखन में जुटे रहे और आज भी उनके बेटे अतुल  प्रभाकर के साथ सम्पर्क बराबर हैं । उन्होंने दो वर्ष पूर्व दिल्ली के समारोह में बुलाया और मुझसे कहानी पाठ के साथ विष्णु जी के संस्मरण सुनाने को कहा । इसी प्रकार रोहतक के एमडीयू के हिंदी विभाग के विष्णु स्मृति समारोह में मुझे विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया । बहुत कुछ है पर तुरंत जो ध्यान में आया लिख दिया । हिसार की चटर्जी लाइब्रेरी को उन्होंने 2100 पुस्तकें अर्पित कीं ।  लाइब्रेरी में उनकी फोटो भी लगाई गयी है । हिसार के आमंत्रण पर उनका कहना था कि जब भी बुलाओगे तब नंगे पांव दौड़ा आऊंगा । आज बहुत याद आ रहे हैं विष्णु जी । हरियाणा सरकार ने जिला पुस्तकालय को विष्णु प्रभाकर जी के नाम से जोड़ा  तब भी राज्यपाल आए और विष्णु जी का पूरा परिवार भी आया । बहुत सी छोटी छोटी यादें उमड़ रही हैं । वे हमारे दिल में सदैव रहेंगे । मेरी चर्चित पुस्तक यादों की धरोहर में सबसे पहले इंटरव्यू विष्णु प्रभाकर जी का ही है जो उसी कथा कहानी प्रतियोगिता के समारोह के अवसर पर दैनिक ट्रिब्यून में विशेष रूप से प्रकाशित किया गया था । यह इंटरव्यू विशेष रूप से दिल्ली जाकर किया था और वे उस शाम बाहर खड़े मेरा इंतज़ार कर रहे थे । उन्होंने इंटरव्यू के बाद अपना उपन्यास अर्द्धनारीश्वर मुझे भेंट किया था । एक ऐसा उपहार जिसे मैं भूल नहीं सकता ।  इस पुस्तक के दो संस्करण पाठकों के हाथों में बहुत कम समय में पहुंचे ।

-कमलेश भारतीय की स्मृति से


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बुधवार, 19 जुलाई 2023

 यादों मे 

श्रद्धेय भगवती चरण वर्मा 

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भगवती बाबू यानी हिंदी साहित्य के छायावाद काल के एक शिखरपुरुष श्री भगवती चरण वर्मा से मेरा व्यक्तिगत परिचय महज़ एक इत्तिफ़ाक़ ही माना जाना चाहिए। वैसे तो लखनऊ, जहाँ मेरा जन्म हुआ और अधिकांश शिक्षा-दीक्षा भी हुई, की साहित्यिक पहचान पिछली सदी के मध्य में उस कालखण्ड के तीन दिग्गज लेखकों - अमृतलाल नागर , भगवती चरण वर्मा एवं यशपाल के कारण ही थी, किन्तु अपने विद्यार्थीकाल में मेरा निकट सम्पर्क केवल नागर  जी से हो सका। हालाँकि भगवती  बाबू के चतुर्थ एवं कनिष्ठतम सुपुत्र धीरेंद्र वर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर एक प्रकार से मेरे सहपाठी रहे थे, किन्तु उन दिनों चित्रकला के प्रति मेरी गहरी रुचि के चलते मेरी हिन्दी साहित्य में रुचि महज़ पठन-पाठन तक ही सीमित थी। यह ज़रूर है कि मैं अपने साहित्यिक अध्ययन के दौरान हिंदी उपन्यास की इस बृहत्त्रयी की कृतियों से परिचित था। उन कृतियों में, जिसने मुझे सबसे अधिक आकर्षित एवं सम्मोहित किया था, वह थी भगवती बाबू की कालजयी रचना 'चित्रलेखा'। वैसे मैं इतिहास विषय का विद्यार्थी कभी भी नहीं रहा, किन्तु बचपन से ही पौराणिक एवं ऐतिहासिक गाथाओं में मेरी गहरी अभिरुचि रही थी। क्योंकि 'चित्रलेखा' की पृष्ठभूमि चन्द्रगुप्त मौर्य कालीन थी और उसकी भावभूमि एवं प्रस्तुति काव्यात्मक थी, उसके प्रति मेरा विशेष रूप से आकृष्ट होना स्वाभाविक था। मुझे याद है कि उसे पढ़ने के साथ ही मैंने प्रख्यात फ्रांसीसी उपन्यासकार अनातोले फ्रांस की नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कृति 'थाया' भी पढ़ी थी और दोनों उपन्यासों के समानांतर वर्ण्य विषय, किन्तु उनमें प्रतिपादित पृथक जीवन-दृष्टि पर भी चिंतन-मनन किया था। वह कालखण्ड छायावाद युग के प्रभाव से अभी पूरी तरह उन्मुक्त नहीं हुआ था और प्रसाद-पंत-निराला मेरे प्रिय कवि थे। प्रसाद जी एक प्रकार से मेरे इष्ट कवि थे और स्नातक कक्षा में पढ़ा उनका 'आँसू' काव्य मुझे लगभग कंठस्थ था। बाद में हिन्दी कविता लेखन की ओर उन्मुख होने पर मुझे उस छायावादी सम्मोह से उबरने में काफी यत्न करना पड़ा था। भगवती बाबू की ख्याति छायावाद युग के एक प्रमुख कवि के रूप में भी थी और मैंने लखनऊ विश्वविद्यालय की टैगोर लायब्रेरी से लेकर उनकी प्रमुख कविताओं के संकलन को भी उन्हीं दिनों बाँचा था। अस्तु, भगवती बाबू एक लेखक के रूप में मेरे नितांत अपरिचित नहीं थे।  

हुआ यों कि ईस्वी सन १९६१ में मैं अंग्रेजी के व्याख्याता के रूप में सुदूर पंजाब के जालंधर शहर में जा बसा और कालांतर में उधर का ही स्थायी वासी हो गया। बात ईस्वी सन १९६५ की है। ग्रीष्मावकाश में लखनऊ आने पर मुझसे छोटे भाई अतुल ने, जो इलाहांबाद बैंक की हज़रतगंज शाखा में कार्यरत थे, भगवती बाबू से बैंक कर्मचारी की हैसियत से परिचित होने की बात कही। तब तक मैं एक कवि के रूप में थोड़ा-बहुत जाना जा चुका था और 'धर्मयुग' -'साप्ताहिक हिंदुस्तान' आदि देश की अग्रणी पत्रिकाओं में अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने हेतु लालायित था। भगवती बाबू का ज़िक़्र आने पर मैंने अपनी कुछ गीत-कविताएँ अतुल के माध्यम से उन्हें दिखाने हेतु भेजीं। भगवती बाबू ने मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। मुझे स्पष्ट याद है लगभग ग्यारह बजे अपराह्न में हम उनके महानगर स्थित आवास पर उपस्थित हुए। द्वार खोला धीरेंद्र ने ही - कुछ हिम्मत आई। इतने बड़े किसी साहित्यकार से मिलने का वह दूसरा प्रसंग था मेरे लिए।इससे पूर्व नागर जी से मैं भारतीय साहित्य परिषद की लखनऊ शाखा के साहित्य मंत्री के रूप में दो-तीन बार मिल चुका था। उस प्रशस्त ड्राइंग रूम में बैठा मैं भगवती बाबू के विशाल साहित्यिक व्यक्तित्व के आतंक से अपने को कुछ हद तक मुक्त करने की प्रक्रिया में ही था कि वे सामने के दरवाज़े से दाख़िल हुए। मैं अभी उन्हें प्रणाम करने की मुद्रा में ही था कि हल्के स्मित के साथ उन्होंने कहा - 'रवीन्द्र, तुम्हारी कविताएँ मैंने पढ़ीं हैं। उन्हें 'धर्मयुग' में प्रकाशित होने के लिए भेजो। मैंने धर्मवीर भारती को पत्र लिख दिया है। उसे कविताओं के साथ भेज दो। इतनी सहजता से उन्होंने मेरे संकोच को सहेज दिया था। मैं चकित था, अभिभूत था। थोड़ी देर तक कुछ और बातें हुईं - मैंने 'चित्रलेखा' की ऐतिहासिकता के विषय में छात्र जीवन में उपजीं अपनी आशंकाओं को, 'थाया' से उस उपन्यास की समानता पर प्रश्न किये। उन्होंने मेरी राय का कहीं समर्थन किया तो कहीं प्रतिवाद भी। किन्तु उसमें कहीं भी कोई बड़े लेखक का न तो अहंकार था और न ही मेरी अनधिकार चेष्टा के प्रति कोई तिरस्कार का भाव। थोड़ी देर में जब हम उनके आवास से बाहर आये, मैं एक गहरी आश्वस्ति के भाव से भरा हुआ था। उस बार तो मेरी कविताएँ भगवती बाबू के पत्र के बावजूद 'धर्मयुग' में नहीं प्रकाशित हो पाईं, किन्तु उसके कई वर्षों बाद हिसार आने पर जब मेरी रचनाएँ 'नया प्रतीक' एवं 'कल्पना' जैसी लब्धप्रतिष्ठ पत्रिकाओं के साथ  'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में भी प्रकाशित हुईं तब मुझे भगवती बाबू के आशीर्वचनों का स्मरण हो आया। उसका भी एक रोचक प्रसंग है। उनसे भेंट होने के दो वर्ष के बाद ग्रीष्मावकाश के उपरान्त मैं परिवार सहित पंजाब मेल से जालंधर वापस जा रहा था। मेरे सौभाग्य से भगवती बाबू भी सपरिवार उसी बोगी  में थे  -  वे लोग किसी विवाह-प्रसंग में सम्मिलित होने के लिए पटियाला जा रहे थे। मेरी पत्नी सरला का उनकी बड़ी सुपुत्री शकुन्तला जी से मायके की ओर से निकट का पारिवारिक संबंध था। वे भी उनके साथ थीं - धीरेंद्र भी थे। वह भेंट बड़ी ही आत्मीय रही। कुछ सहज पारिवारिक चर्चा के बीच भगवती बाबू ने 'धर्मयुग' में मेरी रचनाओं के प्रकाशन विषय में पूछा।  यह जानने पर कि मेरी रचनाएँ उनके पत्र के बावजूद प्रकाशित नहीं हुईं, वे चुप हो गए। मुझे लगा कि वे इस बात से कुछ खिन्न हुए हैं। कुछ ठहर कर उन्होंने कहा -'रवीन्द्र, एक प्रकार से यह ठीक ही हुआ। सिफारिश के आधार पर व्यक्ति की प्रगति, विशेष रूप से एक लेखक की प्रगति कई बार बड़ी ही खोखली साबित होती है। तुममें प्रतिभा है; उससे अपने को वंचित मत होने देना। एक दिन निश्चित ही तुम्हें अखिल भारतीय पहचान मिलेगी। सहज होकर अपना कार्य करते रहो। वही तुम्हारी उपलब्धि होगी।' उनके वे आशीर्वचन बाद में मेरा सौभाग्य बने।  

भगवती बाबू से मेरी यही दो संक्षिप्त भेंटें हुईं, किन्तु उनका स्नेह निरंतर मुझे प्रेरित करता रहा।  

-- कुमार रवीन्द्र की स्मृति से (प्रस्तुति : आचार्य संजीव वर्मा)


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रविवार, 16 जुलाई 2023

आज मेरा जन्मदिन है - वेद प्रताप वैदिक


 एक विशेष घटना वैदिक जी के संदर्भ में प्रस्तुत है :

   राष्ट्रपति भवन में एक लघु समारोह था।राष्ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा द्वारा एक पुस्तक का लोकार्पण था।केवल दस नागरिक आमंत्रित थे जिनमे डॉक्टर वैदिक और मैं भी थे।वह दिन था ३० दिसम्बर।लोकार्पण हुआ,धन्यवाद प्रस्ताव भी हो गया।सब विदा हेतु खड़े हो गए।अचानक वैदिक जी सारे प्रोटोकोल तोड़ कर राष्ट्रपति की ओर तेज़ी से बढ़े और इस से पहले कि अंगरक्षक आगे बढ़ते,वैदिक जी ने शंकरदयाल शर्मा जी के चरण स्पर्श करते हुए कहा ,”महामहिम मैं आपका विद्यार्थी रहा हूँ,आज मेरा जन्मदिन है ,आशीर्वाद चाहता हूँ “

राष्ट्रपति जी हंस पड़े और वैदिक जी को गले लगाते हुए एक श्लोक पढ़ आशीष दिया।

वैदिक जी वापिस अपने स्थान की ओर लौटे,राष्ट्रपति जी ने कहा,”किसी और का भी जन्मदिन हो,वे भी आशीर्वाद लगे हाथ ले लें”

मैंने वैदिक जी से प्रेरणा लेते हुए राष्ट्रपति जी को बताया कि मेरा जन्मदिन एक सप्ताह बाद है ।वैदिक जी तुरंत बोले,” अरे तो आशीर्वाद ले लो फिर कब यहाँ आना होगा…    

और मुझे भी आशीर्वाद मिल गया

हरीश नवल की स्मृति से


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'इश्क़ जल रहा है' - फणीश्वरनाथ रेणुु

'इश्क़ जल रहा है'

 एक बार मैं अपने पति रॉबिन शॉ पुष्प के साथ रेणु जी के घर गई. ‘धर्मयुग’ के होली विशेषांक के लिए रेणु जी के लंबे बालों के बारे में इंटरव्यू लेना था. वे घर पर अकेले ही थे. उस दिन धूप बहुत कम थी. विचार हुआ कि पहले छत पर जाकर फ़ोटो ले ली जाए फिर आराम से बातें होंगी. ऊपर से जल्दी-जल्दी फ़ोटो खींचकर हम नीचे उतर आए. तब तक कुछ और लोग भी आ गए. रेणु जी अपनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ के अनेक संस्मरण सुनाने लगे. संस्मरणों का उनके पास अकूत भंडार था।

 वे बताने लगे कि ‘तीसरी कसम’ की शूटिंग के दौरान कैमरामैन सुब्रत मित्र, वहीदा रहमान से उर्दू सीख रहे थे. उन्होंने उर्दू के कुछ शब्द और उनके अर्थ लिख लिए थे. जब भी समय मिलता वे, रटने लगते- आफ़ताब, मेहताब, इश्क, अश्क, आतिश... 

 एक दिन शॉट लेना था. सीन था कि वहीदा रहमान जलती हुई आग के पास बैठी हैं. तैयारी शुरू हुई. लकड़िया लाई गयीं. सुब्रत मित्र ने कैमरा संभाला और बेचैनी से वहीदा जी का इंतज़ार करने लगे. जैसे ही वहीदा जी दिखीं, वे वहीं से चिल्लाए, “बोहिदा जी, जल्दी आइए, इश्क जल रहा है. हम काब से इंतजार कर रहा है.”

 ‘आतिश’ की जगह ‘इश्क’ के जलने की बात सुनकर वहीदा जी और सेट पर उपस्थित सभी लोग हंस पड़े.

 अभी रेणु जी के संस्मरण टेप रिकॉर्डर की तरह चल ही रहे थे कि मैंने बीच में टोका, “सच में कहीं कुछ जल रहा है, ऐसा मुझे लग रहा है.”

 रेणु जी ठहाका लगाकर हंसे, “अरे, महिलाओं को यह सब गंध बड़ी जल्दी आती है. इतने फ्लैट्स हैं. कहीं कुछ जल रहा होगा.”

 सभी आगंतुक पुरुष ‘हो-हो’ कर हंसने लगे. मैं चुप रह गई. कुछ देर बाद हमने कहा, “अब चला जाए.” सब ड्राइंग रूम से उठे. रेणु जी हमें छोड़ने सीढ़ियों तक आए. बीच में ही उनका किचन पड़ता था. किचन में धुआं उठ रहा था 

उनकी पत्नी बाजार जाते हुए उन्हें चावल देखने को कह गई थीं, वही चावल जल रहे थे। उन्होंने जलते चावल का पतीला हाथ से उठा लिया और हू हा करने लगे। तब मैंने जाकर गैस बंद की। उनके हाथ पानी के कटोरे में डाले।


-गीता पुष्प शॉ की स्मृति से (प्रस्तुति -वीणा विज 'उदित')


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शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

मुम्बई की हवाओं में अब भी उनकी हँसी गूँजती है- निदा फ़ाज़ली

घर से मस्जिद है बड़ी दूर चलो यों कर लें 
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए 
बच्चों में प्रभु मूर्ति देखने वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली को किसी कौम या संप्रदाय में नहीं बांटा जा सकता। वैसे भी शायर शायर होता है।जाति न पूछो साधु की...... लेखक साधु ही तो होता है। क्योंकि वह खुद को भूल कर दुनिया की सोचता है ।
राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित विजय वर्मा  कथा सम्मान की शुरूआत निदा फाजली की अध्यक्षता में हुई थी।सर्वविदित है यह पुरस्कार मैं और डॉ प्रमिला वर्मा अपने बड़े भाई( 48 वर्षीय )स्वर्गीय विजय वर्मा पत्रकार ,लेखक ,संपादक,नाट्यकर्मी आवाज़ की दुनिया के जाने माने कलाकार की स्मृति में पिछले 1998 से हर साल आयोजित करते हैं । कार्यक्रम के पश्चात गेट-टुगैदर के दौरान उन्होंने अपने शेर को सुनाते हुए कहा था कि जब उन्होंने पाकिस्तान में एक मुशायरे में यह शेर सुनाया तो कट्टरपंथी मुल्लाओं ने हंगामा खड़ा कर दिया कि क्या आप बच्चे को अल्लाह से बड़ा समझते हैं। मैंने कहा-" मैं तो बस इतना जानता हूं कि मस्जिद इंसान बनाता है और बच्चे अल्लाह बनाता है।"
निदा फ़ाज़ली जी से मेरी वह पहली मुलाकात कब अंतरंगता में बदल गई पता ही नहीं चला ।
बेहद खुश मिजाज, हमेशा मुस्कुराते हुए नजर आने वाले निदा साहब पान के बहुत शौकीन थे ।पान के बिना उनकी शख्सियत अधूरी सी लगती थी ।अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच के कवि सम्मेलन का वाकया है ,जहां वे मुख्य अतिथि के रुप में आमंत्रित थे ।उनके आते ही स्वागत के लिए मीडिया अलर्ट हुआ ।अभी कार्यक्रम शुरू होने में देर थी ।उन्हें मेहमानों के कमरे में बिठाया गया और मेहमाननवाजी का जिम्मा मुझे सौंपा गया। उन्हें बैठाकर मैं चाय नाश्ते का ऑर्डर देने बाहर गई ।लौटी तो देखा वे गायब .....कहां गए .....तलाश जारी ......सब ने उन्हें आते देखा पर आते किसी ने नहीं। कहां गए ....और सब की तलाश के बावजूद उनकी अनुपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ। दूसरे दिन अखबार में प्रकाशित न्यूज़ देखकर उन्होंने मुझे फोन किया-" मुआफ़ी चाहता हूं संतोष, कल पान की तलाश में भटकते भटकते जाने कहां पहुंच गया। और दिमाग से एक दम ही निकल गया कि मैं तो कार्यक्रम के लिए आया था।" फिर देर तक उनके ठहाके फोन पर गूंजते रहे।
उन दिनों मुम्बई में मैं एक आशियाने की तलाश में थी। निदा साहब ने सुना तो बोले -"परेशान क्यों हो रही हो ,मीरा रोड के मेरे फ्लैट में रहो जा कर ,खाली पड़ा है ।"फिर उदास हो गए " जानता हूं नहीं रहोगी तुम मीरा रोड में ।"
हां मीरा रोड अब मेरी यादो की किताब में महज़ एक काला पन्ना बन कर रह गया है ।कितने अरमानों से हेमन्त की पसंद का फ्लैट खरीदा था वहां। मैं सपने बुनने लगी थी। ये वाला बेड रूम हेमन्त की शादी के बाद उसे दूंगी। वह चित्रकार है अपनी पसंद से सजाएगा ।पर ऐसा हो न सका और मेरा इकलौता बेटा हेमंत असमय काल कवलित हो गया। ओने पौने दामों में फ्लैट बेच दिया था मैंने ।मान लिया था हेमन्त के साथ मैं भी दफन हो गई हूं ।निदा साहब ने समझाया "कलम को सच्चा साथी समझो संतोष, तुम्हें पता है मेरी माशूका की मौत ने मुझे शायर बनाया "।चौक पड़ी थी मैं ।वे बताने लगे-" कॉलेज में मेरे आगे की पंक्ति में एक लड़की बैठा करती थी ।बहुत अच्छी लगती थी वह मुझे। मुझे उससे इकतरफ़ा इश्क हो गया ।एक दिन नोटिस बोर्ड पर लिखा देखा "मिस टंडन का निधन रोड एक्सीडेंट में हो गया। "
मैंने गमजदा हो कलम उठाई और उस कलम को पुख्ता किया। सूरदास के भजन ने" मधुबन तुम क्यों रहत हरे विरह वियोग श्याम सुंदर के हारे क्यों न जरे "ने मेरी कलम में आग भर दी और आज तुम्हारे सामने हूं। तुम भी कलम को अपनी ताकत बनाओ। "
उनके शब्दों ने जादू जैसा असर किया मुझ पर और अपनी कलम का सहारा ले मैंने हेमंत की मां की राख बटोरी और लेखिका संतोष को पूरे हौसले से खड़ा कर लिया।
निदा फ़ाज़ली यारों के यार थे। दोस्ती निभाना जानते थे। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर पर इतने सीधे सरल कि उनसे मुलाकात यादगार बन जाती। वे दोस्तों के चेहरे के हर भाव पढ़ लेते थे इसीलिए वे हर दिल अजीज थे। वैसे तो वे फाजिला के थे जो कश्मीर का एक इलाका है पर ग्वालियर में रहने के बाद मुंबई आ कर बस गए थे ।उनके माता-पिता जो सांप्रदायिक दंगों से तंग आकर पाकिस्तान चले गए थे उनका नाम रखा मुक्तदा हसन लेकिन उन्होंने निदा और अपने इलाके के फाजिला से खुद को निदा फ़ाज़ली कहलाना ज्यादा पसंद किया। निदा का अर्थ है स्वर, आवाज ।अद्भुत शख्सियत थी उनकी। उनके पिता की मृत्यु हुई तो वे उनके जनाजे में शामिल नहीं हुए और उन्हें काव्यात्मक श्रद्धांजलि दी।
तुम्हारी कब्र पर
मैं फ़ातेहा पढ़ने नही आया,
 मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
 तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
 वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता,
 हवा में गिर के टूटा था ।
मेरी आँखे तुम्हारी मंज़रो मे कैद है
 अब तक मैं जो भी देखता हूँ,
 सोचता हूँ वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी
और बद-नामी की दुनिया थी ।
 कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में
 सांस लेते हैं,
 मैं लिखने के लिये
 जब भी कागज कलम उठाता हूं,
 तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं |
 बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
 मेरी आवाज में छुपकर
तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम
मेरी लाचारियों में तुम |
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
 वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
 तुम्हारी कब्र में मैं दफन
तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फ़ातेहा पढने चले आना | 
फिल्मों में एक से बढ़कर एक लाजवाब ,चुटीले गीत जैसे कि 
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता 
होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है 
तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है 
अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए 
लिखने वाले निदा साहब मेरा फोन उठाते ही अपनी ताजा गजल ,कोई गीत या दोहा सुनाकर कहते -"देखो तुम्हारे लिए लिखा है।"
मैं भी सहजता से कहती-" और किस-किस से ऐसा कहा आपने ?"
फिर वही ठहाका -'जासूस हो क्या "
उन्होंने गायिका मालती जी से विवाह किया था और सालों बाद उनके घर उनकी बिटिया तहरीर ने जन्म लिया था। मैं बधाई देने घर पहुंची तो मालती जी से बोले-' "पंडिताइन आई है इसके लिए चाय के साथ घास फूस ले आओ ।"और खुद ही ठहाका लगाने लगे।
8 फरवरी 2016 की वह मनहूस दोपहर ,मैं एक मुशायरे में भाग लेने ट्रेन से चेंबूर जा रही थी तभी मालती जी का मैसेज आया --"निदा साहब नहीं रहे ।दिल का दौरा पड़ने से ....आगे के शब्द धुआँ धुआँ हो गए ।खबर बेतार के तार सी सब ओर फैल गई। "निदा साहब ,आपके जाने से मुम्बई सूनी हो गई। लगता है जैसे मुंबई में अब कुछ रह नहीं गया ।
उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम ना था 
सारा घर ले गया घर छोड़ कर जाने वाला
संतोष श्रीवास्तव की स्मृति से

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यादों के गलियारों से : भवानीप्रसाद मिश्र

बिंदु-बिंदु जोड़कर जिन्होंने समूचा आकाश रच डाला l ऐसे भवानी दादा अर्थात भवानीप्रसाद मिश्र को वर्षों पहले मैंने दिल्ली के लाल किले के कवि मंच पर पहली बार कविता पाठ करते हुए सुना था l वे कह रहे थे :
न, निरापद कोई नहीं है 
न मैं, न तुम, न वे 
कोई है, कोई है, कोई है 
जिसकी जिन्दगी दूध की धोई है 
मंच से उठते स्वर लाल किले की बुलंदियों से टकराते हुए, ऊपर और ऊपर उठते हुए आकाश के विस्तार में समाते जा रहे थे l सचमुच, कौन कह सकता है दावे से, कि उसकी जिन्दगी दूध की धोई है l अपने ‘गीतफरोश’ होने का ऐलान उन्होंने भले ही कितने ही जोर-शोर से किया हो, पर सच तो यह है कि भवानी दादा कविता बेचते नहीं, लुटाते थे l जिस किसी ने भी मांग की, दो शब्द एक पोस्टकार्ड पर लिखकर भेज दिए और वही कविता होती थी l आधी सदी से भी अधिक समय तक निरंतर चलती रही उनकी काव्य-यात्रा l कितनी कविताएँ लिखीं, इसका भान उन्हें भी नहीं  था l आपातकाल में तो हर दिन तीन कविताएँ लिखने का उन्होंने अपना नियम बना लिया था l 
अक्सर मुझसे कहते थे, “इसको मैंने अनुष्ठान के रूप में लिया है – यह मेरी आत्मा का विरोध है आपातकाल के   लिए l” बाद में, इनमे से कुछ कविताएँ ‘त्रिकाल संध्या’ नामक, संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई l 
एक बार मैंने ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के लिए उनसे एक कविता की मांग की l कई दिन हो गए, स्वीकार करने के बावजूद कविता नहीं आई l मैंने दोबारा फोन किया तो बोले, “शीला बहन, बस, एक शब्द पर अटक गया हूं l जैसे ही मिलेगा, कविता पूरी करके भेज दूंगा l”
भवानी दादा ठीक शब्द की तलाश में उसी तरह बेचैन रहते, जैसे किसी लापता बच्चे की तलाश में उसके माता-पिता रहते हैं l किंतु, ऐसा अवसर बहुत कम आता  था l अन्यथा, सही शब्द तो उनकी कविता में क्रमबद्ध रूप से कतार-दर-कतार उतरते चले जाते थे l उनका कहना था :
शब्द टप-टप टपकते हैं फूल से 
सही हो जाते हैं मेरी भूल से 
उनके शब्दों की धार बहुत करारी थी, किन्तु उसके नीचे जाकर किसी शब्द पर खरोंच नहीं आती थी l हर शब्द एक तराशे हुए नग-सा अपनी जगह जड़ा हुआ होता था l उनके इसी भाषा कौशल से चकित होकर किसी समीक्षक ने एक बार लिखा था : ‘यह आदमी कविता ऐसे लिखता है, जैसे रस्सी बुनता हो l’
मैंने भवानी दादा को फोन किया , “दादा, ऐसी सुन्दर कविता की समीक्षा में समीक्षक ने क्या घटिया तंज कसा है !” दादा बोले, “कोई बात नहीं, नहले पर दहला लगाना तो मैं भी जानता हूं शीला बहन ”
कुछ समय बाद ही भवानी दादा का एक और नया संग्रह आया l इस संग्रह का नाम था – ‘बुनी हुई रस्सी’ l भवानी दादा के जाने-माने शिल्प में रस्सी जैसी लयबद्ध कविताएँ l इसी कृति ‘बुनी हुई रस्सी’ को सन १९७२ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया l 
किशोरावस्था में, उनकी प्रसिद्ध कविता ‘गीतफरोश’ की पंक्ति ‘मैं गीत बेचता हूं’ से कवि के प्रति एक लगाव, जो पैदा हुआ था, वह जैसे-जैसे उनको जाना, उनके प्रति आदर और श्रद्धा में बदलता गया l उनके भीतर कविता की कोमल बेल कैसे बढती और फैलती थी, इसका रहस्य केवल वे ही जानते थे l 
एक बार हमारे घर पर करीब दो घंटे उन्होंने लगातार कविता पाठ किया l वह संध्या आज भी मुझे भुलाए नहीं भूलती l गांधीजी में उनकी आस्था उतनी ही प्रबल थी, जितनी ईश्वर में किन्तु, वे व्यथित भी बहुत होते थे यह देखकर कि गाँधी के मूल्यों की ओर देखने की किसी को फुरसत नहीं है l हिन्दी की दुर्दशा से भी वे विचलित हो उठते थे l फिर भी उनके शब्दों में कहीं निराशा की झलक नहीं   थी l वे उदासी के नहीं, पल-पल धड़कती जिन्दगी के कवि थे - जीवन्त कवि थे l उत्साह और उर्जा के कवि थे l आम आदमी के कवि थे l 
ह्रदय में पेसमेकर लगाए वे आयु के समूचे उतरार्द्ध में हैदराबाद, मद्रास, बम्बई और दिल्ली – जैसे महानगरों में रहे किन्तु, मानसिक रूप से वे यहाँ के प्रदुषण-भरे जीवन से सामंजस्य नहीं बिठा पाए थे l एक बार उन्होंने मुझसे कहा था, “शीला बहन, मेरा तन दिल्ली में रहता है किन्तु, मन सतपुड़ा के घने जंगलों, ऊंघते अनमने बियाबानों में घूमता रहता है l इसीलिए अपरिचय के विंध्याचल को समतल करते, नर्मदा की लहरों में डूबते, जब भी मौका मिलता है, मैं दिल्ली छोड़कर उन ग्राम्य अंचलों में पहुँच जाता हूं और वहां से प्राणवायु लेकर लौटता   हूं l”
आदमी के जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं, कोई घटना नहीं, जिसके बारे में उन्होंने न लिखा हो l आज भी जब व्यक्तिगत दुखों के कारण कभी आँखें नम होती है और मन में शून्य-सा महसूस होता है, तब भवानी दादा के स्वर याद आते हैं : 
दर्द जब घिरे बहाना करो
ना ना ना ना ना ना ना करो l 
और मैं दर्द की चादर झटककर उठ खड़ी होती हूं, उनके ही शब्दों से प्रेरणा पाते हुए कि :
कब तक पड़े रहोगे ऐसे 
रत्ती-भर दुख का नशा लिए l
और मैं चल पड़ती हूं दोबारा अपनी कर्मयात्रा पर l 
- शीला झुनझुनवाला की स्मृति से


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धरती के अनुरागी - त्रिलोचन

 आज का गीत-77 
जीवन के अंतिम पड़ाव पर त्रिलोचन जी हरिद्वार की एक सँकरी गलीवाली कालोनी में अपनी वकील बहू के साथ रहने लगे थे। जब तबियत बहुत ख़राब हो गयी ,तो राज्य सरकार ने उन्हें देहरादून के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया। मुझे जब मालूम हुआ,तो सपत्नीक उनसे मिलने गया। देखकर चहक उठे। थोड़ी देर तक मुझसे बातें करने के बाद श्रीमती जी से कहा -'आपसे एक मन की बात कह रहा हूँ। मैं  मछली-भात आपके हाथों का खाना चाहता हूँ । ' देहरादून के अस्पतालों में सामान्यतः रोगी का भोजन अपने घर से ही आता  है। अगले दिन मैं टिफिन कैरियर में मछली-भात आदि  लेकर गया। उन्होंने जिस तल्लीनता  से खाना  खाया ,वह देखने लायक था। जीर्ण-शीर्ण हो गए थे,मगर गहरी आँखों में वही चमक थी। मुझे याद आये ,बनारस के वे दिन ,जब त्रिलोचन जी रथयात्रा के पास रहते थे और पूरे शहर की परिक्रमा पैदल करते थे। उनके संग दो-चार तरुण बालक होते थे ,जो उनके गहन ज्ञान को अवाक होकर सुनते थे।कभी -कभी वे निराला की 'शक्तिपूजा 'भी सुनाते थे। 1970 में पटना के श्रीचन्द्र शर्मा ने अपनी पत्रिका 'स्थापना ' में तीन खण्डों में त्रिलोचन जी केंद्रित विशेषांक निकाले ,जिसमें पीआईबी के अधिकारी,अग्रज  शम्भुनाथ मिश्र (अभिनेता संजय मिश्र के पिता ) के कहने पर मैंने भी त्रिलोचन जी पर विशद लेख लिखा था। उस समय तक उनकी तीन पुस्तकें ही उपलब्ध थीं- धरती, गुलाब और बुलबुल और दिगन्त। इनमें 'धरती' में उनके गीत थे ,जो यह दर्शाते थे कि मूलतः त्रिलोचन जी लोकधर्मी गीतकार थे। (“धरती ”के गीतों के अनुसरण में  शिवप्रसाद सिंह, त्रिभुवन सिंह, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह,शुकदेव सिंह ने भी बेजान -से  गीत लिखे थे )।  फिर उन्होंने अंग्रेजी छन्द सॉनेट पर सवारी करना शुरू किया और 'सॉनेट सम्राट ' कहलाकर माने । 1972 में वे 'जनवार्ता ' दैनिक में और मैं 'आज' दैनिक में कार्यरत हुआ । दोनों कार्यालय आसपास थे,इसलिए अक्सर वे शाम को 'आज' आ जाते थे। फिर दिल्ली विश्वविद्यालय की हिंदी-उर्दू कोश योजना में काम करने दिल्ली चले गये और वहां से सागर विश्वविद्यालय चले गए ,मुक्तिबोध सृजनपीठ के अध्यक्ष होकर। कलकत्ता में जब उनके सुपुत्र अमित प्रकाश पत्रकार बनकर आये,तो बीच-बीच में त्रिलोचन जी कलकत्ता भी आते रहे और हमारी भेंट होती रही।  । बनारस में जब थे.तो गोदौलिया चौराहे से सटी  पत्रिका की दुकान पर शाम को मिल जाया करते थे। 1972 में जब 'धर्मयुग'में मेरा 'जाल फेंक रे मछेरे ' गीत छपा ,तो बधाई देने मेरे आवास ( काली मंदिर ) आये थे और बताया कि इसकी पंक्तियों को सीधे न लिखकर तोड़कर लिखना था। त्रिलोचन जी वाक्यों की एक पंक्ति से दूसरी पंक्ति में ओवरलैपिंग को बहुत  अच्छा मानते थे। उनके सॉनेट में इसे खूब देखा जा सकता है। उनका एक संग्रह है-उस जनपद का कवि हूँ। वे शब्दकोश के निर्माण से जुड़े थे,इसलिए शब्द की सूक्ष्म  परख उन्हें थी। अपने जिले को वे सुल्तानपुर न कहकर 'सुल्ताँपुर' कहते थे। खाँटी अवधी का भरपूर  प्रयोग करते थे, खड़ी बोली में भी। 'ताप के ताये हुए दिन '(साहित्य अकादमी पुरस्कृत ) में ताये शब्द गाँव से ही लाये थे। उनका जन्म चिरानी पट्टी गाँव के मध्यवर्गीय किसान परिवार में अगस्त ,1917 में हुआ था। मूल नाम वासुदेव सिंह था। वे संभवतः काशी विद्यापीठ से स्नातक (शास्त्री ) थे। लेकिन स्वाध्याय से उन्होंने हिंदी, उर्दू, संस्कृत ,अंग्रेजी और पाली-प्राकृत का ठोस ज्ञान प्राप्त कर लिया था। त्रिलोचन जी के गीतों में चिरानी पट्टी गाँव का लोकतत्व और काशी का काव्य-चिन्तन उभरकर आया। दिसम्बर ,2007 में उनके निधन से हिंदी ने एक ऐसा मस्तमौला कवि खो दिया ,जो हमेशा चर्चाओं की लहर पैदा कर उसका अकेले आनन्द लिया करता था। ऐसा वही कर सकता है ,जिसका लोकजीवन की गीत-धर्मिता से गहरा जुड़ाव हो।  त्रिलोचन जी की काव्यात्मा को इन दो पंक्तियों में समझा जा सकता है - 
 मुझमें जीवन की लय जागी
मैं धरती का हूँ अनुरागी।”    
-- बुद्धिनाथ मिश्र 
*****
आग दिन की  
बढ़ रही क्षण क्षण शिखाएं
दमकते अब पेड़-पल्‍लव
उठ पड़ा देखो विहग-रव
गये सोते जाग
बादलों में लग गई है आग दिन की। 
पूर्व की चादर गई जल
जो सितारों से छपाई
दिवा आई दिवा आई
कर्म का ले राग
बादलों में लग गई है आग दिन की। 
जो कमाया जो गंवाया
छोड़, उसका छोड़ सपना
और कर-बल, प्राण अपना
आज का दिन भाग
बादलों में लग गई है आग दिन की। 
वास तज कर विचरते पशु
विहग उड़ते पर पसारे
नील नभ में मेघ हारे
भूमि स्‍वर्ण पराग
बादलों में लग गई है आग दिन की। 
@ त्रिलोचन शास्त्री




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मंगलवार, 4 जुलाई 2023

सीधे सरल निष्कपट बाबा नागार्जुन

 एक बार हापुड़ में त्रिदिवसीय जनवादी लेखक संघ की गोष्ठी थी 

बाबा नागार्जुन भी आए हुए थे तो एक दिन दोपहर के खाने के बाद हमसे बोले " चलो सुरेन्द्र पान खाया जाए " 

हमने कहा " चलिए "

थोड़ी दूर चलने के बाद हमने कहा कि " बाबा वो देखिए पान की दुकान " उन्होंने दुकान देखी और बोले " यहाँ नहीं आगे चलते हैं "

आगे बढ़े फिर एक दुकान दीखी हमने कहा कि 

" बाबा ये एक और दुकान " 

उन्होंने दुकान देखी और बोले 

" यहाँ नहीं आगे चलते हैं " 

आगे बढ़े इस तरह से कई दुकान छोड़ते गए काफ़ी दूर चलने के बाद एक दुकान पर रुके और बोले " यहाँ खाते हैं " फिर कुछ देर तक वहाँ खड़े रहे वहाँ पान खाकर वापस आए हमने रास्ते में पूछा कि " बाबा इतनी दुकान छोड़ने के बाद उस दुकान पर ही पान क्यों खाया तो बोले 

" उस दुकान पर शीशा था पान खाकर अगर रचे हुए होठ शीशे में न देखे जाएँ तो पान खाने का मज़ा ही क्या है " 

ऐसे थे हमारे सीधे सरल निष्कपट बाबा।

-सुरेंद्र सुकुमार की स्मृति से


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रविवार, 2 जुलाई 2023

मुरादाबाद से भी गहरा नाता रहा था बाबा नागार्जुन का

 सहज जीवन के चितेरे, शब्दों के अनूठे चित्रकार, प्रकृति प्रेमी जनकवि बाबा नागार्जुन का मुरादाबाद से विशेष लगाव रहा है। अक्सर गर्मियों के तपते दिन वह  लैंस डाउन और जहरी खाल की हरी भरी उपत्यकाओं में बिताते रहे हैं। वहां की हरियाली,घुमावदार सड़कें, चेरापूंजी जैसी बारिश और साहित्यकार वाचस्पति का स्नेह उन्हें हर साल वहां खींच लाता था तो मुरादाबाद भी वह आना नहीं भूलते थे। यहां प्रसिद्ध साहित्यकार माहेश्वर तिवारी और हिन्दू कालेज के सेवानिवृत्त प्रवक्ता डॉ डी. पी. सिंह -डॉ माधुरी सिंह के यहाँ रहते। उनके परिवार के साथ घंटों बैठकर बतियाते रहते। पता ही नहीं चलता था समय कब बीत जाता था।   साहित्य से लेकर मौजूदा राजनीति तक चर्चा चलती रहती और उनकी खिलखिलाहट पूरे घर में गूंजती रहती । मुरादाबाद प्रवास के दौरान वह सदैव सम्मान समारोह, गोष्ठियों से परहेज करते रहते थे। 

    वर्ष 91  का महीना था बाबा, माहेश्वर तिवारी के यहां रह रहे थे। महानगर के तमाम साहित्यकारों ने उनसे अनुरोध किया कि वह अपने सम्मान में गोष्ठी  की अनुमति दे दें लेकिन वह तैयार नहीं हुए। वहीं साहित्यिक संस्था "कविता गांव की ओर"  के संयोजक राकेश शर्मा जो पोलियो ग्रस्त थे, बाबा के पास पहुंचे, परम आशीर्वाद लिया । बाबा देर तक उनसे बतियाते रहे. बातचीत के दौरान राकेश ने बाबा से उनके सम्मान में एक गोष्ठी का आयोजन करने को अनुमति मांगी। बाबा ने सहर्ष ही उन्हें अनुमति दे दी। 

      अखबार वालों से वह दूर ही रहते थे । पता चल जाये कि अमुक पत्रकार उनसे मिलने आया है तो वह साफ मना कर देते। स्थानीय साहित्यकारों से वह जरूर मिलते थे, बतियाते बतियाते यह भी कह देते थे बहुत हो गया अब जाओ ।दाएं हाथ में पढ़ने का लैंस लेकर अखबार पढ़ने बैठ जाते थे और शुरू कर देते थे खबरों पर टिप्पणी करना।

    वर्ष 1992 में जब  बाबा यहां आए तो उस समय यहां कृषि एवं प्रौद्योगिक प्रदर्शनी चल रही थी। छह जून को के.सी. एम. स्कूल में कवि सम्मेलन था । बाबा ने एक के बाद एक, कई रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कवि सम्मेलन जब खत्म हुआ तो वह चलते समय वहाँ व्यवस्था को तैनात पुलिस कर्मियों के पास ठहर गये और लगे उनसे बतियाने। ऐसा अलमस्त व्यक्तित्व था बाबा का। वह सहजता के साथ पारिवारिकता से जुड़ जाते थे। 

    बच्चों के बीच बच्चा बनकर उनके साथ घंटों खेलते रहना उनके व्यक्तित्व का निराला रूप दिखाता था। डॉ माधुरी सिंह अपने दीनदयाल नगर स्थित आवास पर बच्चों का एक स्कूल टैगोर विद्यापीठ संचालित करती थीं। बाबा जब वहां गए तो बैठ गए बच्चों के बीच और बाल सुलभ क्रीड़ाएं करते हुए उन्हें अपनी कविताएं सुनाने लगे । बच्चों के बीच बाबा , अद्भुत और अविस्मरणीय पल थे। 

     बाबा जब कभी मुरादाबाद आते, मेरा अधिकांश समय उनके साथ ही व्यतीत होता था। अनेक यादें उनके साथ जुड़ी हुई हैं। वर्ष 1998 में इस नश्वर शरीर को त्यागने से लगभग छह माह पूर्व ही  वह दिल्ली से यहां यहां आए थे । कुछ दिन यहां रहने के बाद वह काशीपुर चले गए थे ।

     

डॉ मनोज रस्तोगी की स्मृति से



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कृष्णा सोबती जी की सहृदयता

 कृष्णा सोबती की बात हो रही है तो मुझे एक प्रसंग याद  आया । दो दशक पहले मैं मराठवाडा विश्वविद्यालय , औरंगाबाद की एक छात्रा का पीएच. डी मौखिकी (viva- voce ) के लिए गयी थी  । विषय कृष्णा सोबती जी के उपन्यासों के संदर्भ में था  । मौखिकी हो गयी  । मैं छात्रा के काम से प्रभावित हुई थी । भोजन भी हो गया था  । मैं गेस्ट हाउस जाने ही वाली थी , वह छात्रा भागती मोबाइल लेकर आयी । उसने मोबाइल को हथेली में दबा कर रखा और कहा कि कृष्णा सोबती जी मुझसे बात करना चाहती हैं  । मैं ने मोबाइल लिया और उन से बात करने लगी  । उन्होंने छात्रा के शोधकार्य के बारे में पूछा और लगातार उन की उत्सुकता को महसूस कर रही थी  । उन्होंने मेरेी प्रश्नावली के बारे में पूछा । वे खुश थीं - छात्रा की मौखिकी के बारे में मेरे विचार जान कर । उन्होंने कहा कि छात्रा लगातार उनके साथ अपने विषय के बारे में चर्चा करती थी   मौखिकी के बाद भी फ़ोन किया तो  मुझ (परीक्षक ) से बात करने का मन हुआ । उस के बाद मेरे बारे में भी जानना चाहा  । बात हो कर इतना समय हो गया  । फिर शब्दशः याद है  । किसी विश्वविद्यालय की छात्रा को उन्होंने समय दिया , दिशा निर्देश दिया साथ ही इतना ममत्व दिया । उस दिन शोध छात्रा अभिभूत थी  । शोध कार्य के दौरान उन के साथ वार्तालाप को साझा कर रही थी  । ऐसा नहीं था कि  उन पर पहला शोध था  । दर्जनों शोधकार्य  तब तक हो चुके थे  । फिर भी उस छात्रा के प्रति कृष्णा सोबती जी का वात्सल्य के बारे में  सुन कर उनके गरिमामय व्यक्तित्व का आभास हुआ  था  । व्यक्तिगत परिचय हमारे लिए नामुमकिन है  । इस तरह अद्भुत क्षणों के साथ साहित्यकारों को जानने अवसर मिलता है ।  इस से युवाओं को महान् व्यक्तित्व के पास जाने का साहस मिलता है । 

 - प्रो. माणिक्यम्बा "मणि" की स्मृति से


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