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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

साहित्यकार के स्वाभिमान के प्रतीक थे धूमिल

वरिष्ठ कथाकार काशी नाथ सिंह से वेंकटेश कुमार की बातचीत


धूमिल के बारे में आपने लिखा है- 'गद्यकार होने के कारण मैं उसके रास्ते में नहीं था। अगर मैं कविताएं लिखता तो शायद यह दोस्ती न चलती।' क्या सच में धूमिल में ऐसी ग्रंथि थी कि वे अपने आगे किसी कवि को देखना ही नहीं चाहते थे? राजकमल चौधरी पर तो धूमिल की कविता अद्भुत है।

इसे ग्रंथि मत कहो। ग्रंथि तो बाद में आयी। संयोग यह है कि धूमिल की जो पहली रचना छपी, वह कहानी थी। वह 'कल्पना' पत्रिका में आयी थी। तब तक धूमिल को हम जानते नहीं थे। वह ऐसी कहानी नहीं थी कि लोगों का ध्यान आकृष्ट करती। नयी कहानी के जाने-माने कहानीकार थे शिवप्रसाद सिंह। हो सकता है कि शिवप्रसाद जी के संपर्क में आने से धूमिल के मन में कहानी लिखने का विचार आया हो। बाद में उन्होंने शिवप्रसाद सिंह का साथ लगभग छोड़ सा दिया। इसके बाद धूमिल का संपर्क रामचंद्र शुक्ल नाम के एक चित्रकार से हुआ, जो बनारस के ही बी.एड. कॉलेज में पेंटिंग पढ़ाते थे। रामचंद्र शुक्ल कविताएं भी लिखते थे। उनके अलावा बनारस में गोविंद मित्र, मोहनराज शर्मा और नागानंद मुक्तकंठ नाम के कुछ कवियों से धूमिल का संपर्क रहा। इनसे भी वे धीरे-धीरे अलग हो गए।

राजकमल चौधरी अकवितावादियों से प्रभावित थे। राजकमल जब कलकत्ता में थे तो उनका एक संग्रह प्रकाशित हुआ था - 'कंकावती' शीर्षक से, इस संग्रह की कविताएं अकवितावादियों से भिन्न थीं। यह संग्रह धूमिल ने पढ़ा था। उस समय इस संग्रह की खूब चर्चा हुई थी। राजकमल चौधरी बनारस आते रहते थे। उन दिनों बनारस में जनसंपर्क अधिकारी थे शंभुनाथ मिश्र, जो पटना के रहनेवाले थे। राजकमल चौधरी जब बनारस आते थे तो शंभुनाथ मिश्र के यहां ठहरते थे। राजकमल चौधरी से धूमिल का कोई परिचय नहीं था। राजकमल चौधरी एक बार आए थे तो किसी के घर पर उनके कविता-पाठ का आयोजन किया गया था। उसमें धूमिल, मैं और नामवर सिंह भी शामिल हुए थे। धूमिल राजकमल को एक बड़ा कवि मानते थे। धूमिल में एक विद्यार्थी की तरह कविता सीखने-समझने की बेचैनी थी। धूमिल पढ़े-लिखे कम थे। इंटर भी नहीं कर सके थे। लेकिन शब्दकोश की मदद से अंग्रेजी पढ़ते और अपने पड़ोसी नागानंद से अंग्रेजी सीखते थे। दरअसल धूमिल ने अंग्रेजी कविताओं को पढ़ने के लिए ही अंग्रेजी पढ़ना और सीखना शुरू किया। इसके बाद उनमें यह क्षमता पैदा हुई कि वे खुद से अंग्रेजी पढ़ और थोड़ा-बहुत बोल भी सके।

सुदामा पांडे ने अपना नाम 'धूमिल ' क्यों रखा?

एक बार मैंने यों ही उनसे पूछा था कि 'धूमिल' नाम तुमने क्यों रखा? तो मुझे पता चला कि बनारस में सुदामा तिवारी नाम के एक कवि थे, आज भी हैं। वे अपना नाम सुदामा तिवारी की जगह सांड़ बनारसी लिखते हैं। हास्य रस के कवि हैं। धूमिल को लगता था कि सुदामा तिवारी और सुदामा पांडे में लोगों के बीच भ्रम पैदा हो रहा है। तो एक तो धूमिल को अपना नाम इस वजह से बदलना पड़ा। अब 'धूमिल' क्यों रखा, इसका पता बाद में चला कि उनके बाबा- यानी पिताजी के पिताजी, जयशंकर प्रसाद के यहां नौकरी करते थे। जयशंकर प्रसाद ने अपने बेटे का नाम रत्नशंकर रखा था और धूमिल ने भी इसी प्रभाव में अपने बेटे का नाम रत्नशंकर रखा। मेरा खयाल है कि कविता लिखने का संस्कार धूमिल को जयशंकर प्रसाद के घराने से पुश्तैनी संबंध के कारण मिला। जयशंकर प्रसाद छायावादी कवि थे और हम देख सकते हैं कि 'धूमिल नाम में भी छायावादी तत्व है।

कुछ साहित्यकारों का यह कहना है कि नामवर जी ने धूमिल का इस्तेमाल किया, बनारस में धूमिल नामवर के 'लठैत' थे?

नामवर के विरोधी ऐसा कहते हैं। न तो इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति नामवर में पहले कभी थी और न आज है। इस मामले में वे हमेशा सचेत रहे हैं। धूमिल तो बहुत एलर्ट रहता था, इस चीज को लेकर कि जिस आदमी से वह मिल रहा है वह उसका इस्तेमाल तो नहीं कर रहा। धूमिल के अंदर स्वाभिमान था। उन्हें उनके आक्रामक रुख के कारण 'लठैत' कहा जाता है। लेकिन यह बात सच है कि नामवर के विरुद्ध धूमिल कुछ सुन नहीं सकते थे। और उस समय बनारस का पूरा वातावरण नामवर-विरोधी था । धूमिल ने भारत-चीन युद्ध पर लिखी हुई नामवर की कविता पढ़ी थी। इसके अलावा 'ज्ञानोदय' में नामवर का जो स्तंभ छपता था - 'नयी कविता पर क्षण भर' उसे भी धूमिल पढ़ते थे। इस स्तंभ में एक बार नामवर ने धूमिल की चर्चा की थी। इसके बाद धूमिल को लगा कि नामवर सिंह से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। धूमिल में सौखने की प्रवृत्ति बहुत प्रबल थी जिस किताब का बातचीत में नामवर सिंह जिक्र करते उस किताब को उपलब्ध करके धूमिल पढ़ जाते। 'संसद से सड़क तक' में जो पंक्ति है- 'एक सही कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य होती है'- यह नामवर का वाक्य है। 'नदी कविता पर क्षण भर' स्तंभ में लिखा था नामवर ने। यदि धूमिल को लगता कि नामवर उनका इस्तेमाल कर रहे हैं तो वे उन्हें छोड़ देते। दरअसल धूमिल बनारस में साहित्यकार के स्वाभिमान के प्रतीक थे। किसी कवि या लेखक में जब वे ओछापन देखते थे तो वे उसके खिलाफ हो जाते थे। उनका कहना था कि लेखक या कवि जब लोगों के बीच आए तो सामान्य हरकत न करे। जैसे यदि किसी के साथ अन्याय हो रहा है या किसी को परेशान किया जा रहा है तो तुरंत इसका विरोध करना चाहिए। 

आपने अपने एक लेख में लिखा है- 'मैंने कहा- हिंदी कविता में कोई मजबूत चरित्र नहीं है और उसने लिखा- मोचीराम!' क्या मोचीराम वास्तव में कोई व्यक्ति थे, जिन पर धूमिल ने यह कविता लिखी?

अस्सी पर एक मोची बैठता था। उसका नाम अभी याद नहीं आ रहा। उसके यहां हम लोग अपना चप्पल-जूता मरम्मत करवाते थे। उससे धूमिल बातचीत करते थे, पैसा भी कुछ ज्यादा दे देते थे। लेकिन ‘मोचीराम' कोई एक मोची नहीं है। यह मोची उनके ध्यान में रहा होगा। चौक पर भी एक मोची बैठता था। दरअसल धूमिल में चीजों के प्रति आक्रोश का भाव था और वह उसे प्रकट भी करता था। इस मोची से भी धूमिल बातचीत करते रहते थे। मेरा खयाल है कि मोचीराम का मोची यही है। वैसे देखा जाए तो कविता में 'मोचीराम' को एक कल्पित चरित्र कहना ही उचित होगा।


आपको यह कविता अच्छी लगती है?

हाँ, यह कविता मुझे बहुत पसंद है। धूमिल भी इस कविता को लेकर बहुत खुश रहते थे। इस कविता के माध्यम से 'महंगू महंगा रहा है' जैसा चरित्र आया। मैंने शायद कहीं लिखा है कि धूमिल की स्थिति यह थी कि उन्हें मॉडल आप दे दीजिए, किसी भी कविता का मॉडल। धूमिल उस मॉडल से बेहतर करने की कोशिश बराबर करते थे। धूमिल के सामने निराला की वे कविताएं थीं जो 'नये पत्ते' संग्रह में हैं। जब हम लोग बातचीत कर रहे थे धूमिल ने माना कि निराला ने जो चरित्र दिया वैसा अब हिंदी कविता में दिखायी नहीं देता। उनको लगा कि यह काम करना चाहिए और उन्होंने 'मोचीराम' लिखा।



आपने लिखा है कि 'धूमिल के आने तक आलोचना का मुंह कहानी की ओर था। वह आया और उसने आलोचना का मुंह कविता की ओर कर दिया। अपनी ओर कर लिया।’  लेकिन इसी लेख में आपने यह भी लिखा है,  'नामवर सिंह की  'कविता के नये प्रतिमान' नाम की पुस्तक आई, वह (धूमिल) नामवर से शिकायत के साथ मिला और कहा कि आपने फिर उन्हीं लोगों को लिया है जिनपर पिछले पंद्रह सालों से लिखते रहे हैं। हम उम्मीद कर रहे थे कि अब की बार हम होंगे।’ आलोचना' के धूमिल केंद्रित अंक में भी किसी बड़े आलोचक ने नहीं लिखा।  फिर कैसे माना जाए कि ‘धूमिल’ ने आलोचना का मुंह अपनी ओर  कर लिया?


इसमें तो किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि 1950 के बाद सारी बातें कहानी पर हो रही थीं। आलोचना के क्षेत्र में कहानी आ गई थी। इसका श्रेय कहानियों को तो है ही,  कहानी के आलोचक नामवर सिंह, देवीशंकर अवस्थी, धनंजय वर्मा आदि को भी है।कविता पर लिखना छोड़ दिया था नामवर सिंह ने। सन् 1960 के बाद शुरू किया था  'नयी कविता पर क्षण भर'। क्योंकि कविता के कई रूप आ गए थे। उस समय अकविता, नयी कविता, सहज कविता, सूर्योदयी कविता, भूखी पीढ़ी की कविता आदि थीं। इसके पहले कविता में प्रवृत्तियां दिखायी पड़ती हैं छायावाद, प्रगतिवाद आदि। लेकिन सन् 1960 के बाद ऐसा नहीं रहा। चार-पांच कवि मिल गए और वहीं  एक आंदोलन खड़ा कर दिया अपने नाम पर। लेकिन जो ईमानदार कवि थे वे इससे बाहर निकलना चाहते थे। धूमिल में अपने को अलग दिखने की बेचैनी और छटपटाहट थी। धूमिल का हस्ताक्षर सबसे अलग हो, धूमिल के भीतर यह तड़प थी। जलूस या मजमे में शामिल होने से धूमिल ने मना कर दिया। उन दिनों धूमिल मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में' और ‘राजकमल चौधरी की 'मुक्ति प्रसंग' जैसी कविताएं पढ़ रहे थे। सौमित्र मोहन, मलयराज चौधरी और समीर राय चौधरी की कविताएं भी वे पढ़ रहे थे। ये कविताएं वे अपने लिए रास्ता निकालने के लिए पढ़ रहे थे। चूंकि धूमिल सीधे-सीधे गांव से जुड़े हुए थे। घर के के मालिक वही थे और खेती-बाड़ी करवाते थे। धूमिल की नौकरी छोटी थी। घर का खर्च चलाने के लिए यह सब करना पड़ता था उन्हें। कहानी में तो गांव था लेकिन कविता में गांव नहीं था। गाँव से सम्बंधित प्रगतिशील कवि थे - नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन आदि। ये लोग किसानों-मज़दूरों के बारे में लिख रहे थे लेकिन धूमिल का कहना था कि सीधे-साधे गाँव से इनका परिचय नहीं है, या है भी तो वे गाँव के बारे में नहीं लिख रहे हैं। मार्क्सवादियों की किसानों-मजदूरों के जो बनी-बनायी धारणा है, वही धारणा ये लोग अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त कर रहे हैं। स्वाभाविक रूप से धूमिल को लगा कि शहर छोड़कर सीधे गांव की कविता लिखा जाए तो कविता में वह नयी चीज होगी, जिधर किसी कवि का ध्यान नहीं जा रहा। इस प्रकार धूमिल ने गांव पर कविताएं लिखनी शुरू कीं। उनकी आरंभिक कविताएं 'जनमत', 'आरंभ' और 'संभावना' जैसी पत्रिकाओं में छपीं और फिर 'आलोचना' में आती रहीं। इस तरह से कवियों, आलोचकों और पाठकों का ध्यान इनकी कविताओं की ओर गया कि एक नए तरह का कवि आया है, जो उस जिंदगी के बारे में लिख रहा है जिससे कविता अछूती थी। इस प्रकार सन् 1967-68 तक देखते- देखते धूमिल अपने समय के शीर्षस्थ कवि हो गए। अब आलोचकों की जहां तक बात है तो नामवर जी धूमिल को छाप रहे थे, चर्चा कर रहे थे। लेकिन 'कविता के नये प्रतिमान' में नामवर के सामने सवाल दूसरे थे। धूमिल ने यह नहीं समझा कि प्रतिमान की बात हो रही है और यह किताब छायावादी कवियों पर केंद्रित है। जो कविताएं लिखी जा रही थीं वह नामवर की इस किताब का विषय थी ही नहीं। इसलिए नामवर ने इन लोगों का जिक्र करके छोड़ दिया। लेकिन धूमिल की महत्वाकांक्षाएं बहुत बढ़ गयी थीं। इसलिए वे इसे नहीं समझ सके। 'नयी कविता पर क्षण भर' शीर्षक अपने स्तम्भ की संभवतः अंतिम किस्त में नामवर ने धूमिल का जिक्र किया था। इससे धूमिल को लगा कि अगली बार नामवर जी मुझ पर ही लिखेंगे। जहां तक बाद के आलोचकों का सवाल है तो उनके अपने-अपने कवि थे, अपने-अपने पसंद के लोग थे।

धूमिल की कविताओं पर आलोचकों द्वारा कलम न चलाए जाने की क्या वजह हो सकती है?

बहुत से लोग यह मानते थे कि कविता संवेदना की चीज है विचार की नहीं। धूमिल की कविताओं में संवेदना नहीं विचार थे। तो इससे आलोचक अपना मेल नहीं बैठा पा रहे थे। एक तो यह बात हो सकती है, और दूसरे यह कि कविता की भाषा में जिस तरह की सरलता, सहजता या लालित्य जैसी चीज होती है उसका धूमिल की कविताओं में अभाव था। धूमिल की कविताओं में धूल-धक्कड़ जैसी चीज ज्यादा थी।

जिसे लट्ठमार भाषा कहते हैं। सवारखमानी......

हां, जिसे सवारवमानी कहा जाता है। साफ-साफ दो टूक कहना। हो सकता है कि कविता को लेकर आलोचक की जो समझ थी, उससे यह मेल न खाता हो।

मार्क्सवाद के बारे में धूमिल क्या सोचते थे, इस पर शायद न धूमिल ने लिखा है और न ही धूमिल के आलोचकों ने। लेकिन धूमिल क्रांति के बारे में क्या सोचते थे, इसका पता उनकी एक कविता देती है- 'क्रांति'....

धूमिल ने स्टडी सर्किल या मार्क्सवाद के ग्रंथों से मार्क्सवाद नहीं सीखा था। उन्होंने मार्क्सवाद के ग्रंथों का विधिवत अध्ययन भी नहीं किया था। उनकी मार्क्सवाद के बारे में जो कुछ जानकारी थी, वह संगत से थी। जैसे चंद्रबली सिंह थे, त्रिलोचन थे। मेरा खयाल है कि नामवर जब तक बनारस में रहे तब तक धूमिल का संग नामवर के साथ बना रहा। सीपीएम या सीपीआई के जो होलटाइमर थे, उनसे भी चाय की दुकानों में या कहीं भी भेंट होती रहती थी उनकी। धूमिल किसानों के जीवन संघर्ष या लोकतंत्र के योद्धा कवि के रूप में जाने जाते थे। इस वजह से भी मार्क्सवाद की ओर धूमिल का आकर्षित होना स्वाभाविक था । हमें इतना याद है कि पार्टी तो मैंने भी कभी ज्वॉइन नहीं की, लेकिन चुनाव जब भी होता था, सीपीआई के कैंडिडेट के लिए धूमिल और मैं साथ-साथ प्रचार करते थे, साइकिल से। सीताराम सिंह सीपीएम के एमपी हुए थे, उनका भी चुनाव प्रचार हम लोगों ने किया था। तो एक तो सहज किसानों की जिंदगी, गांव के संघर्ष से परिचित रहने वाले और उस जमीन की कविता लिखने वाले आदमी को मार्क्सवादी होने के लिए मार्क्सवादी सिद्धांतों को ठीक से समझना बहुत आवश्यक नहीं है। बराबरी में जो भी विश्वास करता है, जाति-विरोध में जो भी विश्वास करता है वह मार्क्सवाद से तो जुड़ ही गया। अपने सामंती संस्कारों से लड़ने वाले किसी भी व्यक्ति का रुझान मार्क्सवाद की ओर होगा ही एक बात और - उन्हीं दिनों नक्सलवादी आंदोलन हुआ था। तो नक्सलवादियों से भी धूमिल के संबंध थे। बनारस में रहने वाले नक्सलाइट ग्रुप के वे संपर्क में थे। लेकिन असहमतियों के भी ढेर सारे मुद्दे थे। लेकिन जो मार्क्सवादी हो और यह देख रहा हो कि काम मार्क्सवाद के उलट हो रहा है, तो विक्षोभ स्वाभाविक है। इस तरह के विक्षोभ धूमिल की कविताओं में देखे जा सकते हैं। इसलिए इनकी कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा भी लगता है कि वे एनारकिस्ट थे, सारी चीजों को तोड़ देना चाहते थे, उथल-पुथल मचा देना चाहते थे। कहीं-कहीं अंध किस्म का दिशाहीन गुस्सा जैसा भी दिखाई पड़ता है उनके यहां। लेकिन इसे धूमिल की पूरी विचारधारा पर लागू करना ठीक नहीं रहेगा क्योंकि ऐसे भाव उनकी कविताओ में कहीं-कहीं आते हैं। क्रांति करने वाले खाते-पीते लोग थे। ऐसे लोग जब क्रांति की बात करते थे तो हंसी आती थी। धूमिल को लगता था कि ऐसे खाते-पीते लोग हमारी तकलीफ क्या जानें। यह 'असंग लोग ' क्रांतिकारियों के लिए धूमिल ने इस्तेमाल किया मुश्किलों और संघर्षों से असंग लोग ।

मैं धूमिल को एक बार फिर उद्धृत कर रहा हूं। इस बार उनके लेख का एक टुकड़ा- 'युवा लेखन अपना काम कर रहा हैं। पत्रिकाओं में और किताबों में, पाठ्यक्रमों में संठ होने की जगह वह तेजी से 'जरूरी जनता' के हाथों तक उनकी जुबान तक पहुंच रहा है। नये आंकड़े से तुलना करो तो पता चले कि युवा लेखन संबंधी लोगों का दस्ता कितना बड़ा है और किस तरह तेजी से बढ़ रहा है और यह पर्दानसीन साहित्यिक चोंचलेबाजी....नाश हो इसका इसका खात्मा जरूरी है जो शुरू हो चुका है।' धूमिल किस पर्दानसीन साहित्यिक चोंचलेबजी के होने की बात कर रहे थे?


'पर्दानसीन साहित्यिक चोंचलेबाजी' यह कुलीन ढंग से कविता लिखने वाले या भ्रष्ट लोगों की कविता लिखने वालों के लिए हैं। धूमिल का मानना था कि ये चीजें खत्म हो जाएंगी। खासतौर से जो परिमली सोच के, या अज्ञेय की तरह के लोग हैं। यानी जिन्हें किसी तरह की तकलीफ़ नहीं है, सुखी जीवन जीने वाले जो लोग हैं, एसी में बैठने वाले लोग हैं, ऐसे ही लोगों की ओर धूमिल ने संकेत किया है कि इनका खात्मा होगा


धूमिल के लिए शहर और गांव के क्या मायने थे? गांव में अपने पड़ोसी से मुकदमा लड़ते हुए धूमिल की जिंदगी बीत गई। जब उनका देहांत हुआ तो उस समय भी उन पर बारह मुकदमे दर्ज हुए थे। जाहिर है कि गांव उनके लिए कोई स्वर्ग नहीं था। लेकिन शहर को लेकर ऐसी विरक्ति क्यों थी उनके मन में? अशोक वाजपेयी के कविता-संग्रह 'शहर अब भी संभावना है' का क्या विज्ञापन देखकर क्रोधित होते हुए धूमिल ने आपसे कहा कि हम समझते थे कि यह अपना आदमी है, लेकिन यह तो कहता है कि 'शहर अब भी संभावना है'..... शहर संभावना नहीं फ्रंट है। यहां सवाल यह भी उठता है कि धूमिल अशोक वाजपेयी को अपना आदमी क्यों समझ रहे थे?


धूमिल को लगता था कि शहर ही किसानों के शोषण का जिम्मेदार है। शहर में भी वैसे ही गरीब हैं जैसे गांव में हैं- उसे धूमिल नहीं देख पाते थे। वे एक सामान्यीकरण सा कर देते थे। अगर व्यवस्थित रूप से वे मार्क्सवादी होते तो वर्गों के आधार पर देख सकते थे कि शोषित होने वाला वर्ग शहर में भी है लेकिन वे गांव बनाम शहर देखने लगते थे। उनको लगता था कि शहर गांव को खरीद रहा है। गांव मेहनत कर रहा है और उसका फायदा शहर उठा रहा है। शहर उनके लिए एक व्यक्ति की तरह था। शहर में कितने क्लास होते हैं इन सब चीजों को वे नहीं देखते थे। अशोक वाजपेयी से बड़े अच्छे संबंध थे धूमिल के। सीधी में अशोक जब कलैक्टर थे तो महीने में एक दिन बनारस आ जाया करते थे हमसे मिलते थे, धूमिल से मिलते थे। धूमिल के साथ रहते थे। अशोक पसंद करते थे धूमिल को। सन् 1970-71 के आसपास सीधी से अशोक ने 'पहचान' सीरिज का जो पहला आयोजन किया था उसमें हम और धूमिल साथ ही गए थे। धूमिल एक तरह से गांव के किसानों के 'दुखों और संघर्षों के प्रवक्ता के रूप में खुद को देखते थे। और उसी हैसियत से शहर संभावना नहीं फ्रंट है कहा भी।


स्त्रियों के बारे में कैसे ख़यालात रखते थे धूमिल? अपनी पत्नी या प्रेमिका के बारे में कुछ बात करते थे आपसे? धूमिल अपनी कविताओं में स्त्री-छवि का अजीबोगरीब इस्तेमाल करते हैं- 'उसने जाना कि हर लड़की तीसरे गर्भपात के बाद/धर्मशाला हो जाती है और कविता/हर तीसरे पाठ के बाद'। गर्भाधान और गर्भपात धूमिल की कविताओं में खूब आते हैं। क्या वजह है इसकी?

लगभग आठ-दस साल तक हम लोगों की दोस्ती रही। धूमिल ने किसी लड़की से प्रेम किया, मुझे नहीं मालूम। दूसरे शहर या गांव में किसी लड़की में उनकी दिलचस्पी पैदा हुई यह भी मैंने नहीं देखा। तीसरे, चूंकि उनकी पत्नी घर की मालकिन थी इसलिए कहीं भी धूमिल का स्थानांतरण हुआ हो, उनकी पत्नी कभी उनके साथ नहीं रही। मेरी जानकारी में एक बार उन्होंने मुझे बताया कि पंडिताइन आई हुई हैं, हम मिलवाएंगे उनसे। जब मैं पहुंचा तो बताया कि देर कर दिया तुमने वो गांव चली गयीं। वो घर की मालकिन थीं, सारा कुछ उन्हें देखना पड़ता था इसलिए ज्यादा दिन घर से बाहर नहीं रह सकती थीं औरतों को लेकर जो एक सामंती सोच होती है, मर्दों की वह धूमिल में बची हुई थी। यानी इस सोच से वे मुक्त नहीं हो सके थे। दूसरे, उस वक्त तक गर्भ निरोधक चीजों का ज्यादा प्रचार नहीं हुआ था गांवों में। गर्भपात जैसी घटनाएं घटित होती रहती थी गांवों में। अवैध संबंध भी बनते थे गांवों में। धूमिल का कहना था कि यौन अंगों का इस्तेमाल विस्फोटक की तरह करना चाहिए और ऐसा वे अपनी कविताओं में करते भी थे। कह सकते हो कि यह भूखी पीढ़ी का भी असर है। 


आज भी आप कविता को बकवास और निरर्थक ही मानते हैं?

ऐसी कोई बात नहीं है। कविता से बहुत कुछ सीखा है मैंने। ‘उपसंहार’ उपन्यास में कविताएं हैं। कविता का इस्तेमाल किया है मैंने। 


कविता न लिख पाने का जो अफसोस है उसे लगता है कि 'महुआचरित' और 'उपसंहार' जैसी रचनाओं के माध्यम से दूर कर रहे हैं... हो सकता है। धूमिल की लखनऊ में जब मौत हुई तो वहां दो रचनाकार पहुंचे- कुंवर नारायण और श्रीलाल शुक्ल। मणिकर्णिका घाट पर जब धूमिल की लाश लाई गई तो बकौल राजशेखर 'कैसा विद्रूप है कि धूमिल की अर्थी को काशी का एक भी साहित्यकार अपना कंधा नहीं दे सका।' आप कहां थे उस वक्त? उनकी मौत के बाद बनारस में शोक सभा का आयोजन हुआ था ? यदि कुछ याद आ रहा है तो बताइए। 


बनारस के साहित्यकारों को कोई ख़बर ही नहीं मिल पायी थी कि कब उनकी अर्थी आ रही है, कब वो घाट पर जाएंगे। मणिकर्णिका घाट पर उनका शवदाह हो रहा है, इसकी सूचना बनारस के किसी साहित्यकार को नहीं थी। खुद मुझे नहीं थी। जब गांव में उनकी तबीयत खराब थी तो उन्होंने कहा कि मुझे बनारस ले चलो और काशी को बुलवाओ। मैं ही उन्हें अस्पताल लेकर गया था - बीएचयू । पहले आंख वाले डॉक्टर से दिखाया सोचा कि आंख की समस्या है। लेकिन डॉक्टर ने कहा कि आंख की कोई समस्या नहीं है। फिर मालूम हुआ कि धूमिल की बीमारी का संबंध सिर से है। जब धूमिल गांव से आए तो मैंने देखा कि उनका ललाट जला हुआ था। पता चला कि धतूरा, सरसों आदि पीस कर लगाने से ऐसा हो गया है। मैं यह देखकर स्तब्ध रह गया कि धूमिल को यह क्या हो गया! वे कहते थे कि सिर में दर्द रहता है। हम लोगों ने यह नहीं सोचा था कि इतनी भयानक बीमारी पल रही है। ब्रेन ट्यूमर बहुत बढ़ गया था। डॉक्टर कटियार ने देखकर यह सब कुछ बताया। मैं डॉक्टर कटियार के पास उन्हें छोड़कर थोड़ी देर के लिए बीएचयू में हिंदी विभाग चला गया, कुछ काम से।

वहां से मैं फिर अस्पताल आया तो धूमिल कहीं दिखाई नहीं पड़े। मैं परेशान हुआ। मैं वहां गया जहाँ धूमिल रहते थे। वहां भी ताला लगा हुआ पाया। फिर मैं यूँ ही लौट रहा था कि गजानंद मुक्तकंठ मिल गए। मैंने कहा कि  धूमिल कहाँ चला गया? तो उन्होंने बताया कि काशी-विश्वनाथ ट्रेन से हो सकता है कि लखनऊ चले गए हों क्योंकि डॉक्टर ने कह दिया था कि जल्दी लखनऊ ले जाइए। लखनऊ में ठाकुर प्रसाद सिंह थे, श्रीलाल शुक्ल थे, कुंवर नारायण थे और दूसरे लोग थे। ऑपरेशन हुआ, ऑपरेशन होने के बाद लगा कि वे ठीक हो जाएंगे। मेरे पास उनका एक पोस्टकार्ड आया था, एक लाइन का- 'जल्दी ही ठीक होकर आ रहा हूं, चिंता मत करो। (काशीनाथ जी की आंखें भर आती हैं, कुछ देर के लिए मौन हो जाते हैं)। तो उम्मीद थी कि ठीक हो जाएंगे। शायद उनके घर वाले लोगों को उनके महत्त्व का पता नहीं था। शायद उन्हें नहीं मालूम था कि काशी में धूमिल के चाहने वाले कितने हैं।

जी, आप सही कह रहे हैं। रेडियो पर जब उनके घर वालों ने उनकी मौत की खबर सुनी, तो सभी आश्चर्यचकित रह गए कि धूमिल इतना बड़ा आदमी था।

अगर हम लोगों को उनकी माटी आने का पता होता तो 20-25 लोग तो अस्सी से ही जानेवाले थे। लेकिन किसी को पता नहीं चला। उनके देहांत के कुछ दिनों बाद मैंने एक गोष्ठी की थी। यह श्रद्धांजलि गोष्ठी थी। मैं एक पत्रिका निकालता था उन दिनों 'परिवेश' नाम से। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में यह गोष्ठी हुई थी। इस पत्रिका में इस गोष्ठी की रिपोर्ट छपी थी। वह अंक आज भी है मेरे पास। इसमें धूमिल की कविताओं के चुने हुए अंश भी मैंने छापे थे।  उस गोष्ठी में गोरख पांडे अपने जेएनयू के कुछ साथियों के साथ आए थे। धूमिल की मौत के कुछ ही दिन बाद बल्कि दो-चार दिन बाद ही मैंने वह गोष्ठी की थी। उस गोष्ठी में ही लोगों ने धूमिल के खिलाफ बातें करनी शुरू कर दी। गोरख पांडे ने कहा- 'अराजक कवि हैं, मार्क्सवाद से इसका कोई संबंध नहीं था।' आज लोग अपने कवि के रूप में धूमिल की कविताएं उद्धृत करते हैं। दूसरे संगठन वाले भी उन्हें इज्जत देते हैं। दरअसल धूमिल अक्खड़ थे और खरी- खोटी सुनाने से चूकते नहीं थे। अध्यापकों को तो वे घोर नापसंद करते थे। बच्चन सिंह, शिवप्रसाद सिंह आदि के बारे में उनका कहना था कि इन लोगों को कविता की कोई समझ नहीं है। ये लोग मुझ पर भी नाराज हो जाते थे, अप्रसन्न रहते थे कि ऐसे व्यक्ति को मुंह लगा के रखता है। गोरख पांडे और उनके साथियों ने उस गोष्ठी में कहा कि उनकी कोई विचारधारा नहीं थी। और ऐसा माहौल बना दिया कि उनके साहित्यिक योगदान पर बात ही नहीं हो सकी।

क्या नशा बहुत करते थे धूमिल?

धूमिल ऐसा कवि था जिसने जीवन में नशा किया ही नहीं था। न भांग, न गांजा, न बीड़ी, न सिगरेट, न दारू। एक बार हम सहारनपुर गए थे, धूमिल के यहां, और रहे थे हफ्ते भर । तो वहां एक दिन इच्छा हुई बीयर पीने की। हम और धूमिल साथ जाकर एक बोतल बीयर लेकर आए। तो हमने कहा कि यार अकेले हम क्या पीएंगे, तुम भी लो, साथ दो।  मना किया उसने। फिर हमने थोड़ा-सा एक गिलास में दिया। उसने कहा कि देखें हम भी कि किसलिए पीते हो! जरा सा लिया और थूक दिया। फिर कहा कि घोड़े के मूत की तरह है, कैसे पीते हो तुम लोग?

मंदिर जाते थे?

नहीं, जनेऊ पहनते थे। लेकिन मंदिर नहीं जाते थे। मंदिर जाते हुए मैंने कभी नहीं देखा, पूजा करते हुए मैंने कभी नहीं देखा।

धूमिल को यह संस्कार कहां से मिला?

यह मार्क्सवाद का ही असर था। भगवान पर कभी बात ही नहीं होती थी। नास्तिक थे धूमिल ।

धूमिल के बारे में कुछ और कहना चाहेंगे जो छूट रहा हो?

धूमिल के जाने के बाद फिर मेरा कोई बनारस में वैसा हुआ नहीं। अकेला हो गया मैं एकदम। कविताओं में तो मेरी रुचि ही खत्म हो गई उसके बाद। उसकी कविताओं से इतने जुड़े हुए थे हम कि कोई वाक्य अगर आया तो उसकी कविता में कैसे बना, कौन से शब्द बदल जाए, कौन रहे, इन सब पर बात होती थी।

साभार, ‘पुस्तक-वार्ता’, नवम्बर-दिसंबर 2014 



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