‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



बुधवार, 27 सितंबर 2023

अनोखा भाई

महादेवी वर्मा को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, तो एक साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया था, 'आप इस एक लाख रुपये का क्या करेंगी? '

कहने लगीं, 'न तो मैं अब कोई कीमती साड़ियाँ पहनती हूँ , न कोई सिंगार-पटार करती हूँ। ये लाख रुपये पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में यूँ न जाने देती।' कहते-कहते उनका दिल भर आया।

कौन था उनका वो 'भाई'? 

हिंदी के युग-प्रवर्तक औघड़-फक्कड़-महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी के मुंहबोले भाई थे।


एक बार वे रक्षा-बंधन के दिन सुबह-सुबह जा पहुंचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवा कर चिल्लाकर द्वार से बोले, 'दीदी, जरा बारह रुपये तो लेकर आना।'

महादेवी रुपये तो तत्काल ले आईं, पर पूछा, 'यह तो बताओ भैय्या, यह सुबह-सुबह आज बारह रुपये की क्या जरूरत आन पड़ी?

हालाँकि, 'दीदी' जानती थी कि उनका यह दानवीर भाई रोजाना ही किसी न किसी को अपना सर्वस्व दान कर आ जाता है, पर आज तो रक्षा-बंधन है, आज क्यों?

निराला जी सरलता से बोले, "ये दुई रुपया तो इस रिक्शा वाले के लिए और दस रुपये तुम्हें देना है। 

आज राखी है ना! तुम्हें भी तो राखी बँधवाई के पैसे देने होंगे।" 


ऐसे थे फक्कड़ निराला और ऐसी थी उनकी वह स्नेहमयी 'दीदी'। गर्व है हमें मातृभाषा को समर्पित ऐसे निराले कवि निराला जी और कवयित्री महादेवी पर। निष्काम प्रेम।

🙏🏻🪷😌

-अमिताभ खरे के सौजन्य से


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कृष्णा सोबती जी के साथ कुछ खट्टे अनुभव, मिठास के साथ।

 तब मैं ' कादम्बिनी ' का कार्यकारी संपादक हुआ करता था। मैंने सोबती जी से एक बार आग्रह किया कि आप हमें अगले अंक के लिए कोई संस्मरण दीजिए।वह तारीख भी बताई ,जब तक वह लिख कर दे सकें तो आगामी अंक में ही हम उसे छापना चाहेंगे।जहाँ तक याद आता है, 17 तारीख तक अगले महीने का अंक तैयार होकर प्रेस में छपने के लिए चला जाता था और उसी महीने की 25-26 तारीख तक छपकर आ जाता था।मैंने अंदाज़न कुछ पेज सोबती जी के संस्मरण के लिए छोड़ रखे थे मगर उनका संस्मरण मिला-अंंक छूट जाने के बाद।

व्यावसायिक पत्रिकाओं की अपनी मजबूरियाँँ होती हैं, उन्हें एक खास दिन छपने के लिए प्रेस में भेजना ही होता है।इस कारण वह संस्मरण उस अंक में न जा सका और मुझसे यह चूक हुई कि मैं सोबती जी को यह बात पहले नहीं बताई।बता देता तो शायद मामला सुलझ जाता।वैसे संभव यह भी है कि तब भी न सुलझता।जब अगला अंक उनके पास गया और उन्होंने देखा कि उनका वह संस्मरण नदारद है।शाम को उनका फोन आया कि वह छपा क्यों नहीं?मैंने कारण समझाया और कहा कि यह विलंब से मिला, इसलिए अब अगले अंक में  छपेगा।काफी समझाने पर वह मान गईं, हालांकि अमृता प्रीतम से  'ज़िन्दगीनामा ' शब्द के इस्तेमाल को लेकर वह लंबी कानूनी लड़ाई में उलझी थीं। सोबती जी को आशंका यह थी कि यह अमृता प्रीतम ने रुकवाया है।उनकी इस आशंका का आधार पहले की कोई ऐसी घटना थी या उनका मन अमृता प्रीतम को लेकर अनावश्यक रूप से आशंकित रहने लगा था,इसकी जानकारी मुझे नहीं। जहां तक मेरा सवाल है,अमृता जी से न जीवन में कभी मुलाकात हुई, न उन्हें कभी कहीं देखा था। कभी इच्छा भी पैदा नहीं हुई,उनसे मिलने की।सच कहूं तो उनका भावातिरेकी लेखन मुझे पसंद नहीं था।वैसे अमृता जी के पास ऐसा जासूसी तंत्र रहा नहीं होगा कि कृष्णा सोबती कहां-कहां छप रही हैं,यह पता करके उसे रुकवा सके।कोई विशुद्ध लेखक कितना भी  नामी हो, इतना ताकतवर भी नहीं हो सकता कि हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के मालिक या संपादक उनके कहने पर चले! अमृता जी का नाम  बड़ा था मगर थीं तो वह भी कुल मिलाकर एक लेखक हीं! यह बात सोबती जी को समझाई-बताई भी। अमृता जी के साथ उनके लंबा- खर्चीले मुकद्दमा लड़ने से पैदा हुई थकावट और खीज इसका कारण रही होगी।

खैर उस समय तो वह मान गईं।मैं उस रात चैन की नींद सोया।सुबह फिर उनका फोन आया, नहीं, वह अब नहीं छपेगा।उन्हें फिर से समझाना व्यर्थ साबित हुआ।दुख तो बहुत हुआ मगर मैं बेबस था। वापस भेजना पड़ा।

दूसरा वाकया तब हुआ,जब मैं 'शुक्रवार ' का संपादक था।मेरे पास एक फ्रीलांसर यह सुझाव लेकर आए कि वह लेखकों से बात कर एक सीरीज लिखना चाहेंगे कि इन दिनों वे क्या लिख -पढ़ रहे हैं।मैंने कहा, बढ़िया आइडिया है,लिखिए लेकिन हमारे एक पेज से अधिक लंबा नहीं, चूँकि यह बुनियादी रूप से राजनीतिक -सामाजिक पत्रिका है। शीर्षक और फोटो के बाद हीकरीब आठ सौ शब्दों की गुंजाइश बचती है।वे लाए थे- एक- दो लिखकर कुछ लेखकों के बारे में। मैंने कहा कि पहले दो- तीन वरिष्ठ लेखकों से बात करके लाइए,फिर हम इन्हें भी छापेंगे।

उन्होंने सोबती जी से संपर्क किया,वह राजी हो गईंं।बहुत से लोग जानते हैं कि सोबती जी साक्षात्कारकर्ता पर कुछ नहीं छोड़ती थीं। लिखित सवालों के जवाब फुलस्केप कागज पर बड़े - बड़े अक्षरों में खुद लिख कर देती थीं।उन्होंने लिखा,जो ' शुक्रवार ' के तीन पेज से कम में न था। मैंने उनसे कहा कि बंधु, इतना लंबा छापना मुश्किल होगा।सोबती जी के पास फिर जाइए, शायद वे इसे छोटा कर सकें।वैसे भी मुझे वह कुछ उलझा हुआ सा लगा था।वे हाँ करके तो गए मगर मेरे कक्ष से निकल कर वहीं सहयोगी महिला पत्रिका ' बिंदिया' पत्रिका की संपादक को वह आलेख दे आए। उन्होंने इसे पूरा छापना स्वीकार कर लिया और छाप भी दिया।वह अंक जब सोबती जी के पास पहुँचा तो उन्होंने मुझे फोन किया। वह आगबबूला हो गईं कि मैंने तुम्हारी पत्रिका के लिए दिया था, ' बिंदिया '  पत्रिका को तुमने कैसे दे दिया? यह तुमसे किसने कहा था? मैंने सफाई दी कि सोबती जी, इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है, स्वयं मुझे छपने ही पर पता चला है लेकिन वह विश्वास करें,तब न !

वैसे यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि 'कादम्बिनी'  में हमने एक स्तंभ ' कथा प्रतिमान' शुरू किया था, जिसमें हम हिन्दी के श्रेष्ठ कथाकारों से उनकी अपनी पसंद की देशी-विदेशी कहानी का चयन करने का आग्रह करते थे।उनसे कहते थे कि आपने उस कहानी का चयन क्यों किया, इस पर एक टिप्पणी  लिखें।शर्त एक थी कि वह कहानी हिंदी में उपलब्ध होना चाहिए। हम वह कहानी तथा चयनकर्ता की उस पर टिप्पणी प्रकाशित करते थे।इस स्तंभ के लिए कृष्णा जी ने चन्द्रधर शर्मा की कालजयी कहानी ' उसने कहा था ' का चयन किया और उस पर टिप्पणी लिखी मगर यह संस्मरण वाले उस अप्रिय प्रसंग से पहले की बात है।इस स्तंभ के लिए उनके अलावा विष्णु प्रभाकर, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, अमरकांत, श्रीलाल शुक्ल, शेखर जोशी, विद्यासागर नौटियाल, विजयदान देथा आदि ने भी एक-एक कहानी का चयन किया था और टिप्पणी लिखी थी। 2007 में इस चयन को पुस्तकाकार रूप में राजकमल प्रकाशन ने ' बोलता लिहाफ ' शीर्षक से प्रकाशित भी किया था।

सोबती जी के साथ आई खटास कभी लंबी नहीं चली।पता नहीं कैसे और कब मिठास फिर से लौट आती थी। इसकी पहल वे अकसर करतीं।उनसे मिलना होता रहा।उन्होंने राजकमल प्रकाशन से  'जनसत्ता ' में प्रकाशित  आलेखों की दो पुस्तिकाएँ  छपवाने से पहले उनके संपादन का दायित्व एक - एक कर मुझे सौंपा।मैंने यह काम स्वीकार तो कर लिया मगर बेहद डरते- डरते!बहुत जरूरी होने पर ही कहीं कलम चलाई, ताकि फिर से हमारे-उनके बीच कोई गलतफहमी पैदा न हो जाए ।बाद में एक बार मिलने पर उन्होंने किसी संदर्भ में कहा कि मैं जिसे संपादन का दायित्व देती हूँ,  उसे पूरी स्वतंत्रता देती हूँ।मैं मन ही मन बहुत पछताया मगर मैंने उन्हें नहीं बताया कि मैं तब कितना डरा हुआ था।

एक बार 'हंस' में विश्वनाथन त्रिपाठी और मेरी बातचीत छपी।उसके बाद इससे खुश होकर मगर ऐसा कहे बगैर उन्होंने मेरे घर दो टेबल लैंप भिजवाए।एक मेरे लिए, एक त्रिपाठी जी के लिए।बिस्तर पर अधलेटा होकर देर रात को उसी की रोशनी में कई बार लिखता - पढ़ता रहता हूँ और वे याद आती रहती हैं।

(संभावना प्रकाशन से प्रकाशित साहित्यिक संस्मरणों की पुस्तक ' राह उनकी एक थी '  से एक अंश)

-विष्णु नागर की स्मृति से


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साहिर के दो सौ रुपए

 एक दौर था.. जब जावेद अख़्तर के दिन मुश्किल में गुज़र रहे थे। ऐसे में उन्होंने साहिर से मदद लेने का फैसला किया। फोन किया और वक्त लेकर उनसे मुलाकात के लिए पहुंचे।

उस दिन साहिर ने जावेद के चेहरे पर उदासी देखी और कहा, “आओ नौजवान, क्या हाल है, उदास हो?” 

जावेद ने बताया कि दिन मुश्किल चल रहे हैं, पैसे खत्म होने वाले हैं। 

उन्होंने साहिर से कहा कि अगर वो उन्हें कहीं काम दिला दें तो बहुत एहसान होगा।


जावेद अख़्तर बताते हैं कि साहिर साहब की एक अजीब आदत थी, वो जब परेशान होते थे तो पैंट की पिछली जेब से छोटी सी कंघी निकलकर बालों पर फिराने लगते थे। जब मन में कुछ उलझा होता था तो बाल सुलझाने लगते थे। उस वक्त भी उन्होंने वही किया। कुछ देर तक सोचते रहे फिर अपने उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में बोले, “ज़रूर नौजवान, फ़कीर देखेगा क्या कर सकता है”


फिर पास रखी मेज़ की तरफ इशारा करके कहा, “हमने भी बुरे दिन देखें हैं नौजवान, फिलहाल ये ले लो, देखते हैं क्या हो सकता है”, जावेद अख्तर ने देखा तो मेज़ पर दो सौ रुपए रखे हुए थे।


वो चाहते तो पैसे मेरे हाथ पर भी रख सकते थे, लेकिन ये उस आदमी की सेंसिटिविटी थी कि उसे लगा कि कहीं मुझे बुरा न लग जाए। ये उस शख्स का मयार था कि पैसे देते वक्त भी वो मुझसे नज़र नहीं मिला रहा था।


साहिर के साथ अब उनका उठना बैठना बढ़ गया था क्योंकि त्रिशूल, दीवार और काला पत्थर जैसी फिल्मों में कहानी सलीम-जावेद की थी तो गाने साहिर साहब के। अक्सर वो लोग साथ बैठते और कहानी, गाने, डायलॉग्स वगैरह पर चर्चा करते। इस दौरान जावेद अक्सर शरारत में साहिर से कहते, “साहिर साब !  आपके वो दौ सौ रुपए मेरे पास हैं, दे भी सकता हूं लेकिन दूंगा नहीं” साहिर मुस्कुराते। साथ बैठे लोग जब उनसे पूछते कि कौन से दो सौ रुपए तो साहिर कहते, “इन्हीं से पूछिए”, ये सिलसिला लंबा चलता रहा। 

साहिर और जावेद अख़्तर की मुलाकातें होती रहीं, अदबी महफिलें होती रहीं, वक्त गुज़रता रहा।


और फिर एक लंबे अर्से के बाद तारीख आई 25अक्टूबर 1980की। वो देर शाम का वक्त था, जब जावेद साहब के पास साहिर के फैमिली डॉक्टर, डॉ कपूर का कॉल आया। उनकी आवाज़ में हड़बड़ाहट और दर्द दोनों था। उन्होंने बताया कि साहिर लुधियानवी नहीं रहे। हार्ट अटैक हुआ था। जावेद अख़्तर के लिए ये सुनना आसान नहीं था।


वो जितनी जल्दी हो सकता था, उनके घर पहुंचे तो देखा कि उर्दू शायरी का सबसे करिश्माई सितारा एक सफेद चादर में लिपटा हुआ था। वो बताते हैं कि ''वहां उनकी दोनों बहनों के अलावा बी. आर. चोपड़ा समेत फिल्म इंडस्ट्री के भी तमाम लोग मौजूद थे। मैं उनके करीब गया तो मेरे हाथ कांप रहे थे, मैंने चादर हटाई तो उनके दोनों हाथ उनके सीने पर रखे हुए थे, मेरी आंखों के सामने वो वक्त घूमने लगा जब मैं शुरुआती दिनों में उनसे मुलाकात करता था, मैंने उनकी हथेलियों को छुआ और महसूस किया कि ये वही हाथ हैं जिनसे इतने खूबसूरत गीत लिखे गए हैं लेकिन अब वो ठंडे पड़ चुके थे।''


जूहू कब्रिस्तान में साहिर को दफनाने का इंतज़ाम किया गया। वो सुबह-सुबह का वक्त था, रातभर के इंतज़ार के बाद साहिर को सुबह सुपर्द-ए-ख़ाक किया जाना था। ये वही कब्रिस्तान है जिसमें मोहम्मद रफी, मजरूह सुल्तानपुरी, मधुबाला और तलत महमूद की कब्रें हैं। साहिर को पूरे मुस्लिम रस्म-ओ-रवायत के साथ दफ़्न किया गया। साथ आए तमाम लोग कुछ देर के बाद वापस लौट गए लेकिन जावेद अख़्तर काफी देर तक कब्र के पास ही बैठे रहे।


काफी देर तक बैठने के बाद जावेद अख़्तर उठे और नम आंखों से वापस जाने लगे। वो जूहू कब्रिस्तान से बाहर निकले और सामने खड़ी अपनी कार में बैठने ही वाले थे कि उन्हें किसी ने आवाज़ दी। जावेद अख्तर ने पलट कर देखा तो साहिर साहब के एक दोस्त अशफाक साहब थे।


अशफ़ाक उस वक्त की एक बेहतरीन राइटर वाहिदा तबस्सुम के शौहर थे, जिन्हें साहिर से काफी लगाव था। अशफ़ाक हड़बड़ाए हुए चले आ रहे थे, उन्होंने नाइट सूट पहन रखा था, शायद उन्हें सुबह-सुबह ही ख़बर मिली थी और वो वैसे ही घर से निकल आए थे। उन्होंने आते ही जावेद साहब से कहा, “आपके पास कुछ पैसे पड़ें हैं क्या? वो कब्र बनाने वाले को देने हैं, मैं तो जल्दबाज़ी में ऐसे ही आ गया”, जावेद साहब ने अपना बटुआ निकालते हुआ पूछा, ''हां-हां, कितने रुपए देने हैं'' उन्होंने कहा, “दो सौ रुपए"..

लेखक - जावेद अख़्तर 

-हरप्रीत सिंह पुरी जी के सौजन्य से


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शनिवार, 23 सितंबर 2023

नागर जी से भेंट

आज अमृतलाल नागर जी (17.08.1916 – 23.02.1990) का जन्मदिन है। नागर जी के साहित्य से सभी हिंदी प्रेमी परिचित होंगे। प्रेमचंद के पश्चात् हिन्दी साहित्य के निर्माताओं में जिन गद्य शिल्पियों ने वृहत्तर भूमिकाएँ निभायी हैं, उनमें नागर जी का महत्वपूर्ण स्थान है। 1935 से 1990 तक के अपने 55 वर्ष के सर्जना-काल में नागरजी ने उपन्यास, कहानियाँ, व्यंग्य, रेखाचित्र, निबंध, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि विधाओं में हिंदी वांग्मय 65 पुस्तकें दीं। उन्होंनें फ़िल्मी पटकथाएँ व रेडियो नाटक रचे और पत्रकारिता भी की। इनमें 14 उपन्यास, 14 कहानी-संग्रह, 6 संस्मरण-आत्मसंस्मरण-रिपोर्ताज-निबंध, 6 हास्य-व्यंग्य-संग्रह, 7 नाट्य-संग्रह (4 रेडियो-नाटक), बाल-साहित्य की 12 पुस्तकें तथा अनूदित साहित्य की 6 पुस्तकें शामिल हैं। 

 उनके उपन्यास, ‘बूँद और समुद्र, अमृत और विष, मानस का हंस, खंजन नयन, नाच्यो बहुत गोपाल, करवट, पीढ़ियाँ’ और व्यंग्य-संग्रह ‘चकल्लस’ अधिकतर लोगों ने पढ़ रखे होंगे। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि उनके चर्चित उपन्यास, ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ की रचना से मेरा भी जुड़ाव रहा।   

 यह 15 जून 1977 की बात है जब मेरे मित्र, गोपाल ने मुझे नृत्यगुरु, वीर विक्रम सिंह जी से मिलवाया। वे कैसरबाग़ (लखनऊ) कोतवाली के पीछे ख़यालीगंज में रहते थे। गोपाल का उनसे कैसे परिचय था, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन इतना याद है कि गोपाल ने मुझे सिंह साहब से मिलवाते हुए कहा था कि इन्हें (मुझे) कोई छोटी-मोटी नौकरी दिलवा दीजिए...

 उन्होंने मुझे अगले दिन आने के लिए कहा। 

 अगले दिन मैं सिंह साहब से मिलने उनके घर पहुँचा। उन्होंने मुझे बैठाया और पानी के लिए पूछा। फिर लिफ़ाफ़े में बंद कर एक पत्र देकर मुझे उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी में डॉ. शरद नागर के पास भेजा। 

 अकादमी का ऑफिस उस समय कैसरबाग़ में भातखंडे संगीत महाविद्यालय के बगलवाली बिल्डिंग में था। पंद्रह मिनट बाद मैं शरद जी के पास था। पत्र-वाला लिफाफा उन्हें पत्र दिया। उसमें क्या लिखा था- यह तो नहीं पता, लेकिन पत्र पढ़ते-ही शरद जी ने मुझे अपने सामने पड़ी कुर्सी पर बिठाया और पानी पिलवाया था। उस समय वे अकादमी में सांस्कृतिक सचिव थे।

 शरद जी ने मुझसे कुछ पारिवारिक बातें कीं, स्थानीय निवास के बारे में जानकारी ली और हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर हल्का-फुल्का इंटरव्यू लिया। फिर हिन्दी और अंग्रेज़ी के कुछ शब्दों का इमला बोला जिसे मैंने लगभग सही लिखा। एक पेज हिन्दी और एक पेज अंग्रेज़ी टाइप भी करवाया... अगले दिन सवेरे आठ बजे प्रख्यात उपन्यासकार अमृतलाल नागर जी की चौक स्थित कोठी पर आने को कहा। 

 दूसरे दिन मैं सबेरे के आठ बजे चौक में बान वाली गली में राजाराम की कोठी के रूप में मशहूर हवेली के चबूतरे पर जब चार-पाँच सीढियाँ चढ़कर पहुँचा, तो मन में प्रसन्नता के साथ धुकधुकी-सी लगी थी कि नागर जी से मैं कैसे मिलूँगा? उनसे कैसे बातचीत कर पाऊँगा? 

 लकड़ी के बड़े से दरवाज़े की बायीं चौखट पर कॉल बेल लगी थी। हिम्मत कर मैंने उसे दबा दी... मैं उम्मीद कर रहा था  कि कोई आकर दरवाज़ा खोलेगा, लेकिन कोई नहीं आया। हाँ, क़रीब आधे मिनट बाद अन्दर से आवाज़ आयी, “खुला है, आ जाओ!” 

 एक पल्ला ठेल कर मैं अन्दर घुसा, फिर उसे पूर्ववत भिड़ाकर आगे बढ़ा। बरामदे को पार करते ही आँगन शुरू। आँगन में पहुँचते ही पचीस साल के चपेटे में एक आदमी से मुझसे भेंट हुई। यह सुरेश थे— नागर जी के घर-परिवार के सेवक। पता नहीं कैसे उन्होंने समझ लिया कि मुझे नागर जी से ही मिलना है और बिना मेरे कुछ कहे ही, संकेत किया कि आँगन पार कर सामने वाले कमरे में चले जाइए। अभी दो क़दम-ही आगे बढ़ा था कि शरद जी से अपने कमरे से निकलते हुए दिखायी दिये। कोठी में पाँच-छह कमरे थे। नागर जी का परिवार उसी में रहता था। मुझे देखकर शरद जी आँगन में आ गये।  

 मैं शरद जी के साथ नागर जी के कमरे में पहुँचा। कमरा क्या था, हालनुमा बैठका था। दुर्लभ पुस्तकों, चित्रों और कलाकृतियों के मध्य दो तख़्त जोड़कर बनाये गये दीवान पर दो मनसदों से घिरा उनके बैठने का स्थान निर्धारित था। तख़्त के सामने बेंत का सोफ़ा और हैण्डलूम की कारपेट पर व्यस्थित सेंटर टेबल। कलापूर्ण सादगी ने मन मोह लिया... आँखों पर काले रंग के मोटे फ्रेम का चश्मा लगाये नागर जी अपने स्थान पर बैठे कुछ लिख रहे थे— पीठ मसनद से सटाये, गोद में राइटिंग पैड लिये हुए!

 शरद जी ने नागर जी से मेरा परिचय कराया— “बाबूजी! ये हैं राजेन्द्र, मैनुस्क्रिप्ट लिखेंगे।” 

 उस समय वे बहुचर्चित उपन्यास ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ लिख रहे थे। उन्होंने थोड़ा-सा सिर उठाया—

 “अच्छा, बेटा लिखोगे?” एक महान व्यक्तित्त्व से आत्मीयता से भरा प्रश्नवाचक वाक्य सुन मेरी असहजता लुप्त हो गयी।

 “जी बाबूजी!” मैंने उत्साह से कहा था।

 उन्होंने तुरन्त ही अपने तख़्त पर मुझे बिठा लिया और राइटिंग पैड पकड़ा दिया। कोई पूछताँछ नहीं। इस बात की भी जाँच नहीं कि मैं लिख भी पाऊँगा कि नहीं! एक ही नज़र में उन्होंने जैसे मुझे और मेरी क्षमता को परख लिया और आश्वस्त हो गये।

 यह मेरे लिए अप्रत्याशित था। उस समय मेरी अवस्था बीस वर्ष की थी, लेकिन देखने में मैं सत्तर-अट्ठारह का ही लगता था— सवा पाँच फ़िटी दुबली-पतली काया, दाढ़ी-मूँछ का कहीं पता नहीं, हल्की-सी रेख थी। कुर्ता-पायजामा और साधारण चप्पलें पहने मैं धूल-पसीने से गन्दे हो चुके पैरों से तख़्त पर पालथी मारकर बैठने का साहस जुटा ही रहा था कि बाबूजी ने बैठने का संकेत कर मेरे हाथ में राइटिंग पैड थमा दिया और उपन्यास की पांडुलिपि बोलनी शुरू कर दी। 

अपने गन्दे पैरों सहित बैठने के अलावा मेरे पास कोई चारा न था। उनके सम्मुख तख़्त पर पालथी मार बैठ गया और ‘इमला’ लिखने लगा। अचानक  मन में एक विचार कौंधा।

अभी तक मैंने यही पढ़ा-सुना था कि लेखक खुद ही लिखते या टाइपराइटर पर टाइप करते हैं। लेकिन नागर जी का मामला अलग था। वे जब स्वयं लिखते थे, तो उनका विचार-प्रवाह भंग हो जाता था। इसलिए वे स्वयं कम ही लिखते थे, बोलकर अधिक लिखाते थे। 

 आधे-पौन घंटे बाद नाश्ता आया। ‘बा’ (नागर जी की पत्नी) स्वयं लेकर आयीं। स्वादिष्ट कचौरियाँ और चाय! हालाँकि मैं रास्ते में नाश्ता करके आया था, फिर भी, बा और बाबूजी के कहने पर दो कचौरियाँ खानी पड़ीं। इससे पहले मौक़ा निकालकर आँगन में लगी पानी की टोंटी से अपने हाथ-पैर धो चुका था।

 लेखनी को विश्राम करना पड़ा था। बाबूजी ने मेरे लिखे हुए इमले की जाँच की। दो-ढाई पृष्ठों में चार-पाँच स्थलों पर मामूली संशोधन... मैं ‘पास’ हो गया था।

 नाश्ते के बाद मैं फिर अपनी भूमिका में आ गया। करीब ग्यारह बजे पूर्वाह्न तक बोलना-लिखना जारी रहा। फिर मेरा औपचारिक साक्षात्कार। बताने को कुछ ख़ास था ही नहीं- दो-चार मामूली बातें— नाम-पता, शिक्षा-दीक्षा, माता-पिता, स्थाई निवास आदि। ‘बहुत अच्छा, ख़ूब मेहनत करो, ख़ूब तरक्क़ी करो’ जैसे आशीर्वचनों की वर्षा से मैं स्नात हो रहा था... अगले दिन थोडा जल्दी, यानी साढ़े सात बजे तक, आने की हिदायत के साथ छुट्टी ।

 मुझे उसी दिन मुझे मालूम पड़ा था कि शरद जी, नागर जी के  छोटे बेटे थे। बड़े बेटे थे- कुमुद नागर।

 अगले दिन से वही दिनचर्या। सवेरे साढ़े सात बजे से लेकर पूर्वाह्न ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे तक लिखना। दोपहर बारह बजे से शाम सात-साढ़े सात बजे तक अकादमी में। उस समय अकादमी के यही ऑफिस-ऑवर्स थे।

 उन दिनों मैं गौसनगर-पाण्डेगंज में बिरहाने से आने वाले नाले के पास किराये पर रहता था। जिस कमरे में मैं रहता था, उसकी पीछे मेहतर बस्ती थी और कमरे की पीछे वाली खिड़की नगरपालिका के सार्वजनिक नल को ओर खुलती थी। सवेरे पाँच से रात दस बजे तक चहल-पहल से लेकर गली-गलौज का मनोरंजक माहौल बना रहता था। ग़रीबी और उपेक्षा से निर्मित वातावरण में वह असभ्यता और कुसंस्कृति व्याप्त थी, जो उपन्यास की विषयवस्तु थी। मैं स्वयं ग़रीबी में पला-बढ़ा था और सीमान्त कृषक परिवार से था, अतः आभिजात्यता से चार हाथ की दूरी-ही भाती थी। 

 नागर जी के मुख से निकले कथोपकथन का मिलान मैं अपने कमरे के पिछवाड़े वाली खिड़की के ‘चलचित्रों’ से आने वाली आवाज़ों से करता। कहीं ‘मिसमैच’ होने पर बाबूजी को सूचित करता।  कुछ दिनों तक यह क्रम चलता रहा, फिर एक दिन उन्होंने मुझे यह छूट दे दी कि कथोपकथनों में मैं यथावश्यक परिवर्तन कर लूँ। उस समय मैंने इस बात का अधिक महत्त्व नहीं समझा, पर आज मैं इसका महत्त्व समझ सकता हूँ। इसका प्रत्यक्ष लाभ मैंने अपने कथा-लेखन, व्यंग्य आदि में उठाया है।   

 यह स्वीकारने में मुझे किंचित संकोच नहीं कि आज मुझे जो भी उल्टा-सीधा लिखना आता है, उसकी तमीज़ बाबूजी से ही मिली। मेरे घर में कोई साहित्यकार नहीं। हाँ, पिताजी को प्रेमचंद साहित्य और तुलसीकृत रामायण में विशेष रुचि है, पर वे लेखक-कवि नहीं हैं। उनकी इस रुचि के कारण मुझे कोर्स के अतिरिक्त प्रेमचंद की कई कहानियाँ और कुछ अन्य लोकप्रिय साहित्य पढ़ने का अवसर मिला था। ‘रामचरितमानस’ को तो कई बार फुटकर-फुटकर सस्वर पढ़ चुका था... जब इन बातों की चर्चा बाबूजी से हुई, तो उन्होंने कहा था, “तभी तुम बढ़िया लिखते हो!”

 “मैं तो वही लिखता हूँ, जो आप लिखाते हैं। इसमें मेरा अपना क्या है?”, मैंने कहा ।

 “बेटा! यह बात अभी नहीं समझोगे। जब स्वयं कुछ लिखोगे, तब समझ जाओगे।”

 ‘मैं भी लिखूँगा’ यह सोचकर मैं भावुक हो उठा। बाबूजी के पैर छू लिये। उनका आशीष छलक-छलक पड़ा...

 अक्टूबर-नवम्बर तक उपन्यास पूरा हुआ। बाबूजी ने स्वयं पांडुलिपि सिलकर, उस पर प्रेषक-प्रेष्य का नाम-पता लिखकर मुझे सौंपी— चौक पोस्ट ऑफिस से ‘राजपाल एंड संस’ को रजिस्ट्री करने के लिए... मैंने रजिस्ट्री की और रसीद लाकर बाबूजी को दी... आज सोचता हूँ कि जिस विश्वास से बाबूजी ने मुझे ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ की पांडुलिपि रजिस्ट्री के लिए दी थी, उस विश्वास के साथ मैं अपनी पांडुलिपि जिसकी कोई दूसरी प्रति न हो, शायद ही किसी को सौंपूँ!

 इसे मैं अपना सौभाग्य ही मानूँगा कि ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ की पांडुलिपि का अधिकांश भाग मुझे लिपिबद्ध करने का अवसर मिला। मुझसे पहले, श्री अशोक ऋषिराज यह कार्य कर रहे थे, पर संभवतः मेरा काम नागर जी को अधिक पसंद आया। तभी, उन्होंने शरद जी से मेरे बारे में एक नहीं, दो बार कहा था कि अबकी बार तुमने अच्छा लिपिक दिया है।  

 ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ हिन्दी साहित्य में अप्रतिम उपन्यासों में है और यह नागर जी के उपन्यासों की लीक से हटकर सर्वथा अनन्य है। इसमें ‘मेहतर’ कहे जाने वाले अछूतों को लेकर ताना-बाना बुना गया है और उन्नसवी सदी के प्रारंभ की देशव्यापी सामाजिक हलचल का भी हाल मिलता है। नागर जी ने इस उपन्यास की रचना से पूर्व, मेहतर जाति के ऐतिहासिक सन्दर्भों को समझने के लिए जहाँ पर्याप्त अध्ययन किया था, वहीं इस जाति के लोगों, विशेषतः स्त्रियों के मनोविज्ञान को समझने के लिए भंगी बस्ती में सर्वेक्षण कर अनेक पात्रों का इंटरव्यू भी किया था। यही कारण है कि इस उपन्यास के विवरण इतने स्वाभाविक और सटीक हैं कि आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा को कहना पड़ा कि हिन्दी में ऐसा कोई दूसरा उपन्यास देखने को नहीं मिलता।

एक हिसाब से देखा जाय तो नागर जी का सान्निध्य और अकादमी के परिवेश ने ही मुझे लेखक-कवि बनाया... 1978 में एक टूटी-फूटी कविता लिखी थी। जब उसे बाबूजी को दिखाया, तो वे मुस्कुराकर बोले, “तेवर तो तुम्हारे निराला-वाले हैं, लेकिन बेटा! अभी पढो।” फिर समझाते हुए बोले, “चार-पाँच साल तक कुछ मत लिखना।” 

मैंने उनकी बात गाँठ बाँधकर अप्रैल 1982 तक कुछ नहीं लिखा, लेकिन गाँव में अचानक घटी एक घटना ने मुझे उद्वेलित किया और मैंने एक कहानी लिख डाली— ‘दंश’। डरते-डरते मैंने उसे जब बाबूजी को दिखाया, तो उन्होंने मेरी ख़ूब पीठ ठोंकी और संशोधन भी सुझाये— भाषा और कथा-विवरण को लेकर। हिदायत भी दी कि एक रचना को कम-से-कम तीन-चार बार रिवाइज करो, फिर उसे फ़ाइनल करो... छपाने में तो बिलकुल जल्दबाजी नहीं। 

मैंने बाबूजी की बात गाँठ बाँध अवश्य ली, पर मेरा अनुभव यही कहता है कि लेखकों के साथ उपदेश दूर तक नहीं चलते। यश-कामना उन्हें जल्द-ही टँगड़ी मार गिरा देती है।


 - राजेन्द्र वर्मा की स्मृति से


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शैलेश मटियानी और उनका स्वाभिमान!


हेमवती नंदन बहुगुणा जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे,वे पहाड़ के लेखकों के दुख और सुख की चिंता रखा करते थे। आर्थिक मदद भी  भेजा करते  थे। उनको जब साहित्यकार शैलेश मटियानी  की विपन्नता की खबर  मिली  तो  रहा नही गया। बहुगुणा जी ने तत्काल शैलेश मटियानी की आर्थिक मदद के लिए अपने निजी सचिव को निर्देश दिया। दस हजार रु का  चेक जिलाधिकारी लेकर शैलेश मटियानी के पास पहुंचा-मुख्य मंत्री जी ने कृपा पूर्वक यह आर्थिक सहायता भेजी है,कृपया इसे ग्रहण करे।

शैलेश मटियानी मानी औऱ स्वभिमानी साहित्यकार थे। सरकार से भेजी गई आर्थिक मदद ने उन्हें बौखला दिया था। जो किसी  भी तरह उन्हें मंजूर नही थी। जिलाधिकारी को हाथ जोड़कर वे घर के अंदर चले आये। दिमाग मे आंधी सी चल रही थी।  सिर पकड़ कर काफी देर तक बैठे रहे। चेहरा तमतमाया हुआ था। 

जिलाधिकारी ने कहा था-सर! आप बहुत बड़े लेखक हैं।चेक की राशि देखकर मैं समझ गया था। मुख्यमंत्री जी आपको बहुत मानते हैं। दस हजार बहुत होते हैं, मेरे जैसे डीएम की सैलरी सिर्फ सात सौ रुपये  ही है। आप को तो दस हजार!

मटियानी जी फैसला ले चुके थे। प्राकृतिस्थ होते हो चेक लेकर   मुख्यमंत्री बहुगुणा जी को तीन पन्नो का खर्रा लिखने बैठ गए।पत्र क्या था।एक एक शब्द आग का बबूला था। पत्र क्या ,पत्र बम था। उस तीन पन्ने के खर्रे को ज्यों का त्यों लिख पाना मुमकिन  नहीं है।

 पत्र में मटियानी ने लिखा था- आपको तो मालूम है। में बिकाऊ नही हूँ। शैलेश मटियानी को कोई खरीद सके, अभी तक पैदा नही हुआ है।आपका दस हजार का चेक वापस कर रहा हूँ।कृपया इसे अपने अपने ख़लीते (रेक्टम )मे डाल लीजिएगा।

जब तक शैलेश मटियानी का मुख्यमंत्री हेमवती नंन्दन बहुगुणा को सम्बोधित पत्र लखनऊ पहुंचा। सरकार बदल चुकी थी।मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बहुगुणा जी की जगह नारायण दत्त तिवारी आसीन हो चुके थे।

मुख्यमंन्त्री के नाम आये पत्रों का जवाब लिखने की जिम्मेदारी उनके विशेष सचिव और वंशी और मादल की कविताओं से चर्चित कवि ठाकुर प्रसादसिंह पर थे। शैलेश मटियानी का आग बबूला होकर दस हजार रु का चेक सहित पत्र पढ़कर  ठाकुरप्रसाद सिंह जी मुस्कराए ।उन्हें शरारत सूझी। जवाब में उन्होंने मुख्यमंन्त्री नारायण दत्त तिवारी की ओर से एक भावुक पत्र लिखा और उपसचिव से कहा जब मुख्यमंन्त्री जी इन  पर हस्ताक्षर करे तो आप उनके पास ही रहिएगा और संभालिएगा। चुपचाप मै भी पीछे पीछे हो लिया और एक कुर्सी पर बैठ गया।

मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी पत्रों पर हस्ताक्षर करते- करते ठिठक गए । मेरी ओर देखा-यह क्या है- पत्र में लिखा था-आदरणीय मटियानी जी, आपका कृपा पत्र मिला, आभारी हुआ। अब मुख्य मंत्री की कुर्सी पर आदरणीय बहुगुणा की जगह आपका सेवक है।आपकी रचनाओं में मैं अपना जीवन दर्शन खोजता रहा हूँ। प्रार्थना है कभी पधारें ।

मुझे भी दर्शन दें। अपने चरणों की धूल से मेरे आवास  पवित्र हो जाएगा। अनवरत प्रतीक्षा में आपका नारायण दत्त तिवारी।

         तिवारी जी को मैने पत्र के पीछे का इतिहास बताया।सम्वेदना प्रतिफल देगी। तिवारी जी ने मेरे आग्रह पर उस पत्र पर  यह कहकर हस्ताक्षर कर दिए कि ठाकुर  प्रसाद सिंह से कहिएगा -'इतनी अतिशयोक्ति ठीक नहीं है।"

मुख्य मंत्री का पत्र शैलेश मटियानी को चला गया।

 कुछ समय बीता। रविवार के दिन जनता दरबार लगा हुआ था।  मुख्यमंत्री तिवारी जी जनता की शिकायतों को निपटाकर अपने कक्ष में चले गए । भीड़ छटने लगी थी। हेलीकॉटर तैयार था।उनको तत्काल दिल्ली प्रस्थान करना था। तभी वहां कहानीकार शैलेश मटियानी प्रकट हुए।यह कहते हुए कि नारायण दत्त कहाँ है। वह मेरी प्रतीक्षा कर रहे है। उनको बताइये कि शैलेश मटियानी उनके  आग्रह पर उपस्थित है।

उन्होंने न  तो ठाकुर प्रसाद सिंह की ओर देखा और न मेरी तरफ। अपनी धुन में नारायण दत्त तिवारी को पुकारते रहे।

     ठाकुर प्रसाद सिंह जी ने  मुझसे कहा अनूप जी  !जरा  सम्भालिए जाकर। मैने मुख्यमन्त्री जी के कक्ष में जाकर देखा नारायणदत्त तिवारी दिल्ली जाने के लिए तैयार थे।सामान हेलीकाप्टर में भेजा जा चुका था। मुख्यमन्त्री ने द्रष्टि उठाकर देखा। मैने उन्हें बताया शैलेश मटियानी 

अपनी पुस्तक देने पधारे हैं।

 शैलेश मटियानी कौन हैं ?

ये   वे ही साहित्यकार हैं जिन्होंने बहुगुणा जी का दस लाख रु का चेक  वापस कर दिया था। जवाब में आपका पत्र पाकर पधारे है।ठाकुर प्रसाद सिंह जी मटियानी जी को लेकर हेलीकाप्टर के पास खड़े हैं।

     मुख्य मंत्री- लेकिन मेरे पास समय कहाँ है। मेने आगाह किया था  !इतनीअतिशयोक्ति न किया करें!

मैने फिर अनुरोध किया हेलीकाप्टर में बैठने के पहले उनसे उनकी किताबे तो ले सकते है। क्रोधी किंतु सह्रदय लेखक है।

मुख्यमंत्री  -ठीक है,लेकिन मैं उनको पहचानूगा कैसे?

मैने सुझाव दिया आगे बढ़कर शैलेश मटियानी के कंधे पर  हाथ रख दूंगा।

 मुख्यम1न्त्री राजी हो गए,ठीक है आप ऐसा ही करें।लेकिन सिर्फ एक मिनट का समय बचा है। थोड़ी सहायता करें।

में तेज कदमो से आगे बढ़ा। मुख्यमंन्त्री जी ने मुझे धक्का दिया दौड़ कर पहुंचिए। आगे आगे मैं पीछे पीछे तिवारी जी।मैने जैसे ही शैलेश मटियानी के पीछे हाथ रखा ,मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी ने अपने दोनों भुजाओं को फैलाते हुए मटियानी जी को  लपेट लिया।

 इस दृश्य को देखकर सुरक्षा कर्मी तक

हड़बड़ा गए। मटियानी की सारी किताबे जमीन में गिर गई।

तिवारी जी ने झुककर किताबे उठायी,अरे इतनी  ढेर सारी किताबे आप हमारे लिए।सबको हेलीकॉप्टर में रख दो। रास्ते मे पढूँगा। मटियानी जी आपने तो आज मुझ अकिंचन को समृद्ध कर दिया। शैलेश मटियानी मुख्यमन्त्री जी को मात्र दो किताबे भेंट करने के लिए लाये  थे। मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी यह कहते हुए हेलीकाप्टर में बैठ गए -अब आप नही मैं स्वयम आपके घर आकर दर्शन करूंगा और  साग रोटी भी खाऊंगा।ठाकुर प्रसाद जी मटियानी जी के स्वागत सत्कार में कोई कमी नही होना चाहिए।

इसी के साथ मुख्यमंत्री का हेलीकॉटर के उड़ने पर उड़ी धूल का गर्दोगुबार जब बैठा तो वहां  मात्र तीन लोग ही बचे थे। शैलेश मटियानी,ठाकुर प्रसाद सिंह जी और एक अदद चश्मदीद मै।

 - अनूप श्रीवास्तव की स्मृति से



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गुरुवार, 7 सितंबर 2023

राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त जी (दद्दा) और मेरे पिता श्री नरेन्द्र शर्मा का कथोपकथन

एक रोचक कथा 

" एक दिन उन्होंने (दद्दा ने) मुझे (नरेन्द्र शर्मा को) एक दोहा सुनाया:-"औसर बीते, दिन गए, जाव बिप्र घर जाव। तोहि न भूले पुत्र-दुख, मोहि पूँछ कौ घाव।।" दोहा सुना कर, दद्दा ने पूछा- "अच्छा बताओ यह दोहा किसने, किसके प्रति कहा होगा।" मैंने उत्तर दिया- "कहा तो गया है किसी विप्र के प्रति..." दद्दा ने बात काटी- "पर कहा किसने है?" मैं सोचने लगा। विचार आया कि शेर को मूँछ प्यारी होती है  वानर को पूँछ। रामायण में रावण की उक्ति की स्मृति ने विचार की पुष्टि की। लेकिन फिर संशय हुआ कि वानर की पूँछ का घाव आख़िर क्योंकर इतना अविस्मरणीय होगा। मैं चक्कर में पड़ गया और कुछ देर बाद मैंने हार मान ली। दद्दा ने मुझे एक लोक-कथा कह सुनाई।"

 " एक ब्राह्मण देवता गाँव-आनगाँव, कथा-वार्ता कह कर, अपना गुज़ारा करते थे। एक समय ऐसा आया कि कथा कहने की उनकी शैली लोगों को बहुत घिसी-पिटी-सी लगने लगी। और अनेक कथा-वाचक मैदान में उतर चुके थे। वह दिनों-दिन अधिक लोकप्रिय होने लगे। बूढ़े ब्राह्मण देवता को कोई न पूछता। एक दिन वह सात गाँव निराहार घूम-फिर कर, घर लौट रहे थे कि उन्होंने निश्चय किया- जंगल में पेड़ के नीचे बैठ कर कथा कहते दिन बिता देना भला है, रीती झोली लिए घर लौटना ठीक नहीं। पेड़ के नीचे बैठ कर, वह कथा सुनाने लगे। सुनने वाला कोई न था। कथा-समापन कर, वह बस्ता बाँध ही रहे थे कि एक स्वर्ण-मुद्रा उनके सामने न जाने कहाँ से टपक पड़ी। उन्होंने आश्चर्य-चकित हो कर, इधर-उधर देखा। देखते क्या हैं कि एक नाग फन झुका-झुका कर उन्हें नमस्कार कर रहा है। ब्राह्मण देवता ने नाग को आशीर्वाद दिया और नाग ने उन्हें न्यौता दिया नित्य आने और कथा सुनाने का। ब्राह्मण देवता नाग को नित्य कथा सुनाने लगे। दक्षिणा में उन्हें नित्य एक स्वर्ण-मुद्रा की प्राप्ति होने लगी। स्वर्ण के साथ संपन्नता आई और संपन्नता के साथ भोग। और भोग है, तो रोग का आना भी अनिवार्य माना गया है। बरस भर भी कथा न कह पाए होंगे कि ब्राह्मण देवता रुग्ण हो गए। इस दशा में उन्होंने अपने किशोर पुत्र को सारा भेद बता दिया। पुत्र ने बड़े उत्साह से कहा- आज मैं जाऊँगा कथा कहने।"

" ब्राह्मण किशोर ने पेड़ के नीचे बैठ कर, कथा कही। नाग ने दक्षिणा दी। दक्षिणा पाते ही ब्राह्मण-पुत्र की बुद्धि भ्रष्ट हो गई। उसने सोचा, क्यों न नाग को मार डालूँ? और बाँबी (सर्पबिल) को खोद कर, सारी स्वर्ण-राशि क्यों न एक ही फटके में हथिया लूँ? आशीर्वाद देने को उठे हुए हाथ में डंडा था। ब्राह्मण ने नाग पर भरपूर वार किया। साँप की पूँछ घायल हुई। घायल नाग ने पलट कर आक्रमण किया। ब्राह्मण कुमार मर गया। वृद्ध ब्राह्मण ने शोक के दिन पूरे किए और एक दिन वह कथा सुनाने फिर पेड़ के नीचे आ बैठे। कथा सुनने के पूर्व ही नाग ने उन्हें दक्षिणा दे दी और कहा:-"औसर बीते, दिन गए, जाव विप्र घर जाव। तोहि न भूले पुत्र-दुख, मोहि पूँछ की घाव।।"

श्री परितोष नरेन्द्र शर्मा की स्मृति से

प्रस्तुति : लावण्या शाह 



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मेरे प्रिय व्यंग्य लेखक परसाई जी

बात उन दिनों की है जब मैं जबलपुर में होम साइंस कॉलेज में पढ़ती थी।

हिंदी के महान व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई जी मॉडल हाई स्कूल में  विजय भाई को पढ़ाते थे | बाद में एक ही विधा में होने की वजह से गुरु शिष्य का रिश्ता मित्रता में बदल गया, हालांकि परसाई जी व्यंग्य लेखक थे, विजय भाई नाटक, कहानी ,कविता हर विधा में लिखते थे ।अक्सर मैं अपने होम साइंस कॉलेज से लौटते हुए उनके घर चली जाती। 

अपनी रचनाएं उन्हें पढ़कर सुनाती। न वे तारीफ करते, न खामियाँ निकालते। मैं असंतुष्टि का भाव लिए घर लौटती।

एक दिन विजय भाई मुझे रोटरी क्लब ले गए | साहित्य कार्यक्रम था और परसाई जी मुख्य अतिथि थे | अधिकतर लोग अंग्रेजी ही बोल रहे थे। सभी परसाई जी से हाथ मिला रहे थे । डिनर के दौरान सलाद की प्लेट लिए एक सज्जन परसाई जी के करीब आए

" सर आप क्या महसूस करते हैं, यह देश विनाश की ओर जा रहा है और हम सब पतित पथभ्रष्ट इसे रसातल पहुंचाकर ही दम लेंगे।" परसाई जी तपाक से बोले

" यह मुझे नहीं मालूम था कि सलाद के साथ देश की दुर्दशा इतनी स्वादिष्ट लगती है ।"

यह सुनकर काले कोट और नीली टाई वाले सज्जन इतनी जोर से ठहाका मारकर हंसे कि उनके कप का सूप छलक पड़ा।

परसाई जी हमें टैक्सी से घर तक छोड़ने आए । रास्ते में विजय भाई ने मेरी रचनाओं पर चर्चा छेड़ी। उन्होंने कहा -"संतोष के अंदर छुपा लेखन का बीज अंकुरित हो चुका है। तुम्हें अपनी हर एक रचना के कई कई ड्राफ्ट बनाने होंगे सन्तोष, फिर देखना निखार।"

उस दिन मैंने उन्हें पहली बार निकटता से जाना। उनकी सादगी से मैं अभिभूत थी । एक दिन अपनी कहानी" शंख और सीपियां "उन्हें सुनाने ले गई। अपने तईं मैंने इस कहानी पर खूब मेहनत की थी। वे अपने घर पलंग पर आराम से बैठे मेरी कहानी सुन रहे थे कि तभी खटर- पटर की आवाज सुन उन्होंने मुझे पढ़ने से रोका। अंदर गए और कटोरदान में रखी रोटी के कुछ टुकड़े फर्श पर बिखेर दिए। तभी एक चूहा अलमारी के नीचे से निकला और सारे टुकड़े एक-एक कर उठा ले गया। "यह भी तो घर का सदस्य है। रोटी खाकर शांत हो जाएगा वरना तुम्हें कहानी नहीं सुनाने देगा ।"

सच में थोड़ी देर में शांति थी। मैं कहानी पढ़ने लगी। मेरी कहानी जब पूरी हुई तो वे बोले "अब वक्त आ गया है छपने का ।"

मेरी खुशी की इंतिहा न थी। दो महीने बाद धर्मयुग से डॉक्टर धर्मवीर भारती जी ने स्वयं मुझे पत्र लिखा --"आपकी कहानी "शंख और सीपियां "धर्मयुग में प्रकाशनार्थ स्वीकृत है।"

 मैंने उसी दिन परसाई जी के घर जाकर भारती जी का स्वीकृति पत्र दिखाया ।

"जाओ बिस्कुट खरीद लाओ। चूहे को खिलाना है। आखिर वह भी तो तुम्हारी कहानी सुनने में भागीदार था।"

अब परसाई जी नहीं रहे । उन्होंने जीवन की अनंत पीड़ा सही। उनका जीवन घोर दुखों से गुजरा । उस दुख ने उन्हें लेखनी थमा दी और खंगालने वाली वह दृष्टि प्रदान की जो आज व्यंग्य साहित्य की धरोहर है । वे कहते थे "जो चेतनावान होता है वह दुनिया की हालत पर रोता है ।

प्रस्तुति : संतोष श्रीवास्तव


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कहानी आन्दोलन और कमलेश्वर

 संस्मरण


सुविख्यात कथाकार हिमांशु जोशी के सुपुत्र अमित जोशी नार्वे से एक पत्रिका का सम्पादन  कर रहे थे। उसका वार्षिकांक का प्रकाशन हुआ था जिसमें भारतीय कथाकारों की रचनाओं के साथ विश्व  के कई  देशों के प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाएं थीं, उसके लोकार्पण  के निमित्त कमलेश्वर जी की अध्यक्षता में उनकै साथ अनेक साहित्यकार  राष्ट्रपति भवन गये थे। उनके साथ मैं भी था। 

महामहिम श्री कृष्णकांत जी उपराष्ट्रपति थे। जब तक महामहिम जी नहीं पधारे थे हम बाहर आपस में बातें कर रहे थे। कमलेश्वर  जी सिगरेट पीते थे। वे उसे जलाए बाहर खड़े-खड़े मस्ती में पी रहे। धुआं उड़ते हुए  देखकर  मैं उनके नजदीक गया और हंस कर बोला- आपके सिगरेट से उड़ता धुआं ऊपर कम,  नीचे अधिक फैल रहा है। वे हंसे, "नीचे फैलाना ही चाहिए। नीचे फैलने से मक्खी-मच्छरों का डर कम रहेगा।" "ये तो महामहिम भवन है। यहां कहां आ सकते हैं?" 'भाई, ये मत कहिए, वो सब जगह हैं। वो देखो  (घासों की ओर इशारा करते हुए) है न मच्छर!' "बिल्कुल सही कहा आपने। आपकी निगाह वाकई बहुत तेज और गहरी है।" वे बोले, "गहरी नहीं, पैनी है।"


फिर मैंने प्रसंग बदलते हुए पूछा, सातवें दशक का वह काल जब साहित्य  में कहानी आन्दोलन  को लेकर अनेक  खेमें बन गए थे और नयी कहानी के  नाम पर कुछ कहना शुरू कर दिया था कि, नयी कहानी अपने आखिरी चरण में मूल्यों अस्थिरता का शिकार  हो गयी है। उन्होंने कहा--'अतीत के प्रति एक चिपचिपा लगाव से नयी कहानी मुक्त नहीं हो पा रही थी। उसमें आदर्शीकरण के बिन्दु अभी भी शेष  रह गए थे। इसलिए कुछ कथा-लेखकों ने अपने -अपने ढंग  से नये-नये विचार और शिल्प लेकर सामने आए  और सचेतन कहानी, अकहानी, समकालीन कहानी के नाम दिए।' 

समकालीन कहानी अलग से क्यों? मेरे प्रश्न के उत्तर  में वे बोले, दरअसल समकालीन  कहानीकार नयी कहानी की रूढ़िवादी स्थिति से नाराजगी प्रकट करते हैं।' तभी हिमांशु जोशी बोल पड़े, डॉ.विमल समकालीन कहानी के हिमायती हैं। विमल जी नयी कहानी को  'टाइप' बन गयी है, कहते थे,  टाइप  न केवल शब्दों की, बल्कि प्रस्तुतीकरण  की भी।' 

मैं जिज्ञासावश पूछा, अब आन्दोलन  का क्या हश्र हुआ? हिमांशु जी बोले, वह अपने अपने को स्थापित  करने का एक  आन्दोलन था। इस पर कमलेश्वर  जी खिलखिलाहट  हंस पड़े। फिर वह कुछ कहते कि उपराष्ट्रपति जी पधारे और सभी साहित्यकार खड़े होकर उनका अभिवादन किए।  फिर आसन पर उनके बैठने के पश्चात सभी यथास्थान बैठ गए। औपचारिकता के बाद हिमांशु जी ने पत्रिका के सम्बन्ध  में संक्षिप्त प्रकाश डाला। फिर महामहिम जी ने पत्रिका का गरिमापूर्ण लोकार्पण किया। 

 कमलेश्वर  जी बहुत ही सुख मिजाज और हंसमुख स्वभाव  के थे। उनके  विरल  व्यक्तित्व  में  बड़ी सहजता थी। वस्तुतः वैसे लेखक अधिक नहीं हैं। बड़े- छोटे सभी  के साथ अपनत्व भरा स्नेह और गहरा प्यार। 

उपराष्ट्रपति भवन के सामने कई रोड पर मरम्मत चल रहा था। उसकी ओर इशारा करते हुए   कमलेश्वर बोले, अभी मरम्मत  हो रहा है, पता नहीं रात में दूसरे विभाग  वाले आकर खोद डालेंगे। ये हाल  पूरी दिल्ली की है।' उनकी बातें सुनकर महामहिम जी  मुस्कुराए और धीरे से कहा - "यही तो देश की प्रगति है।"

उनकी बात सुनकर  साश्चर्य सभी हंस पड़े। थोड़ी  देर बाद चाय पीकर सभी परस्पर बातें करते निकल चले--

फिर वही आपाधापी....समकालीन साहित्य  पर बहस....नये सृजन की ओर एक और पहल!


डॉ. राहुल की स्मृति से 


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प्रेमचंद और सिनेमा

 

मूर्खों के हाथ पड़ा साइंस - सिनेमा 

 बंबई की एक फिल्म कंपनी मुझे बुला रही है। तनख्वाह की बात नहीं, ठेके की बात है। आठ हजार रुपए सालाना पर। मैं इस हालात पर पहुँच गया हूँ, जब मुझको इसके सिवा कोई चारा भी नहीं रह गया है कि या तो चला जाऊँ या अपने नॉवेल को बाजार में बेचूँ। अजंता सिनेटोन कंपनी वाले हाज़िरी की कोई क़ैद नहीं रखते। मैं जो चाहूँ लिखूँ, जहाँ चाहे चला जाऊँ...। वहाँ साल भर रहने के बाद ऐसा अनुबंध कर लूँगा कि यहीं बनारस में बैठे-बैठे मैं चार कहानियाँ लिख दिया करूँगा और चार-पाँच हजार रुपए मिल जाया करेंगे, जिससे 'जागरण' और 'हंस' दोनों मजे से चलेंगे और पैसे की तकलीफ जाती रहेगी।

  मैं पहली जून 1934 में बंबई चला गया। उस कंपनी से अनुबंध कर लिया। साल भर में छह कहानियाँ उनको देना होंगी। पत्रिकाओं से लगातार नुकसान हो रहा था, बुक सेलर से रुपए वसूल न होते थे। काग़ज़ वगैरह का भाव बढ़ता जा रहा था, सो मजबूर होकर अनुबंध कर लिया। छह कहानियां लिखना मुश्किल है, क्योंकि डायरेक्टर के मशविरे से लिखना ज़रूरी है। क्या चीज़ फिल्म के लिए ज़रूरी है, इसका बेहतर फैसला वही कर सकते हैं।
 मैं जिस इरादे से बंबई आया था, उसमें से एक भी पूरा होता नज़र नहीं आया। प्रोड्यूसर जिस तरह की कहानी पर फिल्म बनाते रहे हैं, उस लीक से वे नहीं हट सकते। बेहूदा मज़ाक़ को तमाशे की जान समझते हैं। इनका विश्वास अनोखा है। राजा-रानी, वज़ीरों की साज़िशें, नकली लड़ाई, चुंबन यही उनका मक़सद है। मैंने सामाजिक कहानियाँ लिखी हैं, जिन्हें शिक्षित वर्ग भी देखना चाहता है, लेकिन इनको फिल्म बनाते हुए संदेह होता है कि यह चले या न चले...। अगर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद पटकथा लिखें, तो फिल्मों में जान बढ़ जाए, मगर आप तो जानते हैं, फिल्म निम्न वर्ग के दर्शकों के लिए होती है, वो अच्छी पटकथा की कद्र नहीं कर सकते। मगर खैर! ये लोग कद्र न करें, समझने वाले तो करते हैं। 'बाजारे हुस्न' की मिट्टी पलीद कर दी, 'मिल मज़दूर' अलबत्ता कुछ अच्छी रही। यह साल (1934) तो पूरा करना ही है। क़र्ज़दार हो गया था, क़र्ज़ पट जाएगा। और कोई फायदा नहीं हुआ, तो अपने पुराने अड्डे पर जा बैठूँगा। वहाँ दौलत नहीं है, मगर सुकून जरूर है। यहाँ तो मालूम होता है कि ज़िंदगी बर्बाद कर रहा हूँ।
सिनेमा के माध्यम से पश्चिम की सारी बेहूदगी हमारे अंदर दाखिल की जा रही है और हम बेबस हैं। पब्लिक में अच्छे-बुरे की समझ नहीं है। आप अखबार में कितनी ही फरियाद कीजिए, वह बेकार है। अख़बार वाले भी साफ़गोई से काम नहीं लेते। जब एक्ट्रेस और एक्टरों की तस्वीरें धड़ाधड़ छपें और नौजवानों पर जो असर नज़र आ रहा है, इन अखबारों की बदौलत, उसमें दिन-ब-दिन तरक्की हो रही है।
मेरा फैसला हो गया। 25 मार्च 1935 को अपने शहर बनारस जा रहा हूँ। अजंता कंपनी अपना करोबार बंद कर रही है। मेरा अनुबंध तो साल भर का था और अभी तीन महीने बाकी हैं, लेकिन मैं उनकी परेशानी बढ़ाना नहीं चाहता। महज इसलिए रुका हुआ हूँ कि फरवरी और मार्च की रकम वसूल हो जाए और जाकर फिर अपने साहित्य के काम में व्यस्त हो जाऊँगा। आजकल मेरी सेहत निहायत कमजोर हो रही है। लिखना-पढ़ना छोड़ दिया है। एक साहित्यकार के लिए सिनेमा में कोई गुंजाइश नहीं है। मैं इस लाइन में इसलिए आया था कि अपनी आर्थिक स्थिति सुधार जाएगी, लेकिन अब मैं देखता हूँ कि मैं धोखे में था और फिर साहित्य की तरफ लौट रहा हूँ। साहित्य, शायरी और दूसरी कलाओं का मकसद सदा यही रहा है कि आदमी में जो बुराइयाँ हैं, उन्हें मिटाकर अच्छाइयाँ जगाई जाएं। उसकी बुरी प्रवृत्ति को दबाकर या मिटाकर कोमल, नर्म, नाज़ुक और पवित्र जज़्बात को बेदार (जाग्रत) किया जाए। अगर सिनेमा इसी आदर्श को सामने रखकर फिल्में पेश करता, तो आज वह दुनिया को आगे बढ़ाने में सबसे शक्तिशाली सिद्ध होता।
जिस जमाने में बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन था, अधिकतर सिनेमा हॉल खाली रहते थे और उन दिनों जो फिल्में प्रदर्शित हुईं, वो नाकामयाब रहीं। इसका सबब इसके सिवा और क्या हो सकता है, कि अवाम के बारे में जो विचार है कि वो मारकाट और सनसनी पैदा करने वाली फिल्मों को ही पसंद करती है, महज भ्रम है। अवाम उनके कमाल के क़सीदे गाए जाए, तो क्यों न हमारे नौजवान पर इसका असर होगा। साइंस एक रहमत है, मगर मूर्खों के हाथों में पड़ कर लानत हो रही है। जिन हाथों में फिल्म की क़िस्मत है, वो बदकिस्मती से इसे इंडस्ट्री समझ बैठे हैं। समाज में सुधार के बजाय शोषण कर रहे हैं। नग्नता, क़त्ल, खून और जुर्म की वारदातें, मारपीट ही इस इंडस्ट्री के औजार हैं और इसी से वह इंसानियत का खून कर रहे हैं।
 मैं, बंबई में ज़िंदगी से तंग आ गया हूँ। यहाँ की आबोहवा और फ़िज़ा दोनों ही मेरे माफ़िक़ नहीं हैं। हममिज़ाज आदमी नहीं मिलता, महज ज़िंदगी में एक नया तजुर्बा हासिल करने की ग़र्ज़ से बंबई आया था। मेरी कंपनी की कोई भी फिल्म सफल नहीं हुई। इधर एक्टरों के नाकामयाब होने से और भी नुकसान हुए। चुनांचे जयराज, बिब्बो, ताराबाई जैसे एक्टर भी किनारा-कश हो गए। सिनेमा से किसी सुधार की आशा करना बेकार है। यह कला भी उसी तरह पूँजीपतियों के हाथों में है, जैसे शराब फरोशी...। इनको इससे मतलब नहीं कि पब्लिक की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ता है। इन्हें तो अपनी पूँजी से मतलब है। नग्नता, नृत्य, चुंबन और मर्दों का औरतों पर हमला... ये सब इनकी नज़रों में जायज़ है। पब्लिक का स्तर भी इतना गिर गया है कि जब तक ये फार्मूले न हों, तो उनको फिल्म में मज़ा नहीं आता। फिल्मों में सुधार का बीड़ा कौन उठाए? मेरे विचार में सभ्य महिलाओं का फिल्मों में आना ठीक नहीं है, क्योंकि स्टूडियों की फ़िज़ा इनके लिए नहीं है और भविष्य में भी इसमें सुधार असंभव है।
 हमारे सिनेमा वालों ने पुलिस वालों की मानसिकता से काम लेकर यह समझ लिया है कि भद्दे मसखरेपन में लड़ाई और जोर-आज़माइश या नकली ऊँची दीवार से कूदने में और झूठमूट में टीन की तलवार चलाने में ही जनता को आनंद आता है और कुछ उत्तेजना व चुंबन सिनेमा के लिए उतना ही जरूरी है, जितना जिस्म के लिए आँखें...। बेशक अवाम वीरता भरी जवांमर्दी देखना चाहती है; इश्क़, मुहब्बत भी उनके लिए आकर्षण रखता है, लेकिन यह ख्याल गलत है कि उत्तेजना व चुंबन के बगैर मुहब्बत का इज़हार हो नहीं सकता और सिर्फ तलवार चलाना ही जवांमर्दी है या बिना किसी जरूरत के गीत पेश करना जरूरी है। इन बातों से ही अवाम को खुशी मिलती है, तो यह इंसानियत की गलत कल्पना है।
- प्रेमचंद
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( प्रेमचन्द जी हिन्दी सिनेमा के लिए कहानियाँ लिखने के उद्देश्य से जून 1934 ई. में बंबई गये थे। सिनेमा के गिरते स्तर को देखकर वे बहुत निराश हुए, इस पर उन्होंने एक लेख लिखा, जो उस समय प्रतिष्ठित पाकिस्तानी पत्रिका 'नक़्श' के जून, 1964 अंक में प्रकाशित हुआ था, इस दुर्लभ लेख को बाद में ‘दैनिक भास्कर’ समाचार पत्र ने 31 जुलाई 2005 को प्रकाशित किया था, यह दुर्लभ लेख है)

प्रस्तुति -डॉ. जगदीश व्योम


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मेरी पूज्य आँटी : कीर्ति चौधरी

 “ हिंदी कविता के लिए जानी-मानी और मुखर कवयित्री कीर्ति चौधरी (१९३४ -२००८ ) का लंदन में निधन । भारतीय समयानुसार शुक्रवार की सुबह तीन बजकर ४५  मिनट पर अंतिम सांस ली ! पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहीं कीर्ति चौधरी लंदन में रह रही थीं । वहां उनका उपचार हो रहा था।”

यह समाचार पढ़ते ही पूज्य चाची जी का चेहरा आँखों के आगे उभर आया। जानती हूँ कि समाचार पत्रों से सब पता चल ही जाता है । पूज्य कीर्ति आंटी जी की याद आ गयी जब से यह दुखद समाचार पढे। मुझे याद आ रहा है जब बंबई के, हमारे घर पर, अक्सर कीर्ति आंटी जी  व अंकल जाने-माने रेडियो प्रसारक ओंकारनाथ श्रीवास्तव जी साथ आया करते थे और हम लोग भी उनके घर जाया करते थे। चाचीजी के हाथ की बनी उत्तर भारतीय रसोई व उसके विविध व्यंजन खाया करते थे। ...

मेरी यादों में  "अतिमा " उनकी बिटिया भी है। बिटिया का का नाम, हिन्दी कविता के मूर्धन्य कवि श्रेष्ठ आदरणीय सुमित्रानंदन पंत जी ने रखा था, वह , बिटिया उस समय नन्ही सी थी ~
लिंक - http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2008/06/080613_kirti_chaudhary_obit.shtml

पूज्य कीर्ति चौधरी जी अपने कम लेखन में बहुत कुछ या समग्र विमर्श दे गई  हैं। कीर्ति चौधरी जी तीसरे सप्तक की एकमात्र कवयित्री थीं। ‘तीसरा सप्तक’ सं. १९६० के संपादक अज्ञेय जी थे ६०  के दशक में, प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और मदन वात्स्यायन जैसे साहित्यकारों के साथ कवयित्री कीर्ति चौधरी को भी तीसरा सप्तक का हिस्सा बनाया गया था।

साहित्यकार केदारनाथ सिंह एवं महादेवी वर्मा के बाद हिंदी कविता में जो एक रिक्तता आई, उसे कीर्ति जी ने अपने मौलिक लेखन से पाट दिया था । उनकी कविता एक नए सांचे में थी, जिसकी बनावट अलग थी, इसमें एक ताज़गी थी और अपनी रचनाओं के तल में उनके पास एक ख़ास तरह का स्त्री सुलभ संवेदना का ढांचा था जो उनके समय में किसी और के पास न था। 

तीसरा सप्तक के कवियों में से एक, जाने माने साहित्यकार,  केदारनाथ सिंह जी उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहते हैं, "तीसरा सप्तक के लिए यह दो ही वर्षों में तीसरा आघात है। इसी वर्ष प्रयाग नारायण त्रिपाठी का भी देहांत हो चुका है। इससे कुछ समय पहले मदन वात्स्यायन हमें छोड़कर चले गए | "

केदारनाथ सिंह कीर्ति चौधरी के कृतित्व की चर्चा करते हुए कहते हैं, "महादेवी वर्मा के बाद हिंदी कविता में जो एक रिक्तता आई थी, उसे कीर्ति अपने मौलिक लेखन से पाटती हैं। उनकी कविता एक नए सांचे में थी जिसकी बनावट अलग थी। इन में एक ताज़गी थी और अपनी रचनाओं के तल में उनके पास एक ख़ास तरह का स्त्री सुलभ संवेदना का ढांचा था जो उनके समय में किसी और के पास नहीं था। केवल एक बात थी वह यह कि कीर्ति नई कविता की कवियत्री थीं।  ऐसी, जिन्होंने महादेवी वर्मा के जाने के बाद आई रिक्तता में अपनी खनक घोलनी शुरू की थी। 

कीर्ति चौधरी जाने-माने रेडियो प्रसारक ओंकारनाथ श्रीवास्तव जी की पत्नी थीं |

नई कविता की शुरुआत आम तौर पर ‘दूसरा सप्तक’ ( १९५१ ) से होती है और ऐसा माना जाता है कि १९५९ में ‘तीसरा सप्तक’ के प्रकाशन के साथ वह अपने उत्कर्ष को पहुँच कर समाप्त हो जाती है। नई कविता के इसी उत्कर्ष काल की साक्षी और सारथी थीं कीर्ति चौधरी और उनकी रचनाएँ। उनकी कविताओं में एक मोहक प्रगीतात्मकता देखने को मिलती है।  उनकी कविता में मनुष्य और उसके समग्र अनुभवों को पकड़ने का यत्न हुआ है। 
वास्तव में कीर्ति चौधरी की कविता नई कविता के अन्य रचनाकारों की तरह ही संपूर्ण जीवन की कविता है।उनकी कविता में प्रतीकों और बिंबों का काफ़ी प्रयोग मिलता है।”

कुछ चर्चित रचनाएं- 

दायित्व भार- तीसरा सप्तक
लता- १, २  और ३ तीसरा सप्तक
एकलव्य- तीसरा सप्तक
बदली का दिन- तीसरा सप्तक
सीमा रेखा- तीसरा सप्तक
कम्पनी बाग़
आगत का स्वागत
बरसते हैं मेघ झर-झर
मुझे फिर से लुभाया
वक़्त

जीवन परिचय - 

एक जनवरी, १९३४ को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के नईमपुर गांव में एक कायस्थ परिवार में उनका जन्म हुआ। कीर्ति चौधरी का मूल नाम कीर्ति बाला सिन्हा था।  उन्नाव में जन्म के कुछ बरस बाद उन्होंने पढ़ाई के लिए कानपुर का रुख किया। सं १९५४  में एम.ए. करने के बाद 'उपन्यास के कथानक तत्व' जैसे विषय पर उन्होंने शोध कार्य किया। साहित्य उन्हें विरासत में मिला और फिर आगे, जीवनसाथी के साथ साहित्य, संप्रेषण से कीर्ति जी जुड़ी रहीं । पिता एक जमींदार थे ।कीर्ति चौधरी जी की मां, सुमित्रा कुमारी सिन्हा स्वयं एक बड़ी कवयित्री, लेखिका और जानी-मानी गीतकार थीं। कीर्ति चौधरी का लेखन माँ के प्रभाव से मुक्त था और अपनी मौलिकता लिए हुए था। उनकी रचनाधर्मिता के पीछे अनुभवों की विविधता भी एक कारण रहा होगा।  इसका संकेत कीर्ति अपने बारे में लिखते हुए करतीं हैं "गांव, कस्बे और शहर के विचित्र मिले-जुले प्रभाव , मेरे ऊपर पड़ते रहे हैं”

कीर्ति चौधरी जी का विवाह, हिंदी के सर्वश्रेष्ठ रेडियो प्रसारण कर्ता में से एक, ओंकारनाथ श्रीवास्तव जी से हुआ।
बी.बी.सी. हिंदी सेवा के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे ओंकारनाथ श्रीवास्तव केवल रेडियो के अपने योगदान ही नहीं, बल्कि अपनी कविताओं और कहानियों के लिए भी जाने जाते हैं। जाने माने साहित्यकार अजित कुमार कीर्ति जी के भाई हैं। कीर्ति जी व ओंकारनाथ श्रीवास्तव जी की पुत्री अतिमा श्रीवास्तव अंग्रेज़ी साहित्यकार हैं। उनकी २ पुस्तकें १) लुकिंग फॉर माया २) ट्रांसमिशन लंदन से प्रकाशित हुई हैं । 


 प्रस्तुति :  लावण्या शाह 


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