‘क़िस्से साहित्यकारों के’ - ‘हिंदी से प्यार है’ समूह की परियोजना है। इस मंच पर हम  साहित्यकारों से जुड़े रोचक संस्मरण और अनुभवों को साझा करते हैं। यहाँ आप उन की तस्वीरें, ऑडियो और वीडियो लिंक भी देख सकते हैं। यह मंच किसी साहित्यकार की समीक्षा, आलोचना या रचनाओं के लिए नहीं बना है।

हमारा यह सोचना है कि यदि हम साहित्यकारों से जुड़े संस्मरण और यादों को जो इस पीढ़ी के पास मौजूद है, व्यवस्थित रूप से संजोकर अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकें तो यह उनके लिए अनुपम उपहार होगा।



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मंगलवार, 28 मार्च 2023

सरल, सहज और स्नेही - हजारी प्रसाद द्विवेदी

एम० ए० में पाश्चात्य नाट्यशास्त्र की कक्षा के बाद डॉक्टर कैलाशपति ओझा जी ने बताया कि उनके श्वसुर आचार्य द्विवेदी जी उनके घर ठहरे हुए हैं,उनसे मिलना हो तो मुझे फ़ोन कर देना।

मैं, सुरेश ऋतुपर्ण और राकेश जैन 'मित्रत्रयी' नाम से साप्ताहिक हिंदुस्तान में लिखा करते थे। हमने संपादक मनोहर श्याम जोशी जी को द्विवेदी जी के दिल्ली में कुछ दिन उपलब्ध होने के विषय में बताया। वे प्रसन्न हुए और हमें कहा कि हम आचार्य जी से संस्कृति और सभ्यता विषयक एक दीर्घ साक्षात्कार ले लें।

कहाँ परम विद्वान द्विवेदी जी और कहाँ हम तीन तिलंगे! इतने गहन विषय पर उनसे क्या बातचीत करें; क्या सवाल पूछें? अवसर बड़ा था, हमने खूब तैयारी की 'साहित्य कोश' खंगाल डाला, दिनकर जी के 'संस्कृति के चार अध्याय' को उलटा-पलटा और मिशन को पूरा करने पहुँच गए।

मित्रत्रयी का आत्मविश्वास जागृत करने में आचार्य द्विवेदी जी का अत्यंत सहयोग मिला। हमारे प्रश्नों के उत्तर देने में उन्होंने कोई समय नहीं लगाया, ऋतुपर्ण और मैं पूछ रहे थे, राकेश लिखते जा रहे थे। द्विवेदी जी के वक्तव्यों में बहुत से संस्कृत श्लोक भी थे। बीच-बीच में उन्होंने राकेश से पूछा कि सब ठीक लिखा जा रहा है न? राकेश स्वीकृति सूचक सिर हिला देता था।

साक्षात्कार पूरा हुआ, डेढ़ घंटे का निचोड़ राकेश की कापी में समेट कर हम ले गए। जब साप्ताहिक के लिए सारे नोट्स फ़ेयर करने लगे तो पाया कि राकेश पूरे-पूरे श्लोक न लिख पाया था.. सभी अपूर्ण थे। संस्कृत में हम तीनों में केवल राकेश का हाथ खुला था, किंतु उस दिन उसकी कलई खुल गई। अब क्या कैसे करें, कॉलेज में संस्कृत के एक प्राध्यापक को हमने दिखाए, उन्होंने दो तो पूरे कर दिए किंतु शेष के सिरे उनकी पकड़ में नहीं आए।

साक्षात्कार साफ़-साफ़ लिख लिया गया और अधूरे श्लोकों का स्थान रिक्त छोड़ दिया। अब क्या हो? हम राकेश पर झल्ला रहे थे कि सब मटियामेट कर दिया, तभी पूछ लेते आचार्य जी से, वे कह भी रहे थे! क्षुब्ध हो रहे राकेश ने अचानक कहा कि वह आचार्य द्विवेदी जी के पास जाकर क्षमा माँग लेगा और पुनः ध्यान से लिख लेगा।

अंततः हम तीनों अगले दिन ओझा जी को फ़ोन करके उनके घर बड़ी हिम्मत कर आचार्य प्रवर से मिले। हमारे आने का प्रयोजन डॉक्टर ओझा उन्हें बता चुके थे। हम क्षमा याचना हेतु अस्फुट कुछ बोलने लगे परंतु वे द्विवेदी जी की उन्मुक्त हंसी में उड़ गए। उन्होंने और ओझा जी  ने सब सही-सही लिखवा दिए और लॉन में हम तीनों के साथ एक फ़ोटो भी खिंचवाया। फ़ोटो में राकेश का मुखमंडल खूब खिला हुआ है जैसे मनों बोझ उसके सिर से उतरा हो।

साक्षात्कार और आचार्य जी के साथ का हमारा वह चित्र साप्ताहिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ जिसने मित्रत्रयी का भाव बढ़ाया।

- हरीश नवल की स्मृति से।

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